।। बड़कागांव से लौटकर रणजीत।।
18 मई की सुबह 11 बजे जब हम बड़कागांव प्रखंड के डाड़ीकला गांव की सड़कों से गुजर रहे थे, रास्ते में जगह जगह पर ईंट के टुकड़ों का ढेर और वाहनों के टूटे शीशे बिखरे पड़े थे। सड़क के किनारे खड़े इक्के दुक्के लोग और घरों से बाहर झांक रही महिलाएं, पुरूष और बच्चे सभी हमें देखते ही अपने—अपने घर के अंदर भागने लगे और दरवाजा बंद कर लिया। हर शख्स डरा, सहमा सा दिख रहा था। महिलाओं के चेहरे में एक भय और हर चेहरे के पीछे दबा आक्रोश साफ पढ़ा जा सकता था। हमने वहां रूककर कुछ लोगों को समझाया कि हम घटना के संबंध में बात करने आये हैं, तब उन्हें हमपर थोड़ा भरोसा हुआ। फिर एक, दो, चार, और दर्जनों ग्रामीण वहां इकट्ठा होने लगे। सभी के भीतर उमड़ते जज्बात अब शब्दों के रूप में बाहर निकल रहे थे। हाय पुलिस…! हाय सरकार…! और हाय एनटीपीसी…!
इतना आक्रोश…! आखिर क्यों, पूछने पर अपना दर्द बताते हुए गांव के एक बुजुर्ग फफक पड़ते हैं, ’मंगलवार रात की बात है। पुलिसवाले सैकड़ों की संख्या में यहां आये थे। डकैतों की तरह कई घरों में धावा बोल दिया। दरवाजा, खिड़कियां तोड़ी, घसीट घसीट कर महिलाओं, बुजुर्गों, युवाओं को घर से बाहर निकाला और दना दन लाठियों से पीटने लगे। गर्भवती महिला को भी नहीं छोड़ा। उससे भी बदसलूकी की। कह रहे थे कि किसी भी कीमत पर गांव के गांव खाली करने ही होंगे। खनन के लिए यह जरूरी है। अभी कुछ देर पहले भी कई गाड़ियों में आये थे। रही सही कसर उतार दी। जो सामने दिखा उसे मारते पीटते चिरूडीह की तरफ चले गये। आप ही बताइये पुलिस किसकी रक्षा करने के लिए है?’
इसी भीड़ के बीच से एक महिला चिल्लाती हुई कहती है, ’हमारी चुनी हुई सरकार है। हम तो उसी के भरोसे 56 दिनों से इस कड़ी धूप में धरना पर बैठे थे। साल की तीन फसली जमीन हम कैसे दे दें? सरकार की मर्जी के बिना कैसे कुछ हो सकता है? वो जनता का दुख दर्द समझने के लिए बैठी है। हमारी जमीन क्यों नहीं बचा ले रही है सरकार। हमारे साथ बहुत गलत हुआ…! अब किसपर भरोसा करें? कहां जायें?’
इसी जमघट में खड़ा एक युवा भी अपना गुस्सा नहीं रोक पाता, कहता है, ’जमीन हथियाने के लिए नैशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) अब ग्रामीणों के बीच फूट डालना चाहती है। हमारी पिटाई करवाने से पहले पुलिसवालों को खिलाती पिलाती है। ये हमारे पुरखों की जमीन है। जमीन चली गयी तब हम कहां जायेंगे?’
