
Lohardaga: लोहरदगा में वन विभाग ने कुछ ऐसे कारनामे किए हैं कि अब जब जांच और कार्रवाई का फंदा जिले के शीर्ष वन अधिकारियों के सिर पर ऊपर लटकने लगा है. दरअसल वन विभाग में लंबे अरसे से कई तरह के गड़बड़ झाले चल रहे हैं. इसमें एनओसी देने की आड़ में लकड़ी माफिया को जंगल की तबाही का परमिशन देना है. इसमें लिप्त अधिकारी और कर्मचारी फल फूल रहे हैं.
जंगल बचाने में पूरी तरह नाकाम इस विभाग के एक फॉरेस्ट गार्ड द्वारा फर्जी नोटिस लोगों को देकर भयादोहन करते हुए उनसे पैसे उगाही करने का मामला सामने आया है. बात खुली तो यह पता चला कि यह कोई ताजा मामला नहीं बल्कि लंबे समय से यह खेल जारी है और रैयती जमीन से अपना पेड़ काटने वाले लोगों को भी फर्जी नोटिस देकर, हड़काकर उनसे उगाही करता रहा है.
ताजा मामला एक फॉरेस्ट गार्ड द्वारा फोरस्टर बनकर सेन्हा प्रखंड के रैयत को अपने हस्ताक्षर से फर्जी नोटिस जारी कर लोगो से पैसा ऐंठने का है. यही नहीं जिस पत्रांक से ये नोटिस भेजा गया है, उसी पत्रांक से सिविल कोर्ट लोहरदगा के न्यायिक अधिकारी को वनपाल द्वारा पत्र भेजा गया है . सवाल उठता है आखिर किसकी शह पर यह वनरक्षी अपने को अधिकारी के रूप में पेश कर लोगों का भयादोहन लगातार किए जा रहे है. इधर अब तक भयादोहन से परेशान कुछ लोगो ने थाना में आवेदन देकर वनरक्षी किशोर नंद कुमार के खिलाफ कार्रवाई की भी गुहार लगाई है. इधर इस मामले का खुलासा होने के बाद वन विभाग के अधिकारी शुरू में तो इस मामले की लीपापोती करते नजर आए. इस बारे में जब डीएफओ अरविंद कुमार से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुझे इस मामले की जानकारी नहीं है. अगर वनपाल छुट्टी पर हों तो वनरक्षी उनकी जगह हस्ताक्षर कर सकता है. लेकिन उनके रहने पर उनके मुहर लगाकर कोई दूसरा हस्ताक्षर कर नोटिस जारी किया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करते हुए उसे चेतावनी दी जायेगी. सवाल उठता है कि सरकारी दस्तावेज का गलत तरीके से फर्जी हस्ताक्षर और मुहर का उपयोग कर भयादोहन के मामले में इतनी मामूली कार्रवाई क्यों? इधर डीएफओ श्री कुमार ने बताया कि निजी जमीन में पेड़ काटने पर किसी भी प्रकार का नोटिस नही दिया जा सकता है. फिर वनरक्षी द्वारा कैसे नोटिस जारी किया जा सकता है वह भी बिना अधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर के. यह बड़ा सवाल है.
वनपाल के हस्ताक्षर और मुहर का उपयोग कर धड़ल्ले से लोगो को नोटिस जारी करने के बारे में जब वनपाल जया उरांव से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस साल किसी भी प्रकार का पेड़ कटाई को लेकर कोई नोटिस उनके द्वारा नही जारी किया गया है. जबकि उन्होंने यह भी बताया कि जिस पत्रांक से पेड़ कटाई की नोटिस दिया गया है उस पत्रांक से न्यायिक अधिकारी लोहरदगा से पत्राचार किया गया है. आप स्वयं ही अंदाजा लगा सकते है कि विभाग में क्या खेला चल रहा है. अगर इस मामले की निष्पक्ष जांच हो तो वनरक्षी द्वारा किए जा रहे कई गड़बड़ी का मामला सामने आ सकता है.
बहर हाल जब मामला विभाग के उच्च अधिकारियों के कानों तक पहुंचा और लोहरदगा के अधिकारियों से सवाल पूछे जाने लगे तो मजबूरन उक्त वनरक्षी से जवाब तलब किया गया है. इस पूरे प्रकरण में यह स्पष्ट है कि एक मामूली कर्मचारी बिना अधिकारियों की शह और मिलीभगत के इतना बड़ा भ्रष्टाचार का खेल कानून को ताक पर रखकर नहीं खेल सकता. इस पूरे प्रकरण में वनरक्षी ही नहीं बल्कि विभाग के अन्य अधिकारियों और कर्मियों की भी संलिप्तता की जांच आवश्यक है.
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