
Ranchi: जीवन जब विषम परिस्थितियों में घिरा होता है, तब आम हो या खास व्यक्ति सबसे पहले वह अपने बारे सोचता है. गिने-चुने ही ऐसे होते हैं, जो खुद से पहले किसी और के बारे सोचते हैं.
इनसान की मदद करने की बात हो तो फिर भी लोग मिल जाते हैं, लेकिन जानवरों के लिए सोचने और करने वाला शायद ही कोई होता है.
इन्हीं गिने चुने लोगों में हैं उपेंद्र. उपेंद्र बोकारो जिले के जैनामोड़ के रहने वाले हैं. इनके पिता का नाम अवतारी महतो है. ये उन लोगों में से हैं, जो लॉक डाउन की वजह से घर नहीं जा सके. लालपुर में हॉस्टल में रह कर बैंकिंग परीक्षाओं की तैयारी करते हैं.
लॉक डाउन में जब लोग जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचा रहे हैं, तो ऐसे में इन्हें ख्याल आया कि जुबान वालों तक खाना तो पहुंच रहा है, लेकिन बेजुबान भूखे रह जा रहे हैं.
बस यहीं से जितेंद्र ने बेजुबानों के लिए भोजन की जुगाड़ करना शुरू किया. अभी ये न केवल भोजन जुगाड़ करते हैं, बल्कि बेजुबान जानवरों के बीच बांटते भी हैं.
लॉकडाउन में बेजुबानों का सहारा बने बोकारो के जितेंद्र
जितेंद्र बताते हैं कि लॉक डाउन में मैं घर नहीं जा पाया. इस दौरान मैंने पाया कि आवारा जानवर भोजन प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, क्योंकि सभी होटल और खाद्य दुकानें बंद हैं.
लालपुर मूल रूप से एक बाजार क्षेत्र है और यहां अधिक छात्रावास हैं जो अभी खाली हैं.
जानवरों की इस समस्या को ध्यान में रखते हुए मैंने रांची के जिला नियंत्रण कक्ष से घर-घर जाकर भोजन एकत्र करने और उन्हें जानवरों के बीच वितरित करने की अनुमति ली.
इसके बाद 29 मार्च से यह पहल शुरू की जो जारी है. वे इस अभियान को 14 अप्रैल तक जारी रखना चाहते हैं.
फिलहाल वे घरों से खाना जमा करने के बाद वे डंगरा टोली चौक से लालपुर चौक तक जानवरों को खाना खिलाते हैं.
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लोग बेजुबानों की भी सोचें
वे कहते हैं कि इस अभियान को चलाने के पीछे मेरा उद्देश्य है कि लोग इससे प्रेरणा लें और बेजुबानों के लिए भी सोचें और कदम उठायें.
वे यह भी कहते हैं कि जुबान वाले तो अपनी बात कह भी देते हैं, लेकिन बेजुबानों न तो कह पाते हैं और न ही उनकी भाषा कोई समझ पाता है.
भविष्य में पशु कल्याण संगठन चलाने ही इच्छा रखने वाले जितेंद्र कुमार को जानवरों के लिए काम करने का इससे बेहतर अवसर दूसरा नहीं लगा. इसलिए इन्होंने इस काम की पहल की और अभियान का रूप देना चाहते हैं.
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