LITERATURE

चौधरी मदन मोहन समर की दो कविताएं

चौधरी मदन मोहन समर ने अपनी पुलिस सेवा का लगभग 25 वर्ष का समय स्वैच्छिक रूप से धार, खंडवा व बैतूल के आदिवासी क्षेत्रों में बिताया है. इस दौरान उन्होंने अनेक अवसरों पर वहां ठेठ गांवों में जाकर मीलों पैदल चलकर रात गुजारी है. उस दौरान उन्हीं टापरियों में बैठ कर लिखी गयी कविताओं में से यह दो कविताएं भी हैं. 1998 में धार जिले के गंधवानी थाना-प्रभारी रहते हुए लिखी गयी यह दोनों कविताएं आपके लिएः

 

भील लड़की

 

भील लड़की

पैदा होती है

खुशनुमाई में

दुःखी नहीं होता कोई भी

उसके पैदा होने पर

यह चिंता में नहीं डालती

दहेज के लिए

बल्कि

देकर जाती है

दापा

ससुराल जाते समय.

 

भील लड़की

नहीं गुजरती

अल्ट्रा सोनो ग्राफी की टेबल से

जन्म लेने के पहले

भ्रूण परीक्षण हेतु.

क्योंकि,

उसका जन्मना

मां की इज्जत पर बट्टा नहीं लगाता

दादा-दादी भी नहीं लेते

ठंडी सांस

यह कहते हुए कि

आह! लड़की पैदा हो गयी

 

भील लड़की

नहीं गयी

बस्ते का बोझ लादे

किसी डोनेशन पर

चलने वाले स्कूल में

सीखने के लिए

मैंनर्स और मेरिटलिटी.

उसने तो सीखी है,

जीवन की बारह खड़ी

पहाड़ो एवं नदियों से अविरल बहते हुए.

 

भील लड़की

प्रतिबंधित नहीं होती

हाट मेले में

अकेले जाने से.

यकीनन

उसे भय नहीं होता

सभ्य समाज की

उस असभ्यता से

जो

पीछा करती रहती हो उसका

आते-जाते.

 

भील लड़की

भले ही पैदा नहीं हुई

तथाकथित

सभ्य व सुसंस्कृत समाज में

बोझ बनकर

किन्तु

उसका आगमन देता है

एक सुखद अनुभूति

मां को,

एवं भविष्य की निश्चिंतता

पिता को.

 

भील लड़की

नहीं समझती

महानगरों की कुटिलताएं

वह

अलमस्त

रहती है

भगौरिए की भीड़ में

मांदल की थाप पर

अपनी मादकता से अनभिज्ञ

नाचते हुए

अपने कल के

सुनहरी सपने तलाश कर.

 

भील लड़की

हंसते-हंसते पलती है

खिलखिलाते हुए बढ़ती हैं

और गुनगुनाते हुए जीती है

क्योकि वह भील लड़की जो है

भील लड़का

 

भील लड़का

पैदा होने पर

नहीं कटने देता

मां का पेट

किसी नर्सिग होम की ऑपरेशन टेबल पर

सिजेरियन के बहाने.

 

भील लड़का

 

बढ़ता भी नहीं है

किसी

सैरेलैक य कॉम्पलॉन की कृत्रिमता के सहारे

अपना मुंह बिदकाते हुए

 

भील लड़का

चिंतित नहीं करता पिता को

स्कूल के दाखिले में

होने वाले इंटरव्यू

और डोनेशन के लिए

प्रतियोगिताओं का गुणा-भाग सीखकर

 

भील लड़का

भले ही गेंद बल्ले की जिद न कर सका हो

लेकिन सीख लेता है

तीर कमान का अचूक निशाना

खेलते-खेलते

 

भील लड़का

किसी झूला घर में पलते हुए

इंतजार नहीं करता

काम-काजी मां बाप के आने का

छः बजे शाम तक.

वह तो,

मां की बगल में

जागता सोता है

खेत, नदी य पहाड़ पर

उसके काम के घंटों में भी

चौबीस घंटे

 

भील लड़का

हंसते-हंसते पलता है,

खिलखिलातें हुए बढ़ता है

गुनगुनाते हुए जीता है

क्योंकि,

वह भील लड़का है

 

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