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पलामू : 5 एकड़ में लगी अफीम की फसल पुलिस ने नष्ट की, नक्सल-आपराधिक गठजोड़ से होती है खेती

Palamu :  अकाल और सुखाड़ के लिए चर्चित पलामू में पोस्ते (अफीम) की फसल इन दिनों लहलहा रही है. पोस्ते की फसल को देखकर लगता है कि उसे काफी समय पहले लगाया गया होगा. फसल में फूल लग गये थे. अगले कुछ दिनों में फल लग जाते.

जिले के नक्सल प्रभावित मनातू और पांकी थाना क्षेत्र में इन दिनों बड़े पैमाने पर पोस्ते की खेती की गयी है. मनातू थाना क्षेत्र में पोस्ते की फसल तैयार होने की सूचना पर आज बड़ी कार्रवाई की गयी. 5 एकड़ में लगी पोस्ते की फसल पुलिस ने अभियान चलाकर नष्ट की

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अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी के नेतृत्व में कार्रवाई की गयी 

मनातू थाना क्षेत्र के डुमरी पंचायत के अंतर्गत और बिहार की सीमा से सटे इलाकों में बड़े पैमाने पर पोस्ता लगाये जाने की सूचना पुलिस को मिली थी. सूचना पर लेस्लीगंज अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी अनूप बड़ाइक के नेतृत्व में मनातू थाना प्रभारी संतोष कुमार सिंह ने वन भूमि एवं आंशिक रूप से रैयती सहित कुल 4 से 5 एकड़ जमीन पर लगी पोस्ते की फसल को नष्ट किया.

वन भूमि पर काला कारोबार अफीम

पुलिस के अनुसार सुनसान और सुदूरवर्ती इलाका होने के कारण मनातू वन क्षेत्र के केदल एवं फुला पाखा में वन भूमि पर नशे का कारोबार किया गया था. सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में जवानों को लेकर गांव में पहुंचा गया और लाठी डंडा से तोड़कर फसल नष्ट की गयी.

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पांच पर प्राथमिकी, चिन्हित किये जायेंगे काले कारोबार से जुड़े लोग

अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी ने बताया कि इस नशीले धंधे में लिप्त पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है. अन्य की पहचान की जा रही है. उनके खिलाफ नारकोटिक एक्ट के तहत कार्रवाई की जायेगी. अन्य क्षेत्रों में पोस्ते की खेती होने के संबंध में सूचना एकत्रित की जा रही है. अगर पुष्ट खबर मिलती है तो कार्रवाई की जायेगी.

क्यों और कैसे होती है फसल?

पलामू प्रमंडल में हर वर्ष पोस्ते की फसल की जाती है. कम लागत और मुनाफा ज्यादा होने की चाहत में सुदूरवर्ती और नक्सल प्रभावित इलाकों में इसकी खेती की जाती है. वन भूमि और अभावग्रस्त इलाकों का चयन खेती के लिए किया जाता है, ताकि प्रशासन वहां आसानी से पहुंच नहीं सके.

ऐसा नहीं है कि पहली बार यहां पोस्ते की खेती हो रही है या उसे नष्ट करने की कार्रवाई की गयी. हर वर्ष पुलिस को अभियान चलाकर पोस्ते की फसल नष्ट करनी पड़ती है. कई स्तरों पर जागरुकता कार्यक्रम भी चलाया जाता है, लेकिन नक्सल-आपराधिक गठजोड़ के प्रभाव और कमाई के चकाचौंध में खेती होते रहती है.

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