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वर्तमान राजनीति में भूचाल का कारण बना राफेल

एनसीपी इस पूरे मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की अपनी मांग पर अडिग है.

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Faisal Anurag

लगातार गहराते राफेल विवाद के बीच विपक्ष के एक प्रमुख नेता शरद पवार के बयान से राजनीति में भूचाल सा आ गया है. उस बयान के अनुसार पवार ने नरेद्र मोदी को इस मामले में क्लिन चीट दे दिया है. इस बयान के बाद उनकी ही पार्टी के सांसद और संस्थापक सदस्य तारीके अनवर ने पार्टी और लोकसभा सदस्य से इस्तीफा दे दिया है. एनसीपी के एक प्रमुख नेता प्रफफुल पअेल ने मीडिया में आयी शरद पवार के बयान को गलत तरीके से पेश करने की बात कह इस विवाद को ओर हवा दे दिया है. पटेल ने कहा है कि पवार ने कोई क्लिन चीट नहीं दिया है. उन्होने ने कहा है कि राफेल के बारे में जो आरोप है वे बेहद गंभीर हैं और एनसीपी इस पूरे मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की अपनी मांग पर अडिग है.

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पटेल के बाद भाजपा के उस अभियान को धक्का लगा है जिसमें वह पवार के बयान को आधार बना कर आरापों को खरिज करने के अभियान को गति देने में और आरोप लगाने वालों को कठघरे में खड़ा करने की रणनीति बना चुकी थी. पअेल के बयान का खंडन किसी ने भी नहीं किया है. एनसीपी के उठे विवाद को थामने में यह बयान कितना कारगर होगा यह तो आनेवाला वक्त ही बताएगा. पटेल की कोशिश है कि पार्टी की भाजपा विरोधी साख बनी रहे. पवार के बयान से पैदा हुए हालात के बाद भाजपा और एनसीपी के गठबंधन की बात तक लोग करने लगे थे.

भारतीय जनता पार्टी राफेल मामले में कांग्रेस को विपक्षी खेमें में ही अलग थलग करने की योजना पर कार्यरत है. राफेल मामले में कई विपक्षी दल जिस तरह की भूमिका निभा रहे हैं, उससे भाजपा खुश है. राफेल मामले में हर बीते दिन के साथ कई गंभीर सवाल सामने आ रहे हैं और प्रधानमंत्री उसमें घिरते जा रहे हैं. फ्रांस के वर्तमान राष्ट्रपति मेकरां ने भी साफ कह दिया है कि जब यह समझौता हुआ था वह पद पर नहीं थे. उन्होने ओलांद के बयान का खंडन नहीं किया. अभी तक फ्रांस की सरकार ने ओलांद ने जो कहा उसका खंडन नहीं किया है. ओलांद ने कहा था कि भारत सरकार ने अंबानी का नाम पेश किया था और फ्रांस के पास इसे मानने के सिवा कोई विकल्प नहीं था.

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राफेल मामले में तीन सवाल बेहद अहम हैं. एक तो यह कि राफेल विमानों के दाम किन कारणों से बढ़े, यदि वायु सेना ने 126 विमानों के जरूरत बतायी थी तो फिर 36 विमान ही क्यों खरीदे गए. टेक्नोलॉजी स्थानांतरण को क्यों नहीं कराया गया. दाम बढ़ाने के मामले में जबकि संयुक्त सचिव ने आपत्ति की थी. उसे किन हालातों में ओवर रूल किया गया. दूसरा समितियों को अंधकार में रख कर प्रधानमंत्री ने खुद के निर्णय से ही क्यों समझौता किया. उनकी मंशा क्या थी और तीसरा सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान एचएएल को हटा कर अंबानी के कंपनी को ऑफसेट क्यों दिया गया.

बाजपेयी सरकार में मंत्री रहे अरूण शौरी और यशवंत सिन्हा इसे बेहद गंभीर भ्रष्टाचार का मामला बता रहे हैं. प्रधानमंत्री की चुप्पी को लेकर विपक्ष के अनेक नेता खास कर राहुल गांधी लगातार आक्रामक होते जा रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी सवालों का जबाव देने के बजाय राहुल गांधी और कांग्रेस का मजाक बनाने की रणनीति को अमल में ला रही है. अमित शाह इस हमले का नेतृत्व कर रहे है. प्रधान मंत्री भी कांग्रेस पर लगातार हमले कर रहे हे. इस हमले में भाषा और मर्यादा लगतार तार-तार हो रही है. भाजपा को भरोसा है कि लोग उसकी रणनीति से प्रभावित होंगे और मूल सवालों की चर्चा रूक जाएगी.

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दूसरी ओर भाजपा की इस रणनीति के बदले कांग्रेस लगातार राफेल मामले में नए-नए खुलासे कर रही है और वह लगातार प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ी कर रही है. बोफोर्स के जमाने की तरह ही रक्षा मामले का यह सौदा अनेक सवालों को जन्म दे रहा है. बोफोर्स तो मात्र 464 करोड़ के कमीशन का मामला था लेकिन राफेल का मामला 30 हजार करोड़ का है. इसमें कमीशन से ज्यादा गंभीर सवाल अंबानी का सरकार का पक्ष लेना है. इससे यह सवाल भी भारत में उठ रहा है कि क्या भारत की राजनीति अब कॉरपोरेट घरानों को खुश करने के लिए ही है. प्रेक्षक यहां तक कह रहे हैं कि कॉरपोरेट के पक्ष में कोई भी सरकार इस तरह नहीं उतरी है. जिस तरह मोदी सरकार इसे लेकर अनेक तरह के आरोप गंभीर होते जा रहे है.

प्रधानमंत्री इस मामले में जितना खामोश रहेंगे उससे संदेह उतना ही गहरा होता जाएगा. प्रधानमंत्री बहुत देर तक इस सवाल पर चुप नहीं रह सकते. उन्हें प्रत्येक सवाल का जबाव देर-सबेर देना होगा क्योंकि इस पूरे मामले का संबंध भारत फ्रांस के संबंधों के साथ ही देश की सुरक्षा से जुड़ा है.

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