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सरकार टालमटोल कर रही थी, तब महेंद्र सिंह ने बगोदर में खुद के बूते करवा दिया था पंचायतों का चुनाव

शहादत दिवस पर महेंद्र सिंह को याद कर रहा है झारखंड

Sudhir Pal

देश में 24 अप्रैल, 1993 को 73 वें संवैधानिक संशोधन को लागू करने की अधिसूचना जारी हो गयी थी. इस कानून के संसद के दोनों सदनों में पारित होने के साथ ही कई राज्य सरकारों ने केन्द्र सरकार के खिलाफ जुबानी जंग छेड़ दी थी. असल में यह कानून एक मौन क्रान्ति का आगाज था. संविधान के नीति निर्देशक तत्व माने जाने वाले पंचायत राज को संवैधानिक अनिवार्यता घोषित कर दी गयी थी. राज्य सरकारों की जेबी संस्था बनी पंचायतों को अचानक से शक्ति मिल गयी और कुछ हद तक स्वायत्तता भी.

कई अन्य राज्य सरकारों की तरह तत्कालीन बिहार सरकार के लिए भी यह राज्य के अधिकार क्षेत्र में केन्द्र का अनावश्यक हस्तक्षेप था. राज्य में 1978 के बाद से ही गांवों में पंचायतों का अस्तित्व नहीं था. सामाजिक संगठनों का दबाव था कि राज्य सरकार 73वें संशोधन के आलोक में राज्य में पंचायतों का गठन करे, लेकिन राजनीतिक दलों और सरकार के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं था.

माले (तब आई पी एफ) से पहली बार चुन कर बिहार विधान सभा में पहुंचे महेंद्र सिंह पंचायत चुनाव नहीं कराए जाने को लेकर बार-बार सरकार घेरने से बाज नहीं आते थे. सरकार कभी आरक्षण की बात करती तो कभी परिसीमन की तो कभी राज्य निर्वाचन आयोग के गठन को लेकर बहाने बनाते रहती लेकिन पंचायतों में चुनाव नहीं हो रहे थे.

वामपंथी आन्दोलन में सक्रिय महेंद्र सिंह पंचायतों को बदलाव के एक हथियार के तौर पर देख रहे थे. उन्हें समझ थी कि इससे किसानों, खेत-मजदूरों, महिलाओं और शोषित-उपेक्षित हजारों लोगों को गोलबंद किया जा सकता है. नए सत्ता समीकरण गढ़े जा सकते हैं. पंचायतों के बहाने नयी राजनीतिक दस्तक की आहट उन्हें मिल रही थी.

1994 में हुआ था प्रयोग

1994 के शुरूआती महीनों में जब धनकटनी खत्म हो गयी और ग्रामीणों की व्यस्तता थोड़ी कम हुई. महेंद्र सिंह ने अपने विधान सभा क्षेत्र के प्रतिबद्ध कॉमरेडों की बैठक बुलायी. घंटों नयी पंचायत व्यवस्था पर बहस हुई. बहस और चर्चाओं के कई दौर के बाद यह सहमति बनी कि पंचायतों को बड़े बदलाव के राजनीतिक औजार के तौर पर विकसित किया जाये.

हालांकि, बिहार में पंचायतों का अनुभव कोई बहुत बेहतर नहीं था. पुराने पंचायतों में जमींदार और दबंगों का कब्ज़ा था और ये पूरी तरह सत्ताधारी पार्टी के विस्तार का ही स्वरूप था. महेंद्र सिंह किसी मुगालते में भी नहीं थे. उन्हें पता था कि इन पंचायतों का कायांतरण इतना आसान नहीं होगा. लेकिन उन्हें अपने विधान सभा क्षेत्र के अवाम पर भरोसा था. परम्परा से हटकर महेंद्र सिंह का विधान सभा में चुना जाना भी तो इसी आवाम के क्रांतिकारी फैसले का प्रमाण था.

चिलचिलाती धूप और रह-रह कर धूल –आंधी के थपेड़ों के बीच गिरिडीह के बगोदर विधान सभा क्षेत्र की सभी पंचायतों में चुनाव की घोषणा कर दी गयी. मई महीने में चुनाव होना तय हुआ. मीडिया के लोगों ने रिपोर्ट तो बनाई लेकिन डरते-सहमते हुए. आखिर भूमिगत पार्टी के लोकतांत्रिक चुनाव की प्रक्रिया का हिस्सा होने का इतिहास ज्यादा लम्बा तो था नहीं.

फिर चुनाव की घोषणा निर्वाचन आयोग की नहीं थी. जिला प्रशासन हक्का-बक्का था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या होने वाला है. फिर बात महेंद्र सिंह की थी. महेंद्र सिंह की क्षेत्र में तूती बोलती थी. इलाके में महेंद्र सिंह और उनकी पार्टी का प्रचंड जन समर्थन था. हवा-हवाई राजनीति करने वालों ने इसे ‘राष्ट्र द्रोह’ और अवैध करार दिया. जिला प्रशासन ने बिहार सरकार को पत्र लिख कर इस पर मंतव्य मांगा.

हर प्रखंड के लिए अलग-अलग निर्वाचन कमेटी बनी

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग की तर्ज पर तीन लोगों की निर्वाचन कमेटी बनाई गयी. कमेटी में ऐसे लोगों को रखा गया जिनकी निष्ठा और निष्पक्षता पर किसी को संदेह नहीं था. हर प्रखंड के लिए अलग-अलग निर्वाचन कमेटी गठित की गयी. निर्वाचन कमेटी ने निर्वाचन नियामावली को सार्वजनिक किया.

