
27 परिवारों के गांव में महज पांच परिवारों को मिला है योजना का लाभ
“स्वच्छ इंधन, बेहतर जीवन” के नारे के साथ 1 मई 2016 को केंद्र सरकार ने सामाजिक कल्याण योजना – “प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना” की शुरुआत की. धुआं रहित ग्रामीण भारत की परिकल्पना करती इस योजना का मकसद गरीबी रेखा से नीचे रह रही महिलाओं को एलपीजी का उपयोग करने, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से मुक्ति दिलाने और वनों की कटाई को कम करना है. पर इस योजना कि जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है. इसी कहानी को बयां करती Rahul Guru और Chhaya की ग्राउंड रिपोर्ट ……
Ranchi : राजधानी रांची से लगभग 25 किलोमीटर दूर है नामकुम प्रखंड का हाहाप पंचायत. इसे आदर्श पंचायत भी घोषित किया गया है. इसी पंचायत के छोटे छोटे गांव हैं सपारोम, कोचड़ो और बेराडीह. ये गांव तीन ओर से पहाड़ों और जंगलों से घिरा हुआ है. गांव तक सड़क है. बिजली है. उज्ज्वला योजना के तहत यहां के चुनिंदा घरों में एलपीजी सिलिंडर भी पहुंचा है, लेकिन अधिकांश घरों में भरा हुआ सिलिंडर पहली और अंतिम बार ही आया. घरों के चूल्हे अब भी लकड़ी की बदौलत ही गर्म होते हैं. जंगल के बीच बसे इन्हीं गांव के चाड़ा पाहन, हरिश्याम पाहन, सुशील मुंडा समेत कई लोगों के घरों की कहानी यही है. जहां महिलाएं अब भी सुबह-शाम धुआं झेलती हैं.
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तीन साल में तीन बार भरा सिलिंडर
उज्ज्वला योजना की वास्तविकता यह है कि लोगों को सिलेंडर भरवाने के लिये 25 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है. कोचड़ो के रहने वाले 67 साल के चाड़ा पाहन घर के मुखिया हैं. गांव की हकीकत बताते हुए कहते हैं कि कोचड़ो गांव मात्र 27 घरों का गांव है. गांव में केवल पांच परिवार को ही उज्ज्वला योजना का लाभ मिला. चाड़ा बताते हैं कि साल 2017 में उन्हें गैस सिलिंडर मिला. तब से लेकर अब तक उनके परिवार ने मात्र तीन बार गैस भराया. चाड़ा कहते हैं कि गांव का अधिकांश परिवार जंगल से लकड़ी लाकर बेचने और खेतीबाड़ी का काम करते हैं. गैस का दाम आठ सौ रुपये हो गया है. आमदनी इतनी है नहीं कि गैस भरा सकें. अगर कभी भरने भर कमाई हो भी गयी तो पहाड़ चढ़ कर 25 किमी जाना भी संभव नहीं है.
इसी गांव के सुशील मुंडा कहते हैं कि गांव से गैस के लिए सबके नाम की लिस्ट गयी थी. लेकिन मात्र पांच लोगों को ही गैस सिलेंडर मिला. कोचड़ो, बेराडीह और सपारोम में कई ऐसे परिवार मिलेंगे, जिनको सिलेंडर मिले तीन साल हो गये, लेकिन भराया मात्र एक से दो बार.
पैसे नहीं रहते तो गैस कैसे भरायें
इसी गांव के हरिश्याम पहान बताते हैं कि उनकी पत्नी के नाम से सिलेंडर लिया गया है. करीब दो साल पहले. लेकिन एक बार भी नहीं भराया. बमुश्किल चाय बनाने जैसे कामों के लिये ही गैस जलाते हैं. हरिश्याम बताते हैं परिवार खेतीबाड़ी से चलता है. परिवार लाह और लकड़ी बेच कर कमाई करता है. जब छह सौ रूपये सिलेंडर था तब भी भराना मुश्किल था. अब तो आठ से नौ सौ रूपये है. उन्होंने बताया कि लकड़ी से ही घर में खाना बनता है. लेकिन गर्मियों में इसकी भी कमी रहती है. गांव तक एजेंसी वाले गैस देने नहीं आते, ऐसे में लगभग 15 से 20 किलोमीटर दूरी तय करनी होती है. जो काफी मुश्किल है.
बेराडीह गांव की दसमनी टूटी आंगनबाड़ी संचालिका है. उन्हें जो गैस सिलेंडर मिला है, वो आंगनबाड़ी केंद्र के लिये, जो पिछले साल से कोरोना के कारण बंद है. दसमनी और आसपास के ग्रामीण बताते हैं कि उनके गांव में किसी को गैस सिलेंडर नहीं मिला है. इनके आंगन में लकड़ियों के शाख, सूखे पत्ते, चूल्हा और बर्तन रखे दिख जायेंगे. दसमनी बताती हैं परिवार आंगनबाड़ी से मिलने वाले दो हजार और खेतीबाड़ी से चलता है. खेतीबाड़ी भी काफी कम है. ऐसे में गैस के पैसे कैसे वहन करें. लकड़ियां पहले मिल जाती थी, लेकिन अब वो भी मुश्किल है. उन्होंने कहा गैस तो सही है, लेकिन भरवाने के लिये 25 किलोमीटर जाना होगा. और इतने पैसे कभी होते भी नहीं कि जरूरत पड़ने में भराया जाये. यह गांव 60 परिवारों का है. सबकी सूची देने के बाद भी 25 लोगों को ही योजना का लाभ मिला. इसमें से लगभग 20 लोग गैस नहीं भराते.




