Opinion

‘झारखंड की मुख्यधारा से कटे अधिकांश झारखंडी’

Ratan Trikey

जोहार झारखंडियों,
ज्वलंत सवाल – जरा सोचिये: क्या आज का पढ़ा लिखा झारखंडी अपना जमीनी खाता खतियान देखना जानता/ चाहता है ? क्या मेरे बच्चे, युवा मालगुजारी माल, रसीद कटाना जानता है? क्या मेरे युवा उपायुक्त, प्रशासनिक पदाधिकारियों से बात, तर्क-वितर्क कर सकता है? क्या मेरे बच्चे कभी सचिवालय, मंत्रालय देख पाये हैं? क्या हम अपने बच्चों को इन सबसे अवगत करा पा रहें हैं ?

हमारी आज की पीढ़ी आधुनिकता में बहुत आगे निकलती जा रही पर वो क्या है, कहां रहता है, उसकी पहचान, संस्कृति, इतिहास क्या है ? नहीं जानता, क्यों? क्योंकि हम खुद नहीं जानते या हम नहीं चाहते या हमारे बच्चों को रूचि नहीं. जिम्मेवार हम खुद और दोषी भी. हमारे कई IAS, IPS और बड़े-बड़े पदों पर शान से बैठे अफसरों को भी समाज हित की बातों पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है, और खुद पहल करने की भी. कुछ इने गिने हैं और वे लगे भी हैं पर वो काफी नहीं.

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अन्य समाज को दोषी नहीं कहना चाहिए. क्योंकि वो समाज सजग है. वो समाज हमेशा सोचता है कि संविधान सम्मत अधिकारों को कैसे प्राप्त किया जाये. वो समाज अपने बच्चों को सामाजिक, सांस्कृतिक और समयानुसार राजनीतिक जागरुकता भी बताता है. अपने अधिकारों, संस्कारों, पहचान इतिहास को बचाने के लिये हमेशा से संघर्षरत है. हम अपने बच्चों को अच्छे अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में शिक्षा दिला तो रहे हैं पर झारखंड की झारखंडियता नहीं सिखा रहे हैं. हमारे B.A, M.A पास किये युवक अपनी भाषा, पहचान,इतिहास, परंपरा, संस्कृति, आदर, सत्कार और जोहार तक नहीं करना जानते हैं.

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हमारे बच्चे अपने पुरखौती गांव जाना नहीं जाना चाहते, क्यों? क्योंकि दादु घर मिट्टी और खपरा का है. दादु घर में हगने के लिये कमोड, संडास नहीं है. गांव का नाम लिजिए तो नाक भौं सिकोड़ने लगेंगे. आप दबाव नहीं देते क्योंकि हम खुद गांव घर से दूर हो गये हैं. मुख्यधारा की चपेट में झारखंडी समाज अड़बझा गया है. कुछ झारखंडी परिवार परंपरा संस्कृति बचाने में अपवाद हो सकते हैं.

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पर अधिकांश झारखंडी, झारखंडी मुख्यधारा से कट चुके हैं. कुछ तो ऐसी बातों से कोई सरोकार ही नहीं रखना चाहते हैं. बस नौकरी है, सुबह जाओ-शाम वापस. रविवार को खाओ-पीओ और वो ऐसा है तो वो वैसा है, ऐसा करना चाहिए- वैसा करता/करती है. बस आलोचना करना है और कुछ नहीं. नौकरी करने वालों में कुछ लोग हैं जो सोचते और करते भी हैं. ये कोई नई बात नहीं है जो मैं पहली बार कह रहा हूं, और लोग भी कहते आ रहें हैं. कुछ परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं. पर और चाहिए. इसके लिए कुछ संगठन दिन-रात जागरुकता अभियान चला रहे हैं. जोहार है उनको. बस एक सलाह है उनको, आदिवासियत के साथ-साथ झारखंडियता की वकालत कीजिये..

लेखक रतन तिर्की झारखंड आंदोलनकारी और टीएसी के सदस्य हैं. यह लेख उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है.

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