न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

डर के माहौल में राहुल बजाज की बगावत

1,759

Faisal  Anurag

इतिहास गवाह है कि तानाशाहों ने सच को बगावत ही माना है. भारत में भी सच कहने वाले सत्ता के बागी ही माने जाते रहे हैं. यही कारण है कि यह नारा बार-बार गूंजता है. सच कहना यदि बगावत है तो समझो हम भी बागी ही हैं. जिस राहुल बजाज को भारतीय जनता पार्टी ने शिवसेना के सहयोग से 2006 में राज्यसभा भेजा था अब उनकी ही बातों को राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने वाला बताया जा रहा है.

इसे भी पढ़ेंः ओरमांझी में बस-जीप में भीषण टक्कर- पांच लोगों की मौत, आठ घायलों में से तीन की हालत नाजुक

और आईटी सेल उनका ट्रोल करने में आगे आ गया है. राहुल बजाज ने वही कहा है जो देश के दो पूंजीपतियों को छोड़ सभी पूंजीपति कहना चाहते हैं. लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं. जिस तरह विरोधियों के खिलाफ ईडी और सीबीआइ का इस्तेमाल हो रहा है, उसका आतंक हर जगह महसूस किया जा सकता है.

hotlips top

तानाशाहों की फितरत को द टेलीग्राफ ने इदी अमीन के एक कोट के माध्यम से बेपर्द कर दिया है. इदी  अमीन वही शासक था, जिसने  यूगांडा को बर्बाद कर दिया. अनेक भारतीय को वह दिन भी याद होगा जब एक इदी अमीन ने 24 घंटे के अंदर भारतीयों समेत अनेक देशों के लागों को यूगांडा छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था.

इदी अमीन के जुल्मों से यूगांडा की तबाही के अनेक दर्दनाक मामले उजागर हो चुके हैं. इडी अमीन का कोट है: बोलने की स्वतंत्रता तो है लेकिन मैं बोलने के बाद स्वतंत्रता की गारंटी नहीं दे सकता. कई लोकतांत्रिक देशों में भी अभिव्यक्ति की आजादी का यही हश्र देखा जा सकता है. राजनीतिक तौर पर विरोधियों को देशद्रोही बताने की प्रक्रिया बताती है कि आलोचनाओं के लिए सत्ताधीशों के मन में कितना कम सम्मान है.

30 may to 1 june

इसे भी पढ़ेंः #BJP MP अनंत हेगड़े का दावाः केंद्र के 40 हजार करोड़ लौटाने के लिए फडणवीस बने 80 घंटों के लिए CM

आलोचना को विरोध मान लेने की प्रवृति लोकतंत्र के लिए बेहद घातक प्रवृति है. यह उन देशों में बेहद खतरनाक संकेत देती है, जहां अधिकांश प्रमुख मीडिया ने भी अपने चरित्र को सत्ता के अनुकूल बना रखा हो.

राहुल बजाज ने जिस अंदाज में अमित शाह सहित दो अन्य मंत्रियों के समक्ष जो कुछ कहा, उसका बहुत गहरा असर हुआ है. भाजपा ने राहुल बजाज की आलोचना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. भाजपा आईटी सेल के प्रमुख ने तो ट्रोलिंग भरे अंदाज में हमला किया है, तो वित्तमंत्री का ट्विट बताता है कि सरकार इंडस्ट्री के संकट को समझने के बजाय राष्ट्रवाद के भ्रम को फैलाये रखने के लिए आमादा है.

जीडीपी के ढहने और खास तौर पर कोर सेक्टर के आंकड़े बताते हैं कि बीमारी जानलेवा हो गयी है. औद्योहिगक क्षेत्र का उत्पादन का आंकड़ा तो माइनस में चला गया है.

राहुल बजाज के साथ समय-समय पर सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना करने वाले उद्योग जगत की हस्तियों की सूची में जो प्रमुख नाम है, उनमें कुछ हैं- बायोकॉन की MD किरण मजूमदार शॉ, L&T के चेयरमैन एएम नाइक, HDFC के चेयरमैन दीपक पारेख, इंफोसिस से जुड़े पई मोहनदास, कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटी के को-हेड संजीव प्रसाद और माहेश्वरी वेल्थ एडवाइजर के को-फाउंडर बसंत माहेश्वरी.

यही नहीं, सरकार के आंकड़े को ले कर भी सरकार से ही जुड़े रहे लोगों में मततभेद हैं. सुब्रह्ण्यम स्वामी तो जीडीपी मात्र एक प्रतिशत मान रहे हैं. इधर, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार समिति के प्रमुख रह चुके अरविंद सुब्रह्ण्यम कह रहे हैं कि यह आंकडा केवल 2.5 प्रतिशत है.

भारत के औद्योगिक घरानों में बजाज परिवार का अतीत आजादी की लड़ाई के एक प्रमुख के रूप में रहा है.  राहुल बजाज के दादा जमनालाल बजाज तो महात्मा गांधी के बेहद करीब थे. और वे आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेते हुए जेल भी गये थे. राहुल बजाज ने अमित शाह के सामने ही कहा कि आप सब को अच्छा तो नहीं लगेगा लेकिन मेरा नाम जवाहरलाल जी ने ही रखा था.

मोदी की सरकार और भाजपा तो बार-बार जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ प्रचार चलाती रही है. शेखर गुप्ता को दिये गये एक इंटरव्यू में राहुल बजाज ने जवाहरलाल जी और इंदिरा जी के साथ अपने परिवार के संबंधों को ले कर गर्व प्रकट किया. उन्होंने कहा कि उनकी मां के साथ इंदिरा जी के अंतरंग संबंध थे.

इतने गहरे संबंधों के बाद भी 2006 में राहुल बजाज कांग्रेस के आलोचक बन गये. और भाजपा-शिवसेना ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया. 2013 में उन्होंने तो नरेंद्र मोदी की तरीफ की. और भारत का उन्हें भविष्य बता दिया. वहीं राहुल बजाज उद्योग घरानों की पीड़ा व्यक्त करते हुए लोकतंत्र के सीमित होने और डर के माहौल की चर्चा कर रहे हैं.

डर के माहौल की चर्चा तो फिल्म इंडस्ट्री के भी कई लोगों ने की. लेकिन फिर उन्हें घुटना टेकने के लिए बाध्य कर दिया गया. हालात तो ऐसे बना दिये गये हैं कि सार्वजनिक रूप से आलोचना करने की हिम्मत जुटाने से लोगों का भय बार-बार उभर कर सामने आता गया है.

यहां तक कि उन छात्रों को भी देशद्रोही बता दिया गया जिन्होंने हक की आवाज बुलंद की है. आदिवासी दलित हित की बात करने वाले तो अनेक लोग जेलों में बंद हैं. इमरजेंसी को छोड़ कर इस तरह के हालात भारत में कभी नहीं रहे हैं. बड़े से बड़े विरोध के स्वर को रोकने के लिए जिस तरह सुरक्षा बलों का इस्तेमाल हो रहा है, उसके भी अपने खतरे हैं.

इसे भी पढ़ेंः मोबाइल फोन यूजर्स को बड़ा झटकाः Jio, वोडा-आइडिया,एयरटेल ने महंगे किये कॉल रेट और इंटरनेट सेवाएं

 

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

o1
You might also like