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एक ओऱ सुखाड़ की ओर बढ़ता झारखंड, दूसरी ओर मनरेगा में घटता रोजगार

Ranchi : राज्य सूखे की ओर है. कारण कि इस साल मॉनसून की रंगत अब तक फीकी है. कृषि विभाग भी मानता है कि अब तक 50 फीसदी ही बारिश हुई है. धान की रोपनी मात्रा 15 फीसदी तक ही हो पायी है. 18 जिलों में वर्षापात 50 प्रतिशत या इससे भी कम हुआ है. ऐसे में इस बार के मॉनसून की हालत को देखते इसे पिछले दो दशक का सबसे खराब सीजन माना जा रहा है. सदन से लेकर विभाग तक वैकल्पिक उपाय खोजने में लगा है. ऊपर से मनरेगा में काम के अवसर सीमित किये जाने के आसार बन गये हैं. केंद्र सरकार के नये निर्देश के मुताबिक किसी भी ग्राम पंचायत में 20 से ज्यादा योजनाएं नहीं चलायी जायेंगी.

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केंद्र के निर्देशों के आधार पर झारखंड में लेटर जारी

ग्रामीण विकास मंत्रालय के निर्देशों का हवाला देते हुए ग्रामीण विकास (झारखंड) ने सभी जिलों के डीडीसी को 19 जुलाई को लेटर (पत्रांक 4/प्रशा-1/1023/MSC/2013/ग्रा वि (N)944) भेज कर कहा है कि 1 अगस्त से ऐसे प्रावधान नरेगा सॉफ्ट में समाविष्ट किये जायेंगे जिसके तहत किसी भी पंचायत में यदि 20 स्कीम ऑनगोईंग हैं तो वैसी पंचायत में नयी योजना को ऑनगोईंग करने के लिए एमआर निर्गत नहीं किया जायेगा. इसे लेकर झारखंड से दिल्ली तक विरोध शुरू हो गया है.

सदन में भी उठाये जायेंगे सवाल

नरेगा संघर्ष मोर्चा के बैनर तले 15 राज्यों के मनरेगा श्रमिक दिल्ली में जुटे हैं. राइट टू फूड कैंपेन से जुड़े जेम्स हेरेंज ने बताया कि मनरेगा कार्यकर्ताओं ने बुधवार को धरने के दौरान केंद्र सरकार पर मनरेगा की उपेक्षा का आरोप लगाया.

मनरेगा में काम के सीमित होते अवसर, देरी से भुगतान जैसे मसलों पर सांसद गीता कोड़ा, धीरज साहू और दूसरे दलों के प्रतिनिधियों से भी आग्रह किया गया. सबों ने आश्वस्त किया कि वे लोकसभा, राज्यसभा में इस मसले पर सरकार के साथ गंभीर चर्चा करेंगे.

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नये आदेश से हो रही है परेशानी, घटेंगे रोजगार

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने धरने के दौरान कहा भी कि राज्य सरकारें राशि के अभाव में मजदूरों को काम देने से सीधे मना कर रही हैं. गांवों में प्रारंभ की गई योजनाओं पर ग्रहण लग गया है. ग्रामीण मजदूर परिवारों का पलायन तेजी से शहरों और महानगरों की ओर होने लगा है.

एक ओर सरकार बजट आवंटन में निरंतर कमी कर रही है, दूसरी तरफ लोग मनरेगा में काम करने से खुद कतराने लगे, इसके लिए तरह –तरह के तकनीकी बाधाएं खड़ी कर रही है. पहले सरकार ने अव्यवहारिक जातिवार एफटीओ सृजित करना प्रारंभ किया.

पिछले दिनों मई के महीने से आदेश निर्गत है कि हाजरी सिर्फ स्मार्ट फोन के जरिये ही सीमित समय अवधि के अंदर लगानी है. साथ में सुबह और शाम दो बार मजदूरों को कार्यस्थल के साथ फोटो अपलोड करना अनिवार्य है. अब 1 अगस्त से नया आदेश है कि किसी भी ग्राम पंचायत में 20 से ज्यादा योजनाएं नहीं चलायी जायेंगी. वह भी तब जब कमजोर मानसून के कारण देश के कई हिस्सों में सुखाड़ के हालात हैं.

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कोरोना में मनरेगा से मिले थे सबसे ज्यादा रोजगार

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को रोजगार देने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी कानून देश की एकमात्र योजना है. 2008 के वैश्विक आर्थिक सुनामी और 2020 में विश्वव्यापी कोरोना संकट के बीच लोगों के लिए जीवनरेखा के तौर पर रोल निभाया. वित्तीय वर्ष 2020-21 में भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 1.11 लाख करोड़ रुपये खर्च कर 7.5 करोड़ परिवारों के 11 करोड़ श्रमिकों को रोजगार प्रदान किया गया था.

यह आंकड़ा मनरेगा के 16 सालों के इतिहास में सर्वाधिक बजटीय आवंटन था. इसका एक प्रमुख कारण कोविड जैसे संक्रमण काल में जब देश-दुनिया में आर्थिक गतिविधियां बन्द थीं, तब मजदूरों को व्यापक पैमाने पर रोजगार मुहैया कराना था.

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केंद्र सरकार ने बजट में लगातार की है कटौती

लोक सभा में 2021-22 का बजट वित्त मन्त्री ने पेश किया तो उसमें पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 25.51 प्रतिशत की कटौती की. महज 73,000 करोड़ रुपये ही आवंटित किये गये.

बाद में पुनरीक्षित बजट प्रावधान में 25,000 करोड़ की राशि शामिल करते हुए इसे 98,000 करोड़ किया गया. लेकिन बजट कटौती के बावजूद इस वर्ष 6.74 करोड़ परिवारों के 9.75 करोड़ मजदूरों ने मनरेगा योजनाओं में कार्य किये. वित्तीय वर्ष 2022-23 के बजट आवंटन में तो सरकार ने हद ही कर दी है.

पिछले वर्ष जहां कुल बजट आवंटन 98,000 करोड़ रुपये था, उसके मुकाबले 12 प्रतिशत की कटौती करते हुए फिर एक बार सिर्फ 73,000 करोड़ बजट आवंटित किया है. इस 73,000 करोड़ में से 18,350 करोड़ तो वित्तीय वर्ष 2021-22 के बकाये भुगतान में ही खर्च हो जायेंगे. इसका मतलब यह हुआ कि वर्ष 2022-23 के लिए वास्तविक बजट आवंटन राशि सिर्फ 54,650 करोड़ है.

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