पुलिस की इस बर्बर कार्रवाई की घटना की पृष्ठभूमि में थोड़ा पीछे चलते हैं। कंपनी के परियोजना क्षेत्र की जद में आनेवाले 36 गांवों के ग्रामीणों और कंपनी के बीच की यह लड़ाई डेढ़ दशक से ज्यादा पुरानी है। इस संघर्ष में शामिल रहे गांव के कुछ लोग बताते हैं कि जब एनटीपीसी के पकरी बरवाडील कोल खनन परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण का निर्णय लिया गया था। ग्रामीणों ने शुरूआत से ही विरोध करना शुरू कर दिया था। इन ग्रामीणों की बात को ऐसे भी समझ सकते हैं कि एनटीपीसी के सीएमडी समय समय पर अलग अलग सरकार के मुख्यमंत्रियों से मिलकर जमीन विवाद का समाधान करने की मांग करते रहे हैं। इस बीच सरकारें बदलती रहीं और इस विवाद का समाधान नहीं निकल सका। इस आंदोलन से लंबे समय से जुड़े रहे कुछ लोग यह भी बताते हैं कि आंदोलन के बढ़ रहे स्वरूप को समझकर कई राजनीतिक पार्टियां इससे जुड़ी और अपना हित पूरा होने पर चली गयीं। इसलिए ग्रामीण अब इन पार्टियों पर भरोसा नहीं करते। ग्रामीणों ने बताया कि इन पार्टियों ने आंदोलन को जात के आधार पर बांटकर इसे कुंद कर दिया था। तब अलग अलग जात से अलग नेता खड़े हो गये। इस तरह आंदोलन की प्रभाव थोड़ा कम जरूर हो गया। लेकिन कल की घटना (पुलिस द्वारा ग्रामीणों की पिटाई) ने आंदोलन में शामिल अलग अलग धड़ों में बंटे लोगों को फिर से एक जगह ला कर खड़ा कर दिया है।
बहरहाल, हम सिंदवारी पंचायत के चुरचू गांव में खड़े हैं और भीड़ में शामिल हर ग्रामीण हमें अपने अपने घर के टूटे दरवाजे, बिखरे सामान और पुलिस की लाठी से घायल अपने परिजनों की हालत दिखाने अपने घर ले जाना चाहता है। इन ग्रामीणों को लग रहा था कि मीडिया में ये खबर आ जाने से पुलिस की बर्बर कार्रवाई का सबूत लोगों के सामने आ सकेगा। कुछ लोगों का यह भी कहना था कि पुलिस की शिकायत पुलिस के पास कैसे करें? उनकी यह शंका सही भी साबित हुई जब हम खनन क्षेत्र चिरूडीह जहां ग्रामीण 56 दिनों से धरना पर बैठे थे वहां का जायजा लेने के बाद वापस गांव लौट रहे थे। रास्ते में बड़कागांव के थानेवार राम दयाल मुंडा दूसरे प्रशासनिक अधिकारियों के साथ खनन का काम चालू करवाने उसी क्षेत्र में जा रहे थे। हमने उन्हें घटना के बारे में बताया। पर उन्होंने ग्रामीणों की पिटाई की बात से साफ इंकार कर दिया। बड़कागांव के चिरूडीह में जहां खनन का काम शुरू हो चुका है, यहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने इस संवाददाता से कहा कि इस जगह पर कोई धरना पर बैठा ही नहीं था। हालांकि यहां से करीब 800 मीटर की दूरी पर एक टेंट लगा था, इसी के बगल में खाना बनाने के बाद टेंट हाउस के सामान भी थे जिससे पता चल रहा था कि यहां कोई बड़ी पार्टी का आयोजन हुआ है। यह ग्रामीणों की उस बात को प्रमाणित कर रहा था कि धरना स्थल पर ग्रामीणों की पिटाई करने से पहले थोड़ी दूरी पर एक पार्टी का आयोजन किया गया था।
