
Ranchi : मुरी स्थित हिंडाल्को के कास्टिक तालाब धंसने के 40 घंटे बाद राहत और बचाव कार्य शुरू किया गया है. फिलहाल मलबे को हटाने का काम किया जा रहा है. दरअसल बुधवार की दोपहर बाद से सिर्फ डंपिंग स्थल तक जाने के लिए रास्ता बनाने का काम शुरू किया गया था.
रास्ता बन जाने के बाद एनडीआरएफ की टीम ने राहत और बचाव का कार्य शुरू कर दिया है. मंगलवार को मुरी स्थित हिंडाल्को का कास्टिक तालाब धंसने से जहां बड़े हिस्से में मलबा फैल गया है, वहीं कई लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जताई जा रही है.
डंप स्थल पर जाने के लिए एनडीआरएफ ने पूर्वी छोर से झारखंड-पश्चिम बंगाल सीमा से लगे स्वर्णरेखा नदी की ओर से रास्ता बनाया है. रास्ता बनाने के बाद एनडीआरएफ की टीम के द्वारा राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिया गया है.
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70 से 80 मजदूरों के दबे होने की आशंका
ग्रामीणों की मानें तो घटना के वक्त महज छह सेकेंड में ही करीब 70-80 मजदूर मलबे में फंस गये. दोपहर में खाना खाने के वक्त घटना घटी, नहीं तो करीब 200 लोगों की जान चली जाती.
हालांकि घटना के कुछ देर बाद ही एनडीआरएफ की टीम को बुलाया गया था और राहत और बचाव शुरू किया जा रहा था. लेकिन रास्ता नहीं होने की वजह से टीम भी कुछ नहीं कर पा रही थी.
ग्रामीणों के अनुसार, दिन में यहां करीब 200-250 ठेका मजदूर काम करने आते थे. इसका काम काम मेकाफेरी नाम की कंपनी को मिला हुआ था.
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दो साल पहले ही बना था गार्ड वॉल
हिंडाल्को प्लांट का मलबा 40 साल से जमा था. ग्रामीणों ने बताया कि ये मलबा जितना ऊंचा अभी दिख रहा है, उससे दोगुना गड्ढे से प्लांट चालू हुआ था. 40 साल से जमा हो रहे इस मलबे के किनारे मात्र दो साल पहले ही गार्ड वॉल बनाया गया है.
जिसका काम अब भी चल ही रहा था. ग्रामीणों ने बताया कि सीपीसीबी ने जब कंपनी को बंद कराने के आदेश जारी किया था, तो उस दौरान आइआइटी मुंबई और रुड़की से जांच कराने के बाद कह दिया था कि 40 साल तक यहां कुछ नहीं होगा.
तेजी से फैल रहा है केमिकल का दुर्गंध
हिंडाल्को के कास्टिक तालाब के धंसने से एक तो मलबा दूर तक फैल ही गया है, तो दूसरी ओर इलाके में तेजी से केमिकल का दुर्गंध फैल रहा है. जिससे इलाके के लोगों को परेशानी हो रही है. हीं इलाके के लोगों का का तो यहां तक कहना है कि घटनास्थल के पास स्थित तालाब में भी केमिकल की मात्रा आ गयी हो. कोई भी इसकी चपेट में गलती से भी आ जाये तो उसे बचाना मुश्किल हो सकता है.
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