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1870 के राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, राज्यों को निर्देश- धारा 124ए में दर्ज न करें केस

New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राजद्रोह कानून पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है. शीर्ष अदालत ने आज सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों को राजद्रोह के नए केस दर्ज नहीं करने को भी कहा है. अब इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई के तीसरे हफ्ते में होगी. शीर्ष अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा कि वे अब आईपीसी के सेक्शन 124A के तहत लोगों के खिलाफ केस दर्ज किए जाने पर रोक लगाएं. इसी सेक्शन को देशद्रोह कानून भी कहा जाता है. ब्रिटिश दौर के इस कानून को हटाए जाने की अक्सर मांग उठती रही है, जिसे लेकर पिछले दिनों शीर्ष अदालत में अर्जी भी दी गई थी. इसी पर सुनवाई करते हुए अदालत ने यह फैसला दिया है.

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जमानत के लिए अदालत में दे सकते हैं अर्जी

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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जिनपर राजद्रोह का केस चल रहा है और जो जेल में हैं वो जमानत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं. उनपर कार्रवाई पहले की तरह चलती ही रहेगी. ये कोर्ट पर निर्भर करेगा कि आरोपियों को जमानत दी जाती है या नहीं.

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केंद्र की दलीलों को नकारा

केंद्र सरकार ने अदालत में दलील दी थी कि देशद्रोह कानून पर रोक लगाने का फैसला देना गलत होगा, जिसे संवैधानिक बेंच ने भी बरकरार रखने की बात कही थी. केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए अदालत में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जहां तक लंबित मामलों की बात है तो उनमें से हर मामले की गंभीरता के बारे में हमें मालूम नहीं है. इनमें से कुछ मामलों में आतंकवाद, मनी लॉन्ड्रिंग जैसे पहलू हो सकते हैं.

लंबित मामलों अदालतों के समक्ष विचाराधीन हैं और हमें उनकी प्रक्रिया पर भरोसा करना चाहिए. लेकिन अदालत ने केंद्र की दलीलों क नाकाफी मानते हुए रोक लगाने का आदेश दिया.

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क्या है राजद्रोह कानून

1870 में राजद्रोह को कानूनी जामा मिला. जब भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए में इसे शामिल किया गया. अनुच्छेद 124ए के मुताबिक राजद्रोह एक गैर-जमानती अपराध है. इसके दोषी को तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा के साथ जुर्माना तक हो सकता है.

जिस व्यक्ति पर राजद्रोह का आरोप होता है वह सरकारी नौकरी नहीं कर सकता. उसका पासपोर्ट भी जब्त कर लिया जाता है. जो अंग्रेज राजद्रोह का ये कानून लेकर आएं उनके देश में भी साल 2010 में इसे खत्म कर दिया गया.

न्यूजीलैंड में भी पहले यह कानून था जिसे 2007 में खत्म कर दिया गया. पिछले साल ही सिंगापुर में भी इस कानून को खत्म कर दिया गया है.

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