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लॉकडाउन में कांसा का 200 साल पुराना कारोबार प्रभावित, लोकल में वोकल की बात नहीं उतर रही जमीन पर

Jamtara :  लॉकडाउन में दो सौ सालों के पुश्तैनी कारोबार पर प्रभाव पड़ा है.  कांसे के बर्तन बनाने का काम करने वाले कारीगरों की कमर पूरी तरह से टूट गयी है. कच्चे माल के अभाव में बर्तन बनना बंद हो गया है.

जो बर्तन बनाये गए, उसके खरीदार नहीं मिल रहे हैं. उनके समक्ष रोजीरोटी की समस्या है.  बता दें कि ये व्यवसाय जिला मुख्यालय से 60 किमी की दूरी पर अम्बा गांव के कारीगरों द्वारा किया जाता है.

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आदिवासी समाज मे आज भी कांसे के बर्तन में खाना खाते हैं

कांसे के बर्तनों में आदिवासी समाज के लोग आज भी खाना खाते हैं. इसलिए आदिवासी समाज के लोगों में कांसे के बर्तनों की मांग भी अधिक है. गैर अदिवासी समाज में खास मौकों पर ही कांसे के बर्तन प्रयोग में लाये जात हैं.

लॉकडाउन में कच्चे माल का हुआ अभाव

कांसे के बर्तन बनाने के लिए जिस कच्चे माल की जरूरत पड़ती है, वो बाहर से मंगवाया जाता है. लेकिन लॉकडाउन के कारण लोगों का आना-जाना, बसों का परिचालन बंद रहा. जिसके कारण पुश्तैनी कारोबार पूरी तरह से ठप रहा. जो भी बर्तन तैयार थे, उसकी भी बिक्री नही हुई. खरीदार नहीं मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई है.

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सरकार से कारोबार के लिए नहीं मिलती मदद

पुश्तैनी व्यवसाय से जुड़े वाचस्पति दे, अरुण दे, संजू दे, सजल वाद्यकर ने कहा कि सरकार लोकल पर वोकल की बात करती है. लेकिन उन्हें आजतक पुश्तैनी कारोबार से आत्मनिर्भर बनने के लिए कोई मदद नहीं मिली.

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