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बिहार की चुनावी राजनीति में स्पैशल पैकेज और रघुवंश की चिट्ठी

Faisal Anurag

बिहार की चुनावी राजनीति में प्रधानमंत्री की घोषणा और रघुवंश प्रसाद सिंह के राजद से इस्तीफे के बीच कोई संबंध तो नहीं है लेकिन इन दोनों के भावी असर को ले कर चर्चा जारी है. प्रधानमंत्री ने बिहार चुनाव के पहले पैकेज के कार्ड को एक बार फिर आजमाया है. इस बार पहली खेप में 294 करोड़ की योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया है. इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार 4500 करोड़ की योजनाओं की घोषणा की जानेवाली है. प्रधानमंत्री के ऐलान के बाद बिहार में 2015 के चुनाव के पहले की उस घोषणा की भी चर्चा हो रही है, जिसमें  नरेंद्र मोदी ने बड़े ही नाटकीय अंदाज में 1.25 लाख करोड़ के पैकेज की बात कही थी. बावजूद इसके 2015 में भाजपा को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. यह दीगर बात है कि नीतीश कुमार को राजद से अलग करने और उसके साथ सरकार बनाने में भाजपा कामयाब हुई.

विधानसभा के पिछले दो चुनाव गवाह हैं कि वोटरों को रिझाने के लिए पैकेज कार्ड का इस्तेमाल आम हो गया है. 2019 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले हर किसान के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने दो-दो हजार रुपये देने का ऐलान किया था. वित्तीय प्रावधान नहीं होने के बावजूद उस राशि की दो किश्तों का भुगतान चुनाव प्रक्रिया के बीच ही की गयी. विपक्ष ने इसे रिश्वत करार दिया था. यह वह दौर था जब देश भर में किसानों के आंदोलन हो रहे थे और लाखों की संख्या में किसानों ने ससंद का मार्च भी किया था. लंबे समय से भारत का कृषि जगत अनेक संकटों से ग्रस्त है. उसे हल करने के बजाय सरकारों ने किसानों को इस तरह की राहत ही देने का प्रयास किया है. किसानों की कर्जमाफी के सवाल को जिस तरह मोदी सरकार ने मामूली मदद राशि से हल करने का प्रयास किया है, उसे लेकर भी कृषि विशेषज्ञ सवाल उठाते रहे हैं.

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प्रधानमंत्री के ताजा ऐलान को लेकर प्रतिक्रिया भी उतनी ही तल्ख हो रही है. विपक्ष के अनेक दलों ने प्रधानमंत्री की घोषणाओं को लेकर सवाल उठाने के साथ ही 1.25 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा को याद दिलाया है. यह वह जख्म है जो भाजपा के लिए परेशानी पैदा करता रहा है. इस पैकेज का मामूली हिस्सा ही बिहार की सरकार को मिला है. नीतीश कुमार की तारीफ कर प्रधानमंत्री ने यह तो बताया है कि वे ही एनडीए के नेता हैं लेकिन नीतीश कुमार को 1.25 लाख करोड़ वाले सवालों का जबाव तो देना ही होगा. विपक्ष का यही दबाव है.

रघुवंश प्रसाद सिंह के इस्तीफे को लेकर जदयू-भाजपा खेमे में राहत है. दोनों दलों को उम्मीद है कि इससे सवर्ण वोटों को वे और संगठित करने में कामयाब होंगे. सुशांत सिंह राजपूत के बहाने तो इस प्रक्रिया को वे अंजाम देना ही चाहते हैं. लेकिन बिहार में रघुवंश प्रसाद सिंह और लालू प्रसाद का पत्र भी चर्चा में है. रघुवंश प्रसाद सिंह के पत्र के जबाव में लालू प्रसाद ने भी एक मार्मिक पत्र लिखा है. इसका कंटेंट आज की राजनीति का वह नायाब दस्तावेज है जो दो बुजुर्ग नेता महसूस करते हैं. अतीत में लालू प्रसाद का साथ छोड़ कर अनेक बड़े नेता दूसरे दलों में गये. लेकिन लालू प्रसाद ने इस तरह का भावुक और साधिकार वाला पत्र किसी अन्य को नहीं लिखा है. रघुवंश प्रसाद सिंह अभी तो एम्स दिल्ली में आइसीयू में गंभीर स्थिति में हैं. ठीक होकर वे इस पत्र पर किस तरह की प्रतिक्रिया देगें इसका गहरा संबंध बिहार के चुनाव से है.

दोनों ही गठबंधनों में कई तरह के दरार दिख रहे हैं. चिराग पासवान के रुख को देखते हुए यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता है कि वे केवल सीट बारगेनिंग कर रहे हैं या कोई इरादा रखते हैं. जदयू के प्रवक्ता भी उन पर हमलावार बने हुए हैं. भाजपा के केंद्रीय नेता इस तरह की दरार को पाटने में लगे हुए हैं. दूसरी ओर सीट विभाजन राजद के खेमे के लिए भी आसान नहीं है. रालोसपा और मुकेश साहनी की पार्टियां भी विचलित हैं. राजद की बड़ी चुनौती यह है कि जीतन राम मांझी के जाने के बाद वह कोई अन्य अलगाव को रोके. लेकिन राजद की अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की महत्वाकांक्षा घातक साबित हो सकती है.

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