न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

सीएए और एनआरसी के विरोध में देशभर में बन चुके हैं कई नये शाहीनबाग

2,058

Faisal  Anurag

शाहीनबाग न केवल प्रतिरोध का अपराजेय स्वर बन कर उभरा है बल्कि उसकी प्रेरणा से देशभर में कई शाहीनबाग आवाज बुलंद कर रहे हैं. निर्भीक और साहस का जो तेवर उभरा है, उसकी मिसाल भारत के इतिहास में नहीं के बराबर है.

Aqua Spa Salon 5/02/2020

इन प्रतिरोधों की सबसे बड़ा विशोषता महिलाओं की राजनीतिक और लोकतांत्रिक चेतना और समझ है. जिसकी चर्चा कभी नहीं होती है. महिलाओं ने न केवल कीचन की दीवरों का घेरा तोड़ा है, बल्कि नींद को भी चुनौती दी है.

इसे भी पढ़ेंः 10 साल से बन रहा रांची विवि का रेडियो खांची, उद्घाटन की बाट जोह रहा 76 लाख का स्टूडियो

दिनरात के इन प्रतिरोधों ने धर्म और जेंडर के सारे विभेद को किनारे कर दिये हैं. शाहीनबाग तो एक ऐसा स्थल हे जहां जा कर हर कोई इतिहास का वह पल महसूस करना चाहता है, जो वहां  दर्ज हो रही है.

भारत के किसी भी आंदोलन को यदि महिला भागीदारी के नजरिये से देखा जाये तो भारत एक लंबी छलांग लगा चुका है. मुद्दों के प्रति गहरी समझ और उसे व्यक्त करने का जो आर्टिकुलेशन सामान्य दिखने वाली महिलाएं प्रकट कर रही हैं, वह किसी भी देश के लोकतंत्र की सबसे बड़ी थाती है.

शाहीनबाग ने इस भ्रम को भी तोड़ दिया है कि वह एक क्षणिक आवेग है. शाहीनबाग प्रदर्शन के 31 दिन पूरे हो रहे हैं. दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका के फैसले में भी इसका असर दिखता है. जब कोर्ट पुलिस को यह अधिकार देने से इनकार कर देता है कि प्रदर्शनकारियों को बल प्रयोग कर वहां से हटाया जाये.

Gupta Jewellers 20-02 to 25-02
कोलकाता के पार्क सर्कस में सीएए और एनआरसी का विरोध करतीं महिलाएं.

कोर्ट का साफ निर्देश बता रहा है कि इन प्रतिरोधों का एक नैतिक असर दिखने लगा है. अब दिल्ली पुलिस भी कह रही है कि वह बातचीत कर ही रास्ता निकालेगी.

नगरिकता कानून और सिटिजन रजिस्टर के खिलाफ आंदोलनों का जो उभार दिखा है, उसमें पुलिस यदि बातचीत की बात कर रही है तो यह कोर्ट के निर्देश के आलोक के साथ उस जज्बे का अहसास भी है जो वहां से पूरे देश में फैला है.

इसे भी पढ़ेंः रांची में तीन इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारियों का तबादला, तबादले की वजह कहीं ये तो नहीं

यमुना पार दिल्ली के खुरेजी में भी महिलाओं ने एक नया-नया शाहीनबाग बना लिया है. पिछले तीन दिनों से वहां महिलाएं दिनरात ते धरने पर हैं. योगेंद्र यादव ने कहा है कि वे देश में जहां भी जा रहे हैं, हर जगह शाहीनबाग की प्रेरणा अनुभव कर रहे हैं.

शाहीनबाग की तरह ही देश के एक अन्य महानगर कोलकाता के पार्क सर्कस में शाहीनबाग का नजारा है. कानपुर के चमनबाग के मुहम्म्द अली पार्क, इलाहाबाद का मंसूर पार्क, पटना का सब्जीबाग, गया का शांतिबाग, भोपाल का इकबाल मैदान और पुणे के कौसरबाग वे शाहीनबाग हैं, जो प्रतिरोध के नये तेवर हैं.

भोपाल के इकबाल मैदान में सीएए का विरोध करते लोग.

इसके अलावे देश के कई छोटे शहरों में ऐसे बीसियों शाहीनबाग हैं जहां से नागरिकता कानून को चुनौती दी जा रही है.

जनसत्याग्रह के इन नये प्रयोगस्थलों ने जन असहयोग की आवाज को घर-घर पहुंचा दिया है. इन आंदोलनों की खास बात यह है कि इसमें सभी धर्मों को मानने वाले लोग शामिल हो रहे हैं. कैंपसों की चिंगारी से भी ज्यादा प्रज्वलन इन आंदोलनों में है.

क्योंकि इसने उन तामम सवालों का रू-ब-रू कर दिया है जिसे नोटबंदी के बाद से भारत के मेहनतकश वर्ग महसूस कर रहे हैं. इन आंदोलनों ने किसनों और मजदूरों के बीच भी बहस को तेज करने का इरादा दिखाया है. कैंपसों की आवाज इन आंदोलनों के साथ समाहित हो एक स्वर में गूंजने लगी है.

समाज के सभी वर्गों और समूहों का समर्थन इन आंदोलनों के साथ दिख रहा है. 14 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने जंतरमंतर तक मार्च किया और सीएए का विरोध किया. और शाहीनबाग के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया.

भारतीय जनता पार्टी देश भर में सीएए के समर्थन में प्रदर्शन का आयोजन कर रही है. लेकिन विरोध का स्वर उससे कहीं ज्यादा प्रखर दिख रहा है. इन आंदोलनों ने न केवल विरोध की क्रिएटीवीटी दिखाया है, बल्कि गीतों और नारों का बिल्कुल नया प्रयोग किया है.

तानाशाह आयेंगे जायेंगे हम कागज नहीं दिखायेंगे, जैसे नारों ने उन प्रतिरोधों की स्मृति को ताजा कर दिया है जो नागरिक अधिकार और लोकतंत्र के लिए बुलंद हुआ था. विश्व मीडिया भी शाहीबाग प्रमुखता से उपस्थित है. दुनिया के अनेक विश्वविद्यालयों में भी युवा सड़कों पर निकल कर सीएए के खिलाफ नारे लगा रह हैं.

सड़क की हलचलों को अब हर जगह महसूस किया जा जा रहा है. सुनील गावस्कर ने भी इस पर बयान दिया है. आमतौर पर वे इस तरह के बयान नहीं देते हैं. विरोध का एक नया रूप 14 जनवरी को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में वनडे में दिखा जब छा़त्रों के एक समूह का विरोध नये तेवर में दिखा. छात्र टीशर्ट पहने हुए थे.

और टीशर्ट पर पर एक शब्द लिखा था. जो मिल कर नो सीएए, नो एनपीआर, नो एनआरसी बन गया था. मीडिया पर यह दृश्य क्रिकेट प्रेमियों ने देखा और यह चर्चा का विषय बन गया.

इसे भी पढ़ेंः तेजस्वी का बयान, दिल्ली विस चुनाव में RJD-कांग्रेस के गठबंधन में लड़ने की उम्मीद

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like