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क्या रघुवर दास के लिए नरेंद्र मोदी का नजरिया बदल रहा है?

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Faisal Anurag

रघुवर दास को लेकर नरेंद्र मोदी का नजरिया बदला हुआ नजर आ रहा है. चुनाव प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है यह संकेत साफ नजर आने लगे है. नरेंद्र मोदी ने बरही और बोकारो में रघुवर दास की प्रशंसा नहीं कर इसके संकेत दिये हैं.

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इसके पहले भी चुनाव प्रक्रिया के ही दौरान नरेंद्र मोदी ऐसे संकेत दे चुके हैं. तो क्या यह भाजपा की रणनीति का हिस्सा है. अमित शाह ने तो अपने भाषणों में रघुवर दास के नाम का बार-बार उल्लेख किया है. रूझानों के आकलन के बाद ही पहले दौर के बाद से ही भाजपा ने रणनीति बदली है.

चुनाव शुरू होने के पहले से ही उसने अपने नारों को बदलना शुरू किया था और जैसे-जैसे चुनाव प्रक्रिया आगे बढ रही है, उसकी रणनीति लगातार बदलती नजर आ रही है. विकास के एजेंडे को तो भाजपा पहले ही दरकिनार कर चुकी है.

प्रधान मंत्री मोदी ने भ्रष्टाचार के सवाल पर विपक्ष को जरूर घेरा है, लेकिन इस सवाल पर तो भाजपा से ही बाहर निकले सरयू राय ने विपक्ष को बड़ा एजेंडा दे दिया है. राहुल गांधी ने अपने भाषण में रघुवर दास पर भ्रष्टाचार के मामले में ही हमला किया है और झामुमो के हेमंत सारेने ने रघुवर दास के कार्यकाल में हुए तमाम घोटालों की सूची सार्वजनिक कर दी है.

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चुनाव के परिणाम ही साबित करेंगे कि भ्रष्टाचार का सवाल वोटरों के लिए कितना महत्वपूर्ण है. वैसे अतीत में देख गया है जो भ्रष्टाचार के मामले में जितना बढ़ा आरोपी है, वह चुनाव उतनी आसानी से ही जीतता रहा है.

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यह तो देश भर की परिघटना है. दल-बदलुओं और अपराध के आरोपियों के साथ भ्रष्टाचार के आरोपी भी वोटरों के लिए नफरत के कारक नहीं बन पाए हैं. कर्नाटक विधानसभा के उपचुनाव में वे तमाम दल-बदलू आराम से चुनाव जीत गए. जिन पर जनादेश का अपमान करने और धन लेकर विधानसभा से इस्तीफा देने का आरोप है.

झारखंड में तो भ्रष्टाचार और गंभीर अपराधों के आरोपायियों के लिए चुनावी मैदान में जीत हासिल करना बेहद आसान रहा है. राज्य बनने के बाद से जिन नेताओं के नाम भ्रष्टाचार के आरोप में उजागर हुए उनकी राजनीतिक विरासत उतनी ही परवान चढ़ी है. भाजपा ने तो ऐसे लोगों को खास तौर पर उम्मीदवार बनाया है. भानुप्रताप शाही, शशिभूषण मेहता और ढुल्लू महतो इस प्रवृति के ही संवाहक हैं.

इस बार का चुनाव यदि बेहद कशमकश भरा हुआ है तो इसका एक बड़ा कारण वोटर ही हैं. क्योंकि उनकी नारजगी विभिन्न तरीकों से व्यक्त होती रही है. लेकिन चुनाव परिणाम इससे कितना सत्ता विरोधी रूझान प्रकट करेगा यह आकलन तो 23 दिसंबर के बाद ही संभव होगा.
वोटरों के रूख को राजनीतिक दल भांप नहीं पा रहे हैं. यही हाल राजनीतिक प्रेक्षकों के साथ भी है. पिछले कई चुनावों के बाद यह तो तय ही हो चुका है कि वोट प्रतिशत किसी चुनावी परिणाम के आकलन का आधार नहीं रह गया है.

यह धारणा ही भ्रामक थी कि वोट प्रतिशत का बढ़ना सत्ता विरोधी रूझान होता है. भारत में अब तक हुए चुनावों में केवल तीन या चार ही चुनाव ऐसे हुए हैं जहां वोट प्रतिशत की बढ़ोत्तरी सरकार विरोधी रूझान को सही साबित करता रहा है.

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लेकिन यदि सही तरीके से अघ्ययन किया जाए तो 1952 के बाद से हुए अब तक के तमाम विधान सभा और लोकसभा चुनाव के परिणाम वोट प्रतिशत की बजाए अन्य कारकों से तय होते आये हैं. कई बार तो वोटरों की नाराजगी देखे जाने के बाद भी चुनाव परिणाम उस नाराजगी के विपरीत रहा है.

कई बार तो ऐसा भी देखा गया है कि गठबंधन की राजनीतिक भी परवान नहीं चढ़ी है और कइ बार गठबंधन की साख सत्ता विरोधी साबित हुई है. झारखंड विधानसभा चुनाव को देखते हुए भी कहा जा सकता है कि आमतौर पर वोटरों में नाराजगी तो है, लेकिन वह किस तरह के चुनाव परिणाम की राह तय करेगें यह 23 दिसंबर को ही पता चलेगा.

चूंकि मतदाताओं के विभिन्न समूहों की नाराजगी के कारण अलग-अलग होते हैं और किसी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन पाती है. वैसे हालात में राजनीतिक दलों का परेशान होना स्वाभाविक ही है. बावजूद इसके झारखंड में विपक्ष का गठबंधन को यदि बढ़त दिख रहा है तो इसका ठोस आधार है. भाजपा ने इसे देखते हुए ही चुनावी रणनीति में बदलाव किया है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह आजमाए फॉर्मूले को ही आधार बना कर वोटरों को ध्रुवीकृत करने का प्रयास कर रहे हैं.

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