
Dr. Neelam Mahendra
राजस्थान प्रदेश प्रभारी के पद पर अविनाश पांडे की जगह अजय माकन की ताजा नियुक्ति इस बात का संकेत है कि राजस्थान की राजनीति में अभी बहुत कुछ बाकी है. सचिन पायलट और अशोक गहलोत की हाथ मिलाती तस्वीरों से भले ही यह संदेश देने की कोशिश की गयी हो कि सब कुछ सामान्य हो गया है. लेकिन अजय माकन के प्रदेश प्रभारी के पद की नियुक्ति उन तस्वीरों को धुंधला कर रही है. अजय माकन की ताज़ा नियुक्ति इस बात की ओर इशारा कर रही है कि राजस्थान का राजनैतिक संकट खत्म नहीं हुआ है बस कुछ समय के लिए टल गया है. क्योंकि यह केवल तजुर्बे और युवा जोश की लड़ाई नहीं है,यह अहम का टकराव है अस्तित्व का संघर्ष है.
दरअसल पहले कर्नाटक और फिर मध्यप्रदेश में कांग्रेस के हाथ आयी हुई सत्ता फिसलने के बाद राजस्थान कांग्रेस के लिए काफी अहम बन चुका था. गहलोत और पायलट की आपसी खींचतान की कीमत इस बार कांग्रेस आलाकमान चुकाने के लिए तैयार नहीं थी. इसलिए उसने मध्यप्रदेश में अपनी गलती से सबक सीखा. जिस संवादहीनता और संवेदनशून्यता को ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने का सबसे बड़ा कारण माना गया उसे सचिन पायलट के संदर्भ में कारण नहीं बनने दिया गया. लेकिन जिस तरह के कदम पायलट द्वारा उठाए गए और उनके प्रतिउत्तर में जिस प्रकार के बयान गहलोत द्वारा दिए गए उससे राजस्थान में कांग्रेस की स्थिति वाकई में दो मुंही तलवार पर चलने जैसी हो गयी थी.
क्योंकि गहलोत पीछे हटने को तैयार नहीं थे और पायलट सब्र करने के लिए. नतीजन आत्मविश्वास से भरे अनुभवी गहलोत ने सरकार बचाने के लिए आक्रामक होने का फैसला लिया. उन्होंने पायलट को चारों तरफ से घेर लिया. उनके द्वारा लगातार सचिन पायलट पर पर्सनल अटैक करके उनके स्वाभिमान पर चोट की जा रही थी. ऐसी स्थिति में पायलट को कांग्रेस में रोके रखना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती थी. क्योंकि स्थिति वहां तक पहुंच गई थी जहां राज्य के स्पेशल ऑपेरशन ग्रुप द्वारा पायलट को नोटिस भेजा जाता है. गहलोत के खेमे के विधायकों को एक होटल में ठहराया जाता है. जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता. विधायकों से कोई भी बाहरी व्यक्ति किसी भी प्रकार संपर्क न कर पाये इसके लिए उस होटल में जैमर्स तक लगाए जाते हैं.
विधायकों की खरीद-फरोख्त की एफआईआर दर्ज करवाई जाती है. पायलट पर भाजपा के साथ मिलकर सरकार गिराने की साजिश रचने का आरोप लगाया जाता है. इसकी शिकायत करते हुए गहलोत द्वारा प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी जाती है. इतना सब होने के बाद भी अगर आज सचिन पायलट कांग्रेस में हैं और गहलोत सरकार को अभयदान प्राप्त हो जाता है तो कांग्रेस बधाई की पात्र तो है लेकिन इसका श्रेय उसे अकेले नहीं दिया जा सकता. दरअसल कई बार कमजोर प्रतिद्वंद्वी भी जीत का कारण बन जाता है. राजस्थान में भी कुछ ऐसा ही हुआ. राजस्थान में भाजपा अपनी आपसी फूट के चलते कांग्रेस की फूट का वैसा फायदा नहीं उठा पायी, जैसा उसने मध्यप्रदेश में उठाया.
यहां यह बात भी गौर करने लायक है कि भले ही सचिन पायलट की सिंधिया की ही तरह भाजपा में शामिल होने की अटकलें लगायी जा रही थीं. लेकिन दोनों की परिस्थितियों में बहुत फर्क था. यह भी शायद राजस्थान के मामले में कांग्रेस के पक्ष में बाजी जाने का एक प्रमुख कारण कहा जा सकता है. क्योंकि जहां सिंधिया की पारिवारिक पृष्टभूमि में भाजपा शामिल रही है, राजमाता विजयाराजे सिंधिया जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थीं और आज भी वो भाजपा में अटलबिहारी के समकक्ष कद रखती हैं. उनकी बुआ यशोधरा और वसुंधरा भाजपा की वरिष्ठ नेत्री हैं.
वहीं सचिन पायलट का भाजपा से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं रहा है. बल्कि यदि यह कहा जाये कि भाजपा विरोध की उनकी पृष्ठभूमि रही है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. क्योंकि उनकी पत्नी कश्मीर में भाजपा की विरोधी नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेता फारूख अब्दुल्ला की बेटी और उमर अब्दुल्ला की बहन हैं. ये दोनों ही जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद नज़रबंद कर दिये गये थे और जिनपर पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट भी लगाया गया था. यही वजह थी कि जहां एक ओर सिंधिया ने धारा 370 पर कांग्रेस में रहते हुए पार्टी लाइन के विपरीत मोदी सरकार के फैसले का स्वागत किया था, वहीं पायलट ने हालांकि धारा 370 पर कोई बयान नहीं दिया था. लेकिन फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की नजरबंदी पर सवाल उठाये थे.
ऐसे में पायलट की भाजपा में एंट्री सिंधिया जितनी सहज नहीं थीं. लेकिन कहते हैं कि राजनीति में ना कोई मित्र होता है ना कोई शत्रु. समय और परिस्थितियां सब समीकरण बदल देते हैं. हो सकता है कि जो समीकरण आज की परिस्थितियों में नहीं बन पाये, वो समय के साथ कल बन जाये. क्योंकि राजनीति में असंभव कुछ भी नहीं होता. क्योंकि अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि गहलोत सरकार को अभयदान के बाद अब पायलट अपने विधायकों के लिए एक डिप्टी सीएम समेत सरकार में पांच पदों की मांग कर रहे हैं.
स्पष्ट है कि इस राजनैतिक ड्रामे का अभी अंत नहीं मध्यांतर हुआ है. राजस्थान की राजनीति में अभी बहुत कुछ शेष हैं. पिक्चर अभी बाकी है.
डिस्क्लेमर: लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं.





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