
Faisal Anurag
राज्यसभा में अधिक से अधिक सीट जीत लेने की महत्वाकांक्षा ने लोकतंत्र को बंधक बना दिया है. रिसोर्ट इस बंधक राजनीति का डिटेंसन सेंटर बन गये हैं. एक तरफ कोरोना के कोविड 19 वायरस का आंतक पूरी दुनिया पर छाया हुआ है. वहीं दूसरी ओर भारत के रिसोर्ट जनप्रतिनिधियों के कैंप बने हुए हैं.
इन कैंपो की पार्टी विशेष के लोग पुलिस के साथ मिल कर रखवाली कर रहे हैं. जहां परिंदा भी नहीं घुस सकता है.
बैंगलुरु के रिसोर्ट में तो मध्यप्रदेश के दो मंत्रियों को अपने ही दल के विधायकों से मिलने के क्रम में जोर-जबरदस्ती का सामना करना पड़ा. और बाद में पुलिस ने भी गिरफ्तार किया. कर्नाटक से पैदा हुआ यह वायरस अब पूरे देश में पसर रहा है.
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मध्यप्रदेश का घटनाक्रम जाहिर करता है कि हर हाल में सरकार बनाना ही मकसद बन गया है. दलबदल की समस्या तो राजनीतिक नैतिकता का मामला भी नहीं रह गया है. दलबदल कानून की जिस तरह धज्जियां उडायी गयीं है, उससे जाहिर है कि पूरे संसदीय जनतंत्र को एक बड़े सुधार की जरूरत है.
और देश के लोकतंत्र पसंद लागों को इसके लिए आगे आने की जरूरत है. कोई भी लोकतंत्र अपनी परपरांओं और अंतरनिहित नैतिक मूल्यों के बगैर असर खो देता है.
सजग वोटरों और नागरिकों के लिए यह चिंता का सबब है कि आखिर इनके वोट के माध्यम से अभिव्यक्त आकांक्षा के साथ धनबल के सहारे बार-बार खिलवाड़ क्यों हो रहा है. सजग वोटर जिन आधारों पर वोट प्रक्रिया का हिस्सा बनता है, उसे ही हतोत्सहित कर देने की इस प्रवृति ने भारत के लोकतंत्र का सबसे बड़ा नुकसान किया है.
एक ऐसे देश में जहां राजनीतिक दलों के लिए उनके ही चुनावी वायदों का कोई खास मायने नहीं रहता है, चुने हुए लोगों को बंधक बना कर किसी सरकार को गिरा देने और नई सरकार बना लेने के खेल के गहरे असर को अब नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. पहले ही बहुत देर हो चुकी है.
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इस संदर्भ में हाउ डेमोक्रेसी डाई पुस्तक के लेखकों स्टीवन लेविटस्की और डेनियल जिबलाटी ने उन हालात की विस्तार से चर्चा की है जिसमें दुनिया भर के सर्वाधिक लोकप्रिय शासन-प्रणाली डेमोक्रेसी लगतार कमजोर हो रही है.
लेखकों सवाल जनतंत्र के भविष्य को ले कर है. अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस जर्मनी, भारत सहित दुनिया के तमाम बड़े लोकतंत्र अनेक संकटों से घिरे हुए हैं.
इनमें कई देशों में एकाधिकार व अधिनायकवादी प्रवृतियां हावी होती जा रही हैं. इसके लिए लोकतांत्रिक नैतिकता का पहले क्षरण किया जाता है और फिर पूरी राजनीतिक प्रणाली को ही आमलोगों की नजरों में संदिग्ध बना दिया जाता है. यह पुसतक दुनिया भर में चर्चा में है. इसमें जोर दे कर कहा गया है कि लोकतंत्र में ऐसे नेताओं का उदय हुआ है जहां वे बताते हैं कि उनके तमाम निर्णय राष्ट्रहित में हैं. और उनकी आलोचना या उनकी नीतियों का विरोध राष्ट्रविरोधी है.
एक तरह से लोकतंत्र की यह एक ऐसी परिभाषा है जो लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा करती है. इसके लिए विपक्ष को कठघरे में खड़ा कर उस पर लगातार हमले किये जाते हैं. और ऐसे वोटरों का निर्माण किया जाता है जो भीड़ बन जाते हैं. और विवेकसम्मत निर्णय पर भीड़ की प्रवृति के शिकार हो जाते हैं. भारत के रिसोर्ट बंधक लोकतंत्र की इसी प्रक्रिया को गति दे रहे हैं.
वह दौर तो बहुत पीछे चला गया है, जब राजनीति को नैतिकता माना जाता था. सत्ता के लिए हर नैतिकता का त्याग भीड़ में मान्य हो जाना बताता है कि वोटर के विवेक को स्वतंत्र रहने के हालातों को ही प्रभावित कर दिया गया है. अपनी तकलीफों से सत्ता बदल देने वाले वोटर अंतत: निराश होने के लिए बाध्य हैं.
इस का एक और परिणाम यह है कि राजनीति को विचारहीन बना कर भी जनसमर्थन हासिल किया जा सकता है. अमरीकी चुनावों में इस प्रवृति को देखा जा सकता है. जहां तमाम कारपोरेट ताकतें एकजुट हो कर अमरीकी ड्रीम की ही हत्या कर रही हैं.
चुनाव सुधारों की मांग की प्रासंगिकता इस अर्थ में और अधिक अहम हो गयी है कि भारत के लोगों को लोकतंत्र को न केवल रिक्लेम करना है बलिक डेमोक्रेटिक और संवैधानिक मोरालिटी को भी बचाये रखना है.
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