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दिल्ली में किसानों की दस्तक से बढ़ा राजनीतिक तापमान

दिल्ली की सड़कों पर लगे नारे साफ बता रहे हैं कि किसानों की उपेक्षा केंद्र के लिए खतरे की घंटी है

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Faisal Anurag

किसान मुक्ति मार्च से एक बार फिर जाहिर हो गया है कि भारत के किसान और किसानी गहरे संकट में हैं. अन्नदाताओं का गुस्सा अब राजनीतिक रूप ग्रहण कर गया है. दिल्ली की सड़कों पर लगे नारे साफ बता रहे हैं कि किसानों की उपेक्षा केंद्र के लिए खतरे की घंटी है. दिल्ली दो दिनों से इस नारे के साथ गुंज रही है कि हो किसानों का कर्ज माफ नहीं तो होगी मादी सरकार साफ. किसानों का यह आक्रोष स्वाभाविक है और इसकी एक ऐतिहासिकता भी है. अन्नदाताओं के सामने करने या मरने के हालात राजनीतिक वायदाखिलाफी के कारण पैदा हुए हैं. दिल्ली मार्च में बड़े और छोटे किसानों के साथ मध्यवर्ग के विभिन्न तबकों के साथ छात्रों की भागीदारी इस बात का संकेत है कि भारत में युवा,किसान और मजदूरों के बीच संघर्ष की एकता बन रही है.

एक नई राजनीतिक इबारत इससे लिखी जा सकती है. मशहूर पत्रकार पी साईनाथ ठीक ही कह रहे हैं कि किसानों का यह संकट सभ्यता का संकट है और साथ ही इंसानियत का भी. साफ है कि किसानों का सवाल केवल नीतियों में बदलाव या राहत देने तक ही सीमित नहीं है. इसके लिए बड़े कदम उठाने की जरूरत है. उदारीकरण की प्रक्रिया ने भारतीय खेती और किसानी के समाने जानलेवा संकट खड़ा किया है और देश की लगभग सभी राज्यों के लिए यह संकट गहरा हो गया है. सरकारों का प्रयास खेती को पूंजीवादी तरीके से हल करने का है, जबकि यह संकट इससे कहीं ज्यादा की मांग करता है. भारत में भूमि सुधार के उलझे संदर्भ में इसे गहरायी से समझा जा सकता है. एक तरफ बड़े और मझोले किसान भी उसी तरह परेशान हैं, जिस तरह सीमांत किसान हैं. हालांकि दोनों के बीच संकट की उग्रता का अंतर है, लेकिन संकट तो है ही.

दिल्ली मार्च में किसानों की मांगे स्पष्ट हैं. किसान कर्ज से पूरी मुक्ति चाहते हैं और स्वामीनाथन रिपोर्ट की सिफारिशों को भी पूरी तरह लागू किए जाने की मांग कर रहे हैं. इस मार्च ने यह भी उजागर कर दिया है कि सरकारी की फसल बीमा योजना किस तरह किसानों के लिए काल साबित हो रहा है. किसानों के बीमा के बाद भी उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिल रहा है और बडी कंपनियों के लिए यह लाभ का कारक बन गया है. किसानों के इस मुक्ति मार्च ने यह भी बता दिया है कि किसानों की आमदनी बढ़ने के बजाय घट रही है और एमएसपी धोखा साबित हुआ है. साथ ही खेती में क्षेत्र में डिजिटल प्रयोग विफल हुए हैं किसानों के लिए वह बोझ बन गया है. जाहिर है किसानों का प्रहार इन सभी कारणों से तीखा हो गया है और किसान चाहते हैं कि यदि बडे पूंजीपतियों को सरकार कर्ज माफी और राइटआफ का लाभ दे सकती है तो फिर देश के अन्नदाताओं कर उपेक्षा क्यों की जा रही है.

किसान यह भी कह रहे हैं कि यदि जीएसटी के लिए आधी रात को संसद का सत्र आहुत हो सकता है तो किसानों के लिये विशेष सत्र क्यों नहीं आहूत किया जा सकता है. किसानों ने यह भी सवाल उठाया है कि जिस तरह बैंको से धोखाधड़ी कर देश से अनेक लोग फरार हुए हैं, उनकी राशियों को जब्त कर किसानों और खेती को क्यों नहीं सरकार लाभ पहुंचा रही है.

किसान नेता कह रहे हैं कि जब कभी किसान दिल्ली को दर्द सुनाने आते हैं, उसे सुनने से सत्ता हमेशा भागती है. किसानों का तर्क है कि जाहिर होता है कि सरकार केवल बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिये ही काम कर रही है. वह बात तो किसानों की करती है, लेकिन किसानों को राहत देने का उसका कोई इरादा दिखता नहीं है. उदारीकरण के बाद से भारत के छोटे और मझोले किसानों को जमीन से बेदखल करने और खेती के क्षेत्र में बड़ी कंपनियों को प्रवेश दिलाने की कोशिश की जा रही है. पिछले साढ़े चार सालों में यह संकट और गहरा हो गया है. किसानों की खेती की जमीन को छीनकर कॉरपोरेट घरानों को देने के प्रयास तेज किए जा रहे हैं और आत्मनिर्भर भारत को हरित क्रांति के पूर्व के दौर में ढ़केलने का प्रयास किया जा रहा है. किसान मुक्ति मार्च इन हालातों को बदलना चाहता है. उसकी पुकार है कि इंसानियत के इस गहरे संकट का निदान नहीं हुआ तो मानवता को इसका दंश झेलना पडेगा.

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कुछ ही महीने पहले ही दिल्ली में किसानों पर बर्बरता पूर्ण लाठीचार्ज से भी किसान आहत हुए थे और इस मार्च में भी उनके स्वर में इसकी तल्खी दिखायी पड़ रही है. मुंबई में हुए किसान प्रदर्शन  के बाद सरकार ने जिस तरह उन्हें धोखा दिया उससे भी महाराष्ट्र के किसान नाराज हैं. कोलकता में भी किसानों ने मार्च कर अपना आक्रोश और अपनी समस्याओं को रखा है.

सवाल उठता है कि सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच फासले क्यों हैं. इसे यदि हल नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में किसानों के और भी सख्त तेवर उभर कर सामने आएंगे.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं)

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