
Pravin kumar
Ranchi : नरेगा अधिनियम के 14 वर्ष पूरे हो चुके हैं. मनरेगा गरीबों को काम देने वाली देश की सबसे बड़ी योजना है.
मनरेगा अधिनियम के तहत योजना में किये जाने वाले कार्यों में पारदर्शिता लाने के लिए सरकार ने ऑडिट ऑफिस स्कीम 2011 में पास किया था.
स्कीम में कहा गया है कि ग्रामसभा के लिए तथ्यों का संग्रह सोशल ऑडिट यूनिट के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के द्वारा किया जाना है. ग्रामसभा द्वारा इन तथ्यों के अनुमोदन के बाद ही सोशल ऑडिट किया जायेगा.

राज्य में इस प्रक्रिया के तहत सोशल ऑडिट किया जा रहा है. झारखंड में अब तक 36 करोड़ रुपये की गड़बड़ी सोशल ऑडिट के माध्यम से सामने आ चुकी है. 16 करोड़ के गबन की रिकवरी भी हुई है.
इसके बावजूद सत्ताधारी दल के मनिका विधायक रामचन्द्र सिंह, बहरागोड़ा विधायक समीर कुमार महांती, पोटका विधायक संजीव सरदार और घाटशिला विधायक रामदास सोरेन ने सोशल ऑडिट पर तत्काल रोक लगाने के लिए अपने-अपने क्षेत्र के उपायुक्तों को पत्र लिखा है.
सतापक्ष के विधायकों द्वारा लिखे पत्र में कहा गया है कि सोशल ऑडिट यूनिट की ओर से निर्धारित सोशल ऑडिट का कार्यक्रम पूर्व सरकार के कार्यकाल में निर्धारित किया गया है, जो त्रुटिपूर्ण है.
इसके अलावा इन विधायकों ने यह भी तर्क दिया है कि दुमका में सरकार आपके द्वार कार्यक्रम के कारण उपायुक्त ने सोशल ऑडिट को स्थगित किया है, इस पर रोक लगायी जाये.
इसे भी पढ़ें : झारखंड के 155 अतिनक्सल प्रभावित थाना क्षेत्र में नक्सली दे रहे पुलिस को चुनौती
ग्रामसभा के अनुमोदन के बाद किया जाता है सोशल ऑडिट, माननीयों को जानकारी नहीं

न्यूजविंग ने पोटका विधायक संजीव सरदार से बात की, तो उन्होंने कहा कि ग्रामसभा ही जानती है कि मनरेगा के तहत किसी योजना में काम हुआ है या नहीं, इसे सोशल ऑडिट यूनिट नहीं जान सकता. इसी वजह से रोक लगाने के लिए पत्र लिखा.
कांग्रेस के मनिका विधायक रामचंद्र सिंह ने न्यूजविंग से बातचीत में कहा- “हमने सोशल ऑडिट प्रक्रिया रोकने संबंध में पत्र लिखा था.
लेकिन पत्र लिखने का मकसद यह था कि स्थानीय स्तर पर जेएसएलपीएस के लोग खुलकर भाजपा के पक्ष में काम कर रहे थे और सोशल ऑडिट प्रक्रिया में शामिल होकर प्रक्रिया को प्रभावित करते थे.
मेरा मनना है कि मनरेगा योजना में गबन और गड़बड़ी करने वालों पर कार्रवाई होनी होनी चाहिए. गरीबों के लिए यह योजना है लेकिन सोशल ऑडिट करने वाले लोग अगर दल विशेष से जुड़े होंगे तो उस पर हमारी आपत्ति जरूर होगी.
इसे भी पढ़ें : गैर शैक्षणिक कार्यों में पूरे साल उलझे रहे शिक्षक, आधे-अधूरे सिलेबस पर प्राइमरी-मिडिल क्लास की होगी परीक्षा
मनरेगा योजना में पारदर्शिता के लिए राज्य को मिल चुका है दूसरा स्थान

सोशल ऑडिट प्रक्रिया पर रोक लगाने संबंधी सत्ता पक्ष के विधायकों द्वारा लिखे गये सभी पत्रों का मजमून लगभग एक सा है.
ऐसा प्रतीत होता है कि विधायकों ने बिना सोशल ऑडिट प्रक्रिया को जाने, समझे, इसपर रोक लगाने का पत्र लिखा दिया है.
झारखंड की सोशल ऑडिट प्रक्रिया को समझाने के लिए एक टीम उतराखंड, बिहार, ओड़िशा, उतरप्रदेश जैसे छ: राज्यों का दौरा भी कर चुकी है. प्राप्त सूचना के अनुसार झारखंड की सोशल ऑडिट यूनिट इन राज्यों को प्रशिक्षण देने में सहयोग भी कर रही है.
इसके तहत मनरेगा योजना में 36 करोड़ की राशि के गबन का मामला भी उजागर हो चुका है जिसमें 16 करोड़ की राशि सरकारी खजाने में जमा हो चुकी है.
साथ ही परदर्शिता को लेकर राज्य को दूसरा स्थान भी देश स्तर पर मिला है.
देश में सबसे कम है झारखंड के मनरेगा मजदूरों की मजदूरी

2020-21 के लिए केन्द्रीय बजट में मनरेगा मद की राशि में पिछले वर्ष की तुलना में बजट कटौती की गयी है. इससे मनरेगा मजदूरों को परेशानी का सामना करना पड़ेगा और मजदूरों को काम मिलने में परेशानी होगी.
वहीं राज्य के कई जिलों में मजदूरों का बेरोजगारी भत्ता बकाया है, जिसका भुगतान नहीं किया जा रहा है. दूसरी ओर मनरेगा में मजदूरी दर कम की जा है. पर माननीय इसे बढ़ाने की वकालत नहीं कर रहे.
इसे भी पढ़ें : साल 2016 और 2019 में एक बार भी नहीं हुई दिव्यांगता सलाहाकार बोर्ड की बैठक, सालाना होनी चाहिये दो मीटिंग