वोट डालने की तारीखें तय की गयीं. चुनाव में खड़ा होने वालों के लिए नामांकन की व्यवस्था की गयी. नामांकन के प्रपत्र बनाये गये. निर्धारित तिथि के भीतर नामांकन की प्रक्रिया पूरी कर ली गयी. उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह आवंटित किये गए. चुनाव का आलम यह था कि निर्वाचन कमेटी के पास चुनाव से सम्बंधित दर्जनों शिकायतें भी आईं और उनका निवारण भी हुआ

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हर पंचायत से एक प्रधान और 11 लोगों की कार्यकारिणी का चुनाव किया जाना था. जो जिस पद के लिए खड़ा होना चाहते थे उन्हें उसके लिए नामांकन करना था.भीषण गर्मी के बावजूद गिरिडीह के सैकड़ों गांवों के खेत-खलिहानों में ‘पंचायत’ चुनाव को लेकर एक अजीब तरह का उत्साह था. उम्मीदवारों के चुनाव अभियान में ग्रामीण अपने गांव के मुद्दों पर बात करते, किसानों और खेत मजदूरों की समस्याओं पर चर्चा करते और उम्मीदवारों के सामाजिक सरोकारों की पडताल करते थे.

उम्मीदवारों ने समाज के प्रभावशाली तबके को पंचायती राज की सफलता में सबसे बड़ी बाधा बताते हुए अपने चुनाव अभियान को एक नयी राजनीति की पहल के तौर पर स्थापित किया. लोगों को समझ आने लगा कि गांव के स्तर पर सत्ता के विकेंद्रीकरण को कुछ लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. लेकिन यह समझ आ रहा था कि एक मौन क्रांति की शुरुआत है.लोगों में उम्मीद जगी कि इसके असर से अगले कुछ सालों में गांवों की तस्वीर बदल जायेगी.

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बिहार विधान सभा में सदस्यों ने राष्ट्र और कानून विरोधी बताया

गिरिडीह में जनता द्वारा स्वयं पंचायत चुनाव कराने को लेकर पटना के राजनीतिक हलकों में हंगामा मच गया. बिहार विधान सभा में सदस्यों ने इसे राष्ट्र और कानून विरोधी बताते हुए इसे रोकने और इस पर तुरंत कारवाई की मांग की. विधान सभा में महेंद्र सिंह ने जो कहा वो ऐतिहासिक था.

उन्होंने कहा कि नेताओं, नौकरशाहों और बड़े जमींदारों का गिरोह पंचायती राज को सफल नहीं होने देने के लिए जिम्मेदार है. पंचायती राज के पास ताकत जाने से इन्हें अपना अस्तित्व खतरे में लग रहा है. बगोदर की जनता ने एक नई राह दिखाई है, इसका हमें स्वागत करना चाहिए. जब राज्य सरकार अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह नही कर पा रही है और चुनाव नहीं करवा रही है तो जनता अपने अधिकारों के लिए आगे आई है.

सरकार के पास इतना नैतिक दायित्व नहीं था कि कोई कार्रवाई करती. इस चुनाव में बगोदर-सरिया से 60, बिरनी से 40, धनवार से 20, गावां से 40 सहित लगभग 200 प्रतिनिधि चुने गये.हर पंचायत में एक प्रधान और 11 सदस्य चुने गए. हर पन्द्रह दिनों के अन्तराल पर कार्यकारणी की बैठक आनिवार्य कर दी गयी. फैसले बहुमत से होते.

73 वें संशोधन की कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग इन पंचायतों ने किया. गांव के संसाधनों के मामले में फैसले लिए जाते और गांव उसे स्वीकार करता. भले पंचायत के पास आज की तरह वित्तीय शक्ति नहीं थी लेकिन उनके फैसलों तो टालना या न मानने की नौबत कभी नहीं आई. यह नौकरशाही के खिलाफ एक तरह से ग्राम सत्ता की संगठित ताकत थी. गांव के झगड़े-झंझट के मामले में ये पंचायतें हस्तक्षेप करतीं. जंगल, जमीन और जल जैसे सामुदायिक संसाधनों के प्रबंधन और उपयोग पर निर्णय लिए जाते और गांव इस पर अमल करता.

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महेंद्र सिंह ने बगोदर में पंचायत चुनाव के प्रयोग से ऐसी राजनितिक अलख जगायी कि विरोधी साहस ही नहीं कर पायें कि इसका विरोध कर सकें.

चुनावी अभियानों को संबोधित करते हुए महेंद्र सिंह हमेशा कहते कि देश में पंचायती राज के प्रभावकारी ढंग से लागू होने के मार्ग में चार शत्रु हैं. नंबर एक राजनीतिक लोग हैं. वे पंचायतों को महत्व नहीं देना चाहते. वे सत्ता के विकेंदीकरण से घबराए हुए हैं. दूसरे नंबर पर नौकरशाह हैं जो पंचायती राज के अधीन काम करना अपनी तौहीन समझते हैं और नेताओं के साथ इनकी मिलीभगत है. तीसरे दुश्मन बड़े भूपति हैं. जिनकी चौधराहट को पंचायतें सीधे चुनौती देती हैं. चौथे नंबर पर ठेकेदार हैं, जो पंचायती राज को अपने धंधे के लिए खतरा मानते हैं.

महेंद्र सिंह ने लोगों को राजनीतिक तौर पर इतना सजग कर दिया था कि चार साल के कार्यकाल में पंचायत में गड़बड़ियों के शायद ही कोई शिकायतें मिली. इस प्रयोग ने लोगों को एक सीख दी, सरकार की सबकुछ नहीं है. जनता है तो व्यवस्था है.

(लेखक झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं और पंचायत विषय के जानकार हैं.)

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