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ओलिंपिक की मेजबानी मिले, तो खेल के लिए अच्छा माहौल तैयार होगा

दिल्ली में 1982 में आयोजित 9वें एशियन गेम्स की सुखद यादें हम सबके मानस पटल में अब तक रची बसी हुई हैं.

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Rajesh Kumar Das   

दिल्ली में 1982 में आयोजित 9वें एशियन गेम्स की सुखद यादें हम सबके मानस पटल में अब तक रची बसी हुई हैं. क्या आलम था, अप्पू हाथी तो हम बच्चों का सबसे चहेता था, भारत ने अच्छा प्रदर्शन भी किया था, कुल 57 मेडल्स और 5वें स्थान पर कब्जा. सब कुछ बेहद अच्छा लगता था. इस गेम के बाद हम बच्चों की दुनिया भी बदली सी थी, हम खुद भी अपने-अपने मुहल्लों में जो भी व्यवस्था हो सके, उन खेलों को खुद नंगे पैर खेलने की कोशिश भी करते थे. दिल्ली का भी इस गेम के बाद बढ़िया कायाकल्प हुआ, और दिल्ली वास्तव में देश की राजधानी सरीखी लगने लगी. इसके बाद के सालों में एशियन खेलों की प्रेरणा से ही के भारत के कई खिलाड़ियों ने कई प्रतियोगिताओं में बढ़िया प्रदर्शन भी किया, पीटी उषा, शायनी अब्राहम, अंजू बॉबी जॉर्ज उनमें से ही कुछ मुख्य हैं.

1896 में एथेंस में शुरू होकर ओलिंपिक ने लंबा सफ़र तय किया है

1896 में एथेंस में शुरू होकर ओलिंपिक ने भी एक लंबा सफ़र तय किया है. हां, भारत का ओलिंपिक सफ़र कुछ ढीला सरीखा ही रहा है. हॉकी और जाधव साहब को छोड़ दें तो भारत के खिलाड़ियों ने ओलिंपिक में मेडल लाने के लिए लंबा इंतजार भी कराया. पेस ने अटलांटा (1996) और मल्लेशवरी ने सिडनी (2000) में कांस्य पदक, सरकार के वर्तमान मंत्री राज्यवर्धन सिंह ने एथेंस (2004) में रजत पदक और फिर 2008 में गोल्ड के सपने को अभिनव बिंद्रा ने बीजिंग में सच करके दिखाया. 2012 में लंदन ओलिंपिक में 2 रजत और 4 कांस्य पदक लाने के बाद ऐसा लग रहा था कि भारत मिथक तोड़ रहा है और अब खेल की दुनिया में हमारा समय आ चुका है. मगर 2016 में रियो और फिर जकार्ता में वर्तमान में जारी एशियाई खेलों के प्रदर्शन ने हमारी उम्मीदों को थोड़ा निराश ही किया है. हालाँकि रियो के हमारे सितारे साक्षी मलिक, पीवी सिंधु, दीपा कर्माकार और जकार्ता में भारतीय पुरुष हाकी और निशानेबाजी में 16 वर्षीय सौरव ने बेहद शानदार प्रदर्शन किया है, फिर भी खेलों की दुनिया में हमारी बारी का सभी को तहे दिल से इंतेजार है.

भारत में खेलों के विषय में सुधार के लिए कुछ अलग और नया हो

 1. टोक्यो, लंदन, लॉस एंजेल्स, एथेंस और पेरिस ने अब तक एक से अधिक बार ओलिंपिक खेलों की मेजबानी की है, भारत को यह गौरव अब तक एक बार भी नहीं मिल सका है. अगर ऐसा होता तो भारत में भी इन खेलों को लेकर काफ़ी अच्छा माहौल तैयार होता, अच्छी संरचनाएं बनती और अच्छे प्रशिक्षक इस क्षेत्र में खिलाड़ियों को तैयार करते. ओलिंपिक मेडल तालिका में हमारा तिरंगा