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कांटों पर खिला कमल:  क्या #The Economist पत्रिका विश्व में भारत की छवि को खराब करना चाहती है?

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Faisal  Anurag

द इकोनामिस्ट पर भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं का प्रहार तेज हो गया है. भाजपा नेता शेषाद्रीचारी ने दुनिया की इस मशहूर पत्रिका को भारत विरोधी बताया है. इस पर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने का आरोप लगाया जा रहा है.

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इसी पत्रिका ने 2014 में जब मोदी को भारत के भविष्य के नेता के रूप में प्रस्तुत किया था तो पूरी भाजपा और  सरकार के शीर्ष नेताओं ने उसे ट्विट किया था. अब जब इस पत्रिका ने अपने कवर पर कांटों पर खिले कमल चित्र के साथ मोदी सरकार को पर सांप्रदायिक सौहाद्र को नुकसान पहुंचाने और कश्मीर व नागरिकता कानून को पर टिप्पणी की है, तो उसे औपनिवेशिक मानसिकता की पत्रिका बताने की प्रतिस्पर्धा लगी हुई है.

लेकिन इस लिबरल पत्रिका की अपनी पहचान है. और वह ब्रिटेन के शासकों के खिलाफ भी खुल कर स्टैंड लेने के लिए मशहूर है.

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इस बीच यूरोपीयन यूनियन के 751 में से छह सौ से ज्यादा सांसदों ने अलग-अलग प्रस्तावों के माध्यम से भारत के हालात पर बहस की मांग की है. इन सांसदों का रुख भारत की नई बनती छवि को लेकर बेहद चिंताजनक है. पूरी मानवता के इतिहास में सबसे बड़ी मानव त्रासदी के तौर पर नागरिकता छीनने की संभावना को लेकर ये सांसद चिंतित हैं.

इसी यूरोपियन यूनियन के कुछ सांसदों का कश्मीर दौरा का प्रायोजन किया गया था. लेकिन यूरोप और अमरीका का जनमत भारत की लोकतांत्रिक और सेकुलर छवि को लेकर बेहद चिंतित है.

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गणतंत्र दिवस पर भारत के अलावे दुनिया भर के अनेक शहरों में संविधान की प्रस्तावना का पाठ करते हुए बड़ी  संख्या में लोगों ने प्रदर्शन किया. और लोकतांत्रिक गणराज्य को रिक्लेम करने के भारत के लोगों के संघर्ष के साथ अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया. इसी क्रम में हिंदी के प्रसिद्ध कवि मंगलेश डवराल ने कहा है कि देश भर के शाहीनबागों में सड़क पर कविता रची जा रही है.

डावोस का इकोनामिक जुटान नरेंद्र मोदी को बेहद पसंद है. डावोस में चल रहे विश्व आर्थिक जुटान में वे इस साल शामिल नहीं हुए हैं. लेकिन डावोस से पहली बार मोदी के खिलाफ आवाज उठी है. यह आवाज जार्ज सोरेस की है.

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मोदी और ट्रंप को लेकर दुनिया के इस बड़े अरबपति ने कड़ी टिप्प्णी की है. हालांकि डोवोस की जुटान को ले कर विश्व जनमत की अलग-अलग राय है. बावजूद बड़े घरानों से मोदी के खिलाफ उठ रही आवाज का अपना खास अर्थ  है.

सोरेस हंगेरियन मूल के अमरीकी नागरिक हैं. वे दुनिया भर में अपने निवेश के लिए जाने जाते हैं. उन्हें बिजनेस की दुनिया एक ऐसे इंवेस्टर के रूप में जानती है, जिनकी छवि यह है कि वह बडी राशि डोनेट भी करते हैं. 2018  में 8 अरब डालर डोनेट करने के बाद उनकी खूब चर्चा हुई थी. अमरीकी पूंजी की दुनिया उनकी बात गंभीरता से सुनती है. और यूरोप में भी उनका प्रभाव है.

