
Dhanbad : सरायढेला थाने की जमादार ममता कुमारी अपनी झूठी प्रतिष्ठा के लिए एक ऐसे लड़के की जिंदगी से खिलवाड़ करने कर अड़ गयीं. जिसने 10वीं में 93 प्रतिशत मार्क्स लाया,12वीं में 73 प्रतिशत मार्क्स था. अभी उसका ग्रेजुएशन का एग्जाम चल रहा है. इस छात्र को बाइक चेकिंग के दौरान सरायढेला में पकड़ा गया. लड़के ने वहां तैनात जमादार ममता कुमारी से कहा कि वह उनके पापा से बात कर लें. इतना कहना था कि ममता ने लड़के से लप्पड़ थप्पड़ कर दी. कहने लगी-तुम्हारी यह हिम्मत. उसके बाद जब उसके पिता दिलीप सिंह आये और कहा कि मैडम बाइक चेकिंग के दौरान इस तरह से मारपीट क्या सही है?. इसे जमादार ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया. बच्चे पर गोली मारने की धमकी देने का आरोप लगाया.
उच्चाधिकारियों और पुलिस यूनियन ने भी जांच में मामले को गलत पाया. इसीलिए संग्येय मामला होने के बाद भी लड़कों को थाने से छोड़ दिया. ममता का इगो हर्ट हुआ. वर्दी का गुमान धूल में मिला. भाजपा नेताओं का दबाव था. इस पर ममता ने धमकी दे दी बिना कार्रवाई अगर छोड़ा गया तो नौकरी छोड़ दूंगी. पूरा पुलिस विभाग पहले तो उसकी जिद्द के आगे झुकी. ममता की शिकायत पर गलत धाराओं के तहत संग्येय मामला दर्ज किया. पुलिस यूनियन ने भी उसे समझाने की भरसक कोशिश की.
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मामला तो ममता के खिलाफ दर्ज होनी चाहिए !
लड़कों पर झूठा केस कर मारपीट, थाने में गलत तरीके से 24 घंटे से अधिक समय तक रोक रखने, अपने वरीय अधिकारी के आदेश की अवहेलना करने आदि को लेकर जमादार पर उचित कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए. यह मांग पीड़ित लड़कों के परिजनों की है. दुर्भाग्य है कि एक भाजपा नेता का बेटा पुलिस प्रताड़ना का नाहक शिकार हो गया और मामले में भाजपाई सिर्फ बचाव की भूमिका में थे. यह सही है कि लड़के जिस बाइक पर था, उस पर बीजेपी लिखा था. इसके पिता दिलीप सिंह भाजपा के मनयीटांड़ मंडल अध्यक्ष हैं. बाइक के नंबर प्लेट पर भाजपा लिखना गलत है. वहीं, यह भी सच है कि पुलिस, तथाकथित मानवाधिकार संगठनों के साथ अन्य संगठनों के नाम लिखे वाहन धड़ल्ले से चल रहे हैं. इस पर रोक नहीं लग रही है. उचित कानूनी कार्रवाई जरूरी है.
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कहते हैं कानून के जानकार
मामले की ऊच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए. न्याय होता हुआ दिखना चाहिए. जमादार ममता के आरोपों की सच्चाई की जांच कर इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए. पुलिस के वरीय पदाधिकारियों को बताना चाहिए कि लड़के को क्यों थाने से छोड़ा गया? क्या सत्तारूढ़ दल के दबाव में पुलिस ने यह कदम उठाया या मामले में जमादार ममता का आरोप गलत पाया? ऐसी स्थिति में लड़कों को प्रताड़ित करने का मुकदमा क्यों नहीं दर्ज किया गया?
पुलिस किसी की भी इज्जत उछालने को स्वतंत्र है. किसी को भी प्रताड़ित करना उसका अधिकार है. इस पर सवाल उठान पुलिस की प्रतिष्ठा का हनन करना है. कानून के साथ मनमाना खेल करने से पुलिस को रोकने में सत्तारूढ़ दल सक्षम नहीं. सत्तारूढ़ दल के लोग भी निरीह हैं, भुक्तभोगी हैं. भला वे आम लोगों के अधिकार की हिफाजत कैसे करेंगे? यानी आम लोग के साथ पुलिस जो न करे वह कम है.