फिलहाल, रात की घटना के बाद लोग अभी संभले भी नहीं थे कि हमारे गांव में पहुंचने से कुछ घंटे पहले पुलिस दोबारा कई गांवों में दोबारा घुसी और जिसे सामने पाया उसकी पिटाई कर दी। दाड़ीकला गांव की रहनेवाली सुकरी देवी कुछ देर पहले अस्पताल से लौटी है। उसके सिर पर पांच टांके लगे हैं। सूखे खून से सने एक सफेद कपड़े की आड़ में सूरज की तीखी रोशनी से बचते हुए हमें कल के घटना को विस्तार से बता रही है। डंडे की चोट से सुकरी के दोनों हाथ और पांव सूज गये हैं शरीर के कई हिस्सों में नीले निशान हैं। सुकरी कहती हैं, ’कुछ समझ पाती इससे पहले ही पुलिसवाले मेरे ऊपर टूट पड़े थे, थानेदार राम दयाल मुंडा भद्दी गालियां देते खुद लाठी से मुझे पीटे जा रहे थे। कुछ ही मिनट बाद मैं लहूलुहान होकर धरना स्थल चिरूडीह में जमीन पर गिर पड़ी थी। उसके बाद का कुछ याद नहीं।’ सुकरी के भीतर अपने साथ हुए जुल्म के प्रति गुस्सा दिखता है। पर उनका हौसला भी बुलंद है। कहती हैं, ’हमसे कहा मालिक को बुलाइये। इतने में मारना शुरू कर दिया। दोपहर ढाई तीन बजे की घटना है। हमलोग 100 150 लोग थे। हमलोगों कम संख्या में थे और उनकी संख्या हमसे ज्यादा थी इसलिए मार दिया। लेकिन हम आंदोलन से पीछे हटने वाले नहीं हैं।’ इसी गांव की हीरामणि देवी गर्भवती हैं। जब पुलिस गांव के लोगों को ढूंढ़ ढूंढ़कर मार रहे थे। वो भी अपने घर से बाहर थीं। बताती हैं कि पुलिस वालों ने उसके साथ भी धक्का मुक्की की। हर तरफ सिर्फ चीख को भगदड़ मची थी। वहीं पास में खड़े एक विकलांग बच्चे सोनु को भी पीटा गया है। वह झट से अपने पैट को ऊ पर उठाकर घुटने के नीचे बने जख्म को दिखाता है। सिर्फ सुकरी ही नहीं यहां के कई गांवों में डेढ़ दर्जन से ज्यादा महिलाओं की बर्बरता से पिटाई की गयी है।
क्या है पूरा मामला?
बड़कागांव प्रखंड के दाड़ीकला, सोमवर्षा, सिंदवारी, दाड़ी, नगड़ी, इतीज, सिरया, चुरचू, उरूल समेत कई गांवों के करीब 150 पुरुष महिलाएं अपनी पुस्तैनी जमीन बचाने के लिए तिलैयाटांड (चिरूडीह) में पिछले 54 दिनों से धरना पर बैठे थे। हजारीबाग जिले के बड़कागांव विधानसभा क्षेत्र के 37 गांवों की जमीन एनटीपीसी को दी जानी है। जमीन का अधिग्रहण किया जा चुका है। लेकिन ग्रामीण दिये गये मुआवजे को कम बता रहे हैं। यह सब इसलिए कि बिजली उत्पादन के लिए एनटीपीसी के साथ हुए एमओयु के तहत यहां की करीब 17 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। यह अलग बात है कि अभी तक न सभी प्रभावित परिवारों को मुआवजा दिया गया है और जिन्हें मुआवजा मिला भी है उसमें करीब 200 एकड़ जमीन के मुआवजे का भुगतान जमीन के वास्तविक मालिक को नहीं मिला है। ऐसे कई फरजी मामले अदालत में दायर किये गये हैं। बड़कागांव में अधिग्रहण से प्रभावित होनेवाले 36 गांवों में करीब 3000 परिवार रहते हैं। अधिकांश परिवारों का मुख्य पेशा खेती ही है क्योंकि यहां की जमीन तीन फसल देती है।
85 बरस के सुगन साव कहते हैं, ’12 साल से हमलोग जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हम मानते हैं कि राष्ट्र और राज्यहित में कोयला की जरूरत है। हम कोयला खनन के विरोधी भी नहीं हैं। इस परियोजना में हमारा खतियानी घर, जमीन, खेत सबकुछ चला जा रहा है। और सरकार हमारे 25 कट्ठा जमीन का मुआवजा 10 लाख रूपया दे रही है। दूसरी जगह जमीन की कीमत 20 लाख रुपया कट्ठा है। इसलिए हमें यह मुआवजा मंजूर नहीं है। जब तक हमें हमारा हक नहीं मिलेगा, हम विरोध करते रहेंगे। बड़कागांव विधानसभा क्षेत्र के 35 से ज्यादा गांव के लोग घर