
Gyan Ranjan
Ranchi: झारखंड में कांग्रेस का हाल बेहाल है. राज्य में जर्रा-जर्रा पार्टी की जमीन खिसकती जा रही है, लेकिन दिमाग सातवें आसमान पर है. झारखंड कांग्रेस का हाल यह है कि पार्टी की राज्य या राष्ट्रीय इकाई के निर्णय से गठबंधन का साथी झामुमो इत्तेफाक नहीं रखता है. सरकार का मुखिया पार्टी के किसी भी फैसले को उलट-पुलट देता है और कांग्रेस की मजबूरी ऐसी है कि चूं तक नहीं कर पा रही है.
आलम यह है कि पार्टी नेतृत्व की चुप्पी से समर्पित कार्यकर्ता हलकान हैं. झारखंड में हाल में हुई दो घटना कांग्रेस की मज़बूरी को बयां करती है. राज्य में कांग्रेस सत्ता में चिपके रहने के लिए कितनी मजबूर है वो राज्यसभा चुनाव और राष्ट्रपति चुनाव के दौरान खुलकर सामने आ गया है. झारखंड में झामुमो के नेतृत्व में चल रही हेमंत सोरेन की सरकार कांग्रेस के सहयोग पर टिकी हुई है. सरकारी पार्टी के गठबंधन में रहते हुए कांग्रेस की एक नहीं चल रही है. पहले जिक्र करते हैं राज्यसभा चुनाव की. राज्यसभा चुनाव के समय कांग्रेस के प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर के नेता यह दंभ भर रहे थे कि इस बार महागठबंधन में उसे मौका मिलेगा.
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बैठक का दौर ranchi से लेकर दिल्ली तक चला. कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ इस मामले पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की बैठक हुई. लेकिन नतीजा जैसा झामुमो ने चाहा वैसा ही हुआ. कांग्रेस को झामुमो ने राज्यसभा की सीट नहीं दी. कांग्रेस के किसी नेता के मुंह से आवाज तक नहीं निकली. दूसरा झटका झामुमो ने कांग्रेस को राष्ट्रपति चुनाव के दौरान दिया. विपक्ष के साझा प्रत्याशी यशवंत सिन्हा को दरकिनार कर झामुमो ने डंके की चोट पर NDA प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू को वोट किया. कांग्रेस अपना चेहरा बचाने के लिए यह बयान दे रही है कि हमारा गठबंधन विधानसभा चुनाव के लिए हुआ था. साफ़ है कि कांग्रेस को यहां भी कोई जवाब नहीं सूझ रहा है. इतना ही नहीं गठबंधन में रहने के बावजूद कांग्रेस पार्टी की सरकार में एक नहीं चल रही है. कार्यकर्ता तो कार्यकर्त्ता पार्टी के विधायक भी ढाई वर्षों में दर्जनों बार सरकार के निर्णयों और कार्यशैली की मुखालफत कर चुके हैं, लेकिन हर बार कांग्रेस अपने में मीटिंग कर मामले की इति श्री कर दे रही है.
कांग्रेस की बरामदा कमिटी में पार्टी के निर्णयों के खिलाफ सुलग रही है आग
झारखंड कांग्रेस में लगभग पिछले छह वर्षों से प्रदेश कमिटी का गठन नहीं हुआ है. अंतिम बार प्रदेश कमिटी का गठन सुखदेव भगत के समय हुआ था. लेकिन इस अवधि में पार्टी में कई अध्यक्ष आये और चले गए. प्रदेश कमिटी के गठन करने की हिम्मत किसी ने नहीं जुटाई. इस अवधि में एक बरामदा कमिटी जरुर बनी जिसकी बैठक हर दिन प्रदेश कार्यालय में प्रदेश अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों के चेंबर के नीचे होती है. इस बरामदा कमिटी में सिर्फ और सिर्फ अपनी ही पार्टी के निर्णयों पर चर्चा होती है. बरामदा कमिटी में कांग्रेस के कई दिग्गज नेता भी बैठते हैं. हाल में हुए राज्यसभा चुनाव और राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी के निर्णयों का बरामदा कमिटी में जमकर ऑपरेशन हुआ. बरामदा कमिटी में शामिल नेताओं का कहना था कि झारखंड कांग्रेस में मात्र छह लोगों की चलती है. प्रभारी, अध्यक्ष और सरकार में शामिल चार मंत्री. यही छह जो चाहते हैं वो होता है.
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लगातार कांग्रेस पार्टी को सरकार में नीचा दिखाया जा रहा है लेकिन मजाल है कि इनमें से कोई कुछ बोल दे. भैया कार्यकर्ता चूल्हे भांड में जाए सत्ता की चासनी का मजा तो मिल ही रहा है. कभी कभी इस बरामदा कमिटी को विधायकों का भी सानिध्य मिल जाता है. जिस दिन विधायक बरामदा कमिटी के साथ बैठते हैं उस दिन विधायकों का कोई न कोई बयान सुर्ख़ियों में आ जाता है. कांग्रेस में भीतर ही भीतर पार्टी के हालिया निर्णयों के खिलाफ आग सुलग रही है. सरकार में रहकर भी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को सम्मान नहीं मिल रहा है. एक-दो बार तो कार्यकर्ताओं की नाराजगी से पार्टी नेतृत्व को दो-चार भी होना पड़ा है. विधायकों की नाराजगी तो कई बार सुर्खियाँ बन चुकी है. अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व पार्टी के अन्दर सुलग रही आग को समय रहते बुझा पाता है या नहीं.




