
Ranchi. स्वर्णरेखा नदी (सरायकेला-खरसावां) पर बनाये गये चांडिल डैम और इसके चलते विस्थापितों का मसला अब तक हल नहीं हो सका है. राज्य सरकार भी इसे मानती है. करीब चार दशक बीतने के बावजूद विस्थापित परिवार सरकार से राहत की आस में बैठे हैं. पिछले दिनों समाप्त हुए विधानसभा के बजट सत्र में भी इस डैम के विस्थापितों का मसला उठा था. विधायक सुदेश महतो ने डैम और विस्थापितों को मुआवजा के मसले पर सरकार से जानकारी मांगी थी.
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इस पर राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि चांडिल बांध से 116 गांव प्रभावित हुए हैं. इनमें से 43 गांव तो पूरी तरह प्रभावित हुए तथा 73 गांव आंशिक रूप से. इन गांवों में रहने वाले 19115 परिवार डैम के कारण विस्थापन का शिकार हुए हैं. विस्थापितों को बसाये गये गांवों का अब तक सीमांकन नहीं हो पाया है. उन्हें बंडा-पर्चा नहीं दिया जा रहा है.
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बनाये गये हैं पुनर्वास स्थल
राज्य सरकार के मुताबिक चांडिल डैम के विस्थापित परिवारों को बसाने के लिये 22 पुनर्वास स्थल बनाये गये हैं. इनमें से 13 पुनर्वास स्थलों पर सभी मूलभूत सुविधाएं विकसित की जा चुकी हैं. विकसित पुनर्वास स्थलों में 1358 विस्थापित परिवार अभी रह रहे हैं. 13 के अलावे 9 पुनर्वास स्थलों को विकसित किये जाने पर काम चल रहा है. पुनरीक्षित पुनर्वास नीति-2012 के प्रावधानों (कंडिका-5, 1 (क)) के मुताबिक ऐसे विस्थापित परिवार जिनकी जमीन सरकार के स्तर से अर्जित की जाती है, उन्हें 12.50 डिसमिल जमीन पुनर्वास स्थल में निःशुल्क दी जाती है.
यदि कोई विस्थापित परिवार पुनर्वास स्थल पर भू-खंड नहीं लेना चाहते हैं तो उसके एवज में उसे जमीन के लिये दो लाख रुपये दिये जायेंगे. सरकार के मुताबिक आने वाले समय में भूमि की रजिस्ट्री आवंटितों के नाम से किये जाने की योजना है. सरकार के जवाब को मानें तो 19115 विस्थापित परिवारों में से 1358 परिवारों को अब तक पुनर्वास स्थलों के जरिये बसाया जा चुका है. बाकी के मामले में प्रक्रिया जारी है.
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इन जगहों पर मिल रही सिंचाई सुविधा
चांडिल डैम (Chandil Dam) को झारखंड के सबसे अच्छे पर्यटन स्थलों में से एक माना जाता है. यह जमशेदपुर से 36 किलोमीटर उत्तर में स्थित है. डैम को बनाने का उद्देश्य स्थानीय लोगों को सिंचाई सुविधा दिया जाना था. सरकार के मुताबिक इस डैम से सरायकेला-खरसावां और पूर्वी सिंहभूम जिले के किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध करायी जा रही है.
लगातार बढ़ रही परियोजना की लागत
स्वर्णरेखा बहुउद्देश्यीय परियोजना झारखंड, ओडिशा और प. बंगाल की संयुक्त परियोजना है. इसी के तहत स्वर्णरेखा नदी पर चांडिल डैम बना है. गजिया बैराज का निर्माण भी किया गया है. इससे कई नहरें निकाली गई हैं. यहां 8 मेगावाट की एक विद्युत इकाई भी लगाई गई है. जानकारी के मुताबिक वर्ष 1976 में 150 करोड़ रुपए की यह परियोजना केंद्रीय परियोजना का रूप लेकर 14949 करोड़ रुपए की हो गई है जो आज भी अधूरी ही है. अब तक इसका दूसरा पार्ट खरकई नदी पर ईचा डैम का निर्माण अधूरा है. परियोजना के तहत चांडिल डैम, देश बांध, सतनाला डैम, राज बांध और मुरा हिल से फसलों की सिंचाई से संबंधित कार्य शुरू किए जा चुके हैं.
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