डावोस वार्षिक इंवेट को संबोधित करते हुए सोरेस ने मोदी और ट्रंप पर कड़ा प्रहार किया. सोरेस ने मोदी के संदर्भ में कहा- मोदी की कट्टर राष्ट्रवादी नीतियों के कारण भारत को भारी नुकसान हो रहा है. उन्होंने कहा कि मोदी भारत को एक हिंदू राष्ट्रवादी देश बनाने के अभियान में लगे हुए हैं.

नागरिकता मामले को ले कर वे मुसलमानों को निशाना बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं. जबकि कश्मीर में मोदी सरकार ने जो कदम उठाये हैं वे लोकतांत्रिक मूल्यों की पूरी तरह अवमानना है. दुनिया के अनेक बड़े निवेशकों के बीच यह टिप्पणी सामान्य नहीं है. इस तरह की टिप्पणियां और धारणा भारत में निवेश आमंत्रित करने के अभियान के लिए बेहतर संकेत नहीं हैं.

सोरेस ने मोदी के साथ ट्रंप की आर्थिक नीतियों की भी कड़ी आलोचना की है. उन्होंने कहा है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, ट्रंप की नीतियां अमरीका की आर्थिक निर्भरता के समक्ष अनेक चुनौतियां उत्पन्न कर रही हैं. अमरीका में असंतोष बढ़ रहा है.

और यह अमरीका हित में नहीं है. ट्रंप पर प्रहार करते हुए सोरेस की चिंता सामान्य नहीं है. उन्होंने ट्रंप को एक ऐसा नेता बताया है जिसमें एकाधिकारवादी प्रवृति जोरों पर है. और वे पूरी दुनिया को अपनी सनक से चलाने की इच्छा रखते हैं.

सोरेस ने ट्रंप को एक ऐसा आत्ममुग्ध व्यक्ति बताया जो कि तथ्यों की परवाह नहीं करता और लोकतांत्रिेक अलोचनाओं का तो सम्मान बिल्कुल भी नहीं करता है. राष्ट्रीय हितों को वे अपने निजी हित के कारण पीछे छोड देते हैं. उनके लिए निजी हित ही सर्वोपरि है. सोरेस ने चीन और अमरीका के व्याप्त विवाद को ले कर भी कड़ा रुख प्रकट किया है.

डावोस के मंच से दो नेताओं को निशाने पर लिये जाने को असामान्य माना जा रहा है. लेकिन सोरेस की टिप्पणी दुनिया की प्रमुख मीडिया में चर्चा का केंद्र बनी हुई है. अमरीका के भीतर भी किसी बड़े पूंजीनिवेशक की इतनी कड़ी टिप्पणी ट्रंप के संदर्भ में कम ही सुनने को मिली है.

जब से अमरीका की चुनाव प्रक्रिया में बर्नी सैंडर्स के अमरीकी समाजवाद के विचारों का प्रभव बढ़ा है तब से अमरीका में विमर्श की दिशा बदलती जा रही है. ट्रंप ने हाल के ही एक भाषण में समाजवाद को निशोन पर लेते हुए कहा था कि अमरीका में वे इस तरह के विचारों को पनपने नहीं देंगे.

लेकिन उम्मीदवारी चयन अभियान में समाजवाद एक लोकप्रिय राजनीतिक विमर्श बना हुआ है. अमरीकी युवाओं का बर्नी सेंडर्स के प्रति रूझान अमरीकी राजनीति में हलचल मचाये हुए है.

दूसरी ओर भारत के तमाम कैंपसों में जिस तरह मोदी विरोधी स्वर उठे हैं और महिलाओं ने जिस तरह घरों से बाहर निकल कर नागरिकता कानून और रजिस्टर के खिलाफ मोर्चा संभाला है, उस पर दुनिया की मीडिया की गहरी निगाह इस पर है.

इसके साथ ही निवेशकों के बीच भी इसकी चर्चा है. सोरेस कर बयान और जिस तरह की प्रतिक्रिया डावोस में हुई, वे यही संकेत दे रहे हैं.

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