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वेंटिलेटर पर भारतीय अर्थव्यवस्था

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Girish Malviya

अब तो आप समझिए कि हम लोग क्यों कह रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत वेंटिलेटर पर लिटाने जैसी हो गयी हैं! आज खबर आयी है कि इस साल मार्च में इंडस्ट्रियल ग्रोथ 5.3 फीसदी से घटकर -0.1 फीसदी पर आ गई है.

ये आंकड़े 23 महीने में सबसे कम है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि आईआईपी ग्रोथ के गिरने का अनुमान पहले से था. लेकिन ये नंबर्स अनुमान से बेहद खराब है. ऑटो सेल्स में आई गिरावट का असर भी इन आंकड़ों पर है.

कल ही प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय का बयान सामने आया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था गहरे संकट की ओर जा रही है.

उनके हिसाब से भारत भी ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीक़ा जैसे धीमी गति के विकासशील देशों की राह पर चल पड़ा है. और डर है कि आर्थिक मंदी उसे घेर लेगी.

वित्त मंत्रालय से जुड़ी एक रिपोर्ट में यह सामने आया है कि 2018-19 में ग्रॉस टैक्स कलेक्शन में 1.6 लाख करोड़ रुपए की कमी आई है. अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, यह कमी विशेष रूप से दूसरी छमाही में आर्थिक मंदी को दर्शाती है.

क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके. जोशी भी कह रहे हैं कि ‘टैक्स में कमी से संकेत मिला है कि आर्थिक वृद्धि दर में कमी आई है.
खासतौर पर ऐसा दूसरी छमाही में हुआ, जिससे खासी उम्मीदों के बावजूद टैक्स कलेक्शन कम हो गया.’

डीके जोशी ने बताया कि इससे पता चलता है कि टैक्स कलेक्शन टारगेट को मुख्य रूप से इस साल हासिल करना खासा मुश्किल होगा.

धीमी आर्थिक विकास का जॉब मार्केट पर सीधा असर पढ़ता है. भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र (CMIE) के डेटा के अनुसार, पिछले मार्च महीने में बेरोजगारी का प्रतिशत 6.71 था, जो अप्रैल में बढ़कर 7.6 प्रतिशत हो गया.

डेटा से यह भी खुलासा हुआ है कि यह बेरोजगारी दर अक्टूबर 2016 के बाद से सबसे ज्यादा है. कुल मिलाकर आर्थिक मोर्चे पर हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को नेहरू और राजीव गांधी को कोसने के अलावा कोई दूसरा काम नही है.

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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