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राज्य बने 18 साल हो गये, अब तक नहीं बनी जनजातीय परामर्शदात्री परिषद नियमावली

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  • पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में टीएसी ही जनजातियों से संबधित मुख्य निर्णय ले सकती है
  • 2016 में परिषद के सदस्यों ने नियमावली बनाने पर जतायी थी सहमति

CHHAYA KUMARI

Ranchi: राज्य गठन को 18 साल हो चुके हैं. कहने को तो यहां जनजातीय परामर्शदात्री परिषद का गठन हर सरकार करती है. लेकिन किसी भी सरकार ने झारखंड जनजातीय परामर्शदात्री परिषद (टीएसी) नियमावली बनाने की कोशिश नहीं की. 2016 में टीएसी के कुछ सदस्यों ने राज्य में जनजातीय के हित में नियमावली बनाने के लिए बैठकों में हंगामा किया था. इसके बाद सदस्यों ने नियमावली बनाने को लेकर सहमति जतायी थी.  लेकिन अब तक राज्य में टीएसी नियमावली नहीं बन पायी है. राज्य का गठन जनजातीय आबादी को देखते हुए किया गया. जो पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आता है. ऐसे में संविधान के अनुसार राज्य में जनजातीय परामर्शदात्री परिषद की अपनी नियमावली होनी चाहिए.

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राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में है

संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों पर राज्यपाल का अधिकार होता है. राज्य पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में है. राज्य में अब तक नौ राज्यपाल हो चुके हैं, लेकिन नियमावली नहीं बन पायी. जनजातीय परामर्शदात्री परिषद के सदस्य रतन तिर्की ने जानकारी दी कि राज्य गठन के समय से ही विभिन्न संगठन राज्य में टीएसी नियमावली को लेकर राज्यपाल को ज्ञापन सौंपते आयें हैं. लेकिन अब तक नियमावली नहीं बन पायी.

क्या होगा टीएसी बनने से

राज्य में टीएसी नियमावली बनने से जनजातीय उपयोजना की राशि का आवंटन बिना टीएसी सदस्यों के अनुमति के नहीं किया जा सकता. किसी भी जनजातीय मुद्दों पर विधानसभा फैसला नहीं ले पायेगी. कंपनी या अन्य कारणों से हो रहे भूमि अधिग्रहण पर टीएसी रोक लगा सकती है.

राशियों का नहीं हो पाता सही आवंटन

टीएसी
आरटीआई के तहत दिया गया आवेदन.

संविधान के अनुसार केंद्र सरकार से आने वाली जनजातीय उपयोजना राशि का उपयोग पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में किया जाना चाहिए. लेकिन राज्य में नियमावली नहीं बन पाने के कारण उपयोजना राशि का आवंटन अन्य योजनाओं में कर दिया जाता है. रतन तिर्की ने जानकारी दी कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में टीएसी ही जनजातियों से संबधित मुख्य निर्णय ले सकती है. लेकिन राज्य में ऐसा नहीं होता है. भूमि अधिग्रहण के मामले पर भी टीएसी नियमावली के नहीं होने से फर्क पड़ता है. 2016 में दबाव बनाने पर परिषद राजी हुई थी कि नियमावली बने. लेकिन दो साल हो गये, नियमावली नहीं बनी.

आरटीआइ का नहीं मिला जवाब

इस संबध में कई बार विभिन्न संगठनों की ओर से आरटीआइ कर जानकारी लेने की कोशिश की गयी कि राज्य में अब तक नियमावली क्यों नहीं बनी. सामाजिक कार्यकर्ता प्रभाकर कुजूर ने भी इस संबध में आरटीआइ आवेदन दिया. विभाग से जानकारी नहीं मिलने पर उन्होंने  मंत्रीमंडल सचिवालय को पत्र लिखा. लेकिन फिर भी कल्याण विभाग की ओर से जवाब नहीं दिया गया.

 

उपाध्यक्ष डाॅ लुईस मरांडी से नहीं हो पायी बात 

इस संबध में कई बार कल्याण मंत्री और टीएसी उपाध्यक्ष डाॅ लुईस मरांडी से बात करने की कोशिश  की गई. लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया.

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