अनिरूद्ध कुमार पेशे से अधिवक्ता हैं। कई सालों से हजारीबाग जिले के बड़कागांव के जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे संगठन के साथ खड़े रहे हैं। इस संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की है। न्यूज विंग के वरीय संवाददाता रणजीत से उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंशः
हमने बड़कागांव के कई गांवों में देखा लोगों की पिटाई की गयी है। महिलाओं बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया? क्या हुआ था उस दिन?
गांव के लोग धरना पर बैठे थे। उन्हें वहां से भगाने के लिए ये सब किया गया। करीब डेढ़ दशक से जन भूमि रक्षा समिति और कर्णपुरा बचाओ संघर्ष समिति जमीन के इस आंदोलन के साथ खडी रही है। कर्णपुरा मजदूर संगठन वर्षों से जमीन की यह लड़ाई लड़ता आ रहा है। 56 दिन से चल इस धरना में संगठन शामिल नहीं था, पर उसका समर्थन जरूर कर रहा था। अब जब पुलिस की बर्बरता सभी देख चुके हैं। हम एक साथ हैं। आपको आंदोलन के विषय में बताऊं कि 2000 से ही ये संगठन आंदोलन को धार दे रहे हैं। कर्णपुरा इलाके में एमओयु द्वारा 32 कोल कंपनियों को ब्लॉक आवंटित किया गया है। जमीन को बचाने के लिए यह संगठन बनाया गया था। बीच के दौर में संगठन ने थोड़ा उग्र चुन लिया। इसलिए इसी के समानांतर रक्षा समिति शुरू की गयी। आंदोलन धार पकड़ चुकी थी इसे देखकर 2012 से कई राजनीतिक पार्टियों का हस्तक्षेप शुरू होने लगा। नतीजा ये हुआ कि ये जात पात और राजनीतिक समझ के अनुसार ग्रामीणों को बांटने लगे। उन्होंने अपने हिसाब से मांग भी करनी शुरू कर दी। इससे आंदोलन कमजोर होने लगा। फिर सभी पार्टी के लोग प्रशासन और कंपनी के लोगों से मिलकर मध्यस्थता करने लगे। इस तरह से ’कंपनी प्राइवेट’ संघर्ष शुरू हो गया। 56 दिनों से चिरूडील में चल रहे धरना के दौरान 18 सूत्री मांग कंपनी प्रतिनिधियों को सौंपा गया था। कुछ मुख्य बिंदुओं में शामिल था कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार बाजार भाव से चार गुना कीमत बढ़ाकर मुआवजा मिले। प्रभावितों को 26 प्रतिशत हिस्सेदारी दी जाये। यह सुनिश्चित किया जाये की लीज का समय पूरा होने पर कंपनी जमीन वापस करेगी। धरना की जानकारी लेने प्रशासन या कंपनी की तरफ से कभी कोई नहीं आया। लिखित सूचना दे दी गयी थी। कोई बातचीत नहीं हुई। दादागिरी दिखाते हुए अचानक इस तरह की कार्रवाई से सभी के अंदर एक गुस्सा है।
’मुआवजा की लड़ाई नहीं है आंदोलन’
दूसरी बात की यहां 2004 से जो आंदोलन चल रहा है। वो मुआवजा की लड़ाई नहीं थी। संविधान की धारा 39 बी स्पष्ट करता है कि किसी भी प्राकृतिक संसाधन पर वहां की ग्रामसभा का अधिकार है। अदालत में गलत तथ्य पेश किया गया। अभी जो खनन की बात हो रही है वो ग्राम समुदाय के लिए नहीं है। हमलोगों ने आंदोलन को इसी रूप में आगे बढ़ाया था। 8 जुलाई 2013 को जनरल अपील संख्या 4550/2000 की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया जिससे यह बात और पक्की हो गयी। कोर्ट के इस फैसले में कहा गया कि जमीन के नीचे जो भी खनिज है, उसपर जमीन के मालिक का अधिकार है।
’एग्रीमेंट नियम का उल्लंघन कर रही एनटीपीसी’
जब देशभर में कोल ब्लॉक को चिहि्नत किया जा रहा था, एनटीपीसी ने एक अंडरटेकिंग दी थी। शर्त के अनुसार उसने कहा था कि उनके सब लीज में कोई दूसरी कंपनी शामिल नहीं है। यानी वो खुद माइनिंग का काम करेगी। लेकिन एनटीपीसी ने एक आस्ट्रेलियन कंपनी टिसमाइंस कोल खनन के लिए सब लीज दे दिया। पर दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर बताया उसका कोई सब लीज पार्टनर नहीं है। बात जाहिर होने के बाद टिसमाइंस से साथ हुआ एग्रीमेंट कैंसिल किया गया। लेकिन पुनः सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विपरीत एनटीपीसी ने त्रिवेणी सैनिक के साथ समझौता कर लिया है। हमने अपना पक्ष रखते हुए सुप्रीम कोर्ट को यह बात बतायी है। कंपनी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को नहीं मान रही है। सरकार और कंपनी के बीच में एक गठजोड़ बन गया है। ऐसे में हम मांग करते हैं कि मत विभाजन करवाया जाये। इसमें जो फैसला आयेगा हम उसे मानने को तैयार हैं।
बड़कागांव में कितनी जमीन का अधिग्रहण किया जाना है और वास्तविक रूप में अब तक कितनी जमीन का अधिग्रहण हो चुका है?
पकरी बरवाडीह कोल खनन परियोजना के लिए लगभग 17 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। मेरी जानकारी के अनुसार अभी तक 850 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हो सका है। यह भी छिटपुट तरीके से हुआ है। इसमें भी कई खामियां हैं। जमीन किसी और की है। नोटिस किसी और को दिया गया। भुगतान किसी और को हो गया। ऐसे कई मामले अदालत में चल रहे हैं। दलालों ने इसमें बहुत घपला किया है।
आप बता रहे थे कि बीच में आंदोलन कमजोर पड़ गया था, इसकी क्या वजह थी?
बड़कागांव प्रखंड में आबादी के हिसाब से कोइरी, कुर्मी और तेली जाति की बहुलता है। दूसरी जातियों के लोग भी हैं। बीच में हुआ कि सभी ने अपना अलग अलग समूह बना लिया। इस तरह से आंदोलन बंटने लगा था। लेकिन कल की घटना (17 मई, 2016) के बाद जातिगत बंधन टूटा है। सभी समझ चुके हैं कि उनके साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। हम सभी ने बैठक में भी इस बात की चर्चा की।
आप लोगों का संगठन आगे आंदोलन को कैसा स्वरूप देने जा रहा है?
25 से 30 मई से करीब 5000 लोग सामूहिक उपवास पर हैं। इस बीच प्रशासन और सरकार की ओर से बातचीत के लिए कोई नहीं आता है तब 31 मई से हम सभी आमरण अनशन शुरू करेंगे, हमारा आंदोनल पूरी तरह से अहिंसात्मक होगा। हमरा उपवास का कार्यक्रम बड़कागांव प्रखंड मुख्यालय में चल रहा है।