से बेघर हो जायेंगे। जमीन अधिगृहित हो चुकी है। हम अपने सामान, मवेशी, हल बैल कहां रखेंगे? ये हमारे आजीविका के साधन हैं। घर से बेघर हो जायेंगे, तब हम कहीं के नहीं रहेंगे। हम किसी भी कीमत पर आंदोलन से पीछे नहीं हटनेवाले हैं। तिलैयाटांड में जहां से खनन शुरू होना है, वहां करीब पौने दो महीना से गांव के करीब 200 औरत, मर्द धरना दे रहे थे। पुलिसवाले 400 की संख्या में होंगे, चारों ओर से घेरकर इन्हें पीटा गया। पुलिस हमारी रक्षक है। हमारी लड़ाई इनसे नहीं, कंपनी से है। 10 साल पहले 25 एकड़ जमीन के लिए 10 लाख रुपया मुआवजा की बात हुई थी। अब 20 लाख देना चाहते हैं। हमारी जमीन साल में तीन फसल देती है। हम एक करोड़ रुपया मुआवजा और एक नौकरी की मांग करते हैं। हमारी जमीन हमारी जिंदगी है। हमारा घर, जंगल, पानी, लकड़ी, जानवर सभी कुछ चला जायेगा। हमारे गांव के कुछ लोगों ने बेटी की शादी करने या बीमारी का इलाज करवाने के लिए मुआवजा ले लिया है। ये उनकी मजबूरी थी। लेकिन 75 प्रतिशत लोगों ने अपनी जमीन नहीं दी है। चुरचू गांव से लगभग 400 परिवार प्रभावित हो रहे हैं। इनमें हिंदु मुसलमान सभी जाति के लोग शामिल हैं। सोनवर्षा में 400 परिवार हैं। जिन्होंने भी अपनी जमीन दी है वो दलाल की झूठी बातों में आकर अब पछता रहा है।
जैसा भुक्तभोगियों ने बताया
यहां 56 दिनों से भूमि अधिग्रहण के विरोध में चल रहे आन्दोलन को तहस नहस करने के लिए पुलिस बर्बता पर उतर आयी है। आंदोलन स्थल पर बैठे करीब 150 लोगों पर लाठियां बरसायी गयीं। बच्चों, महिलाओं को भी नहीं छोड़ा गया। इसमें कई लोग बुरी तरह जख्मी हो गये हैं। महिलाओं की बेरहमी से पिटाई की गयी। कई महिलाएं घायल हो गयी हैं, लेकिन यह तय है कि किसी कीमत पर हम अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। चाहे इसके लिए हमें कितना भी बड़ा आंदोलन क्यों न करना पड़े।
सिकन्दर कुमार, चुरचू गांव।
’पहले पुलिसवालों ने दरवाजे पर लात मारकर कुंडी तोड़ दी। दरवाजा खुला तो सास को पीट दिया। जब पुलिसवाले हमारे घर के दूसरे कमरे का दरवाजा पीटकर वापस जाने लगे तब मैंने सोचा कि दरवाजे के पीछे से छिपकर देखती हूं। यही सोचकर मैं अंदर के कमरे से बाहर वाले कमरे में आयी थी। मुझे एक पुलिसवाले ने देख लिया। जोर से दरवाजे पर डंडे से मारा। फिर लात चलायी। इससे दरवाजे का एक पल्ला टूट गया। मुझे कुछ समझ नहीं आया और मैं रोने लगी। उस पुलिसवाले के पीछे से दो और पुलिसवाले आये और डंडे से मुझे पीटा।’
15 दिन पहले ब्याह कर इस गांव में आयी रीता कुमारी।
हमलोगों ने घर के तीन कमरों में प्याज जमा कर रखा है। आज सुबह अचानक इस तरह से पुलिसवालों के चिल्लाने के डर से मैं मचान पर छिप गयी थी। एक पुलिसवाले ने मुझे कहा नीचे उतरो नहीं तो वहीं आकर मारेंगे। पुलिसवाले पूछ रहे थे कि घर के बाकी लोग कहां गये हैं। मैं उनसे हाथ जोड़कर कहने लगी कि मेरे घर में मम्मी पापा नहीं है। लेकिन उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी। उन्होंने मुझे खींचकर नीचे उतारा। लाठी से मारना शुरू कर दिया।
मीना कुमारी, स्कूली छात्रा।
इस लिंक पर पढ़ें क्या कहते हैं आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता अनिरूद्ध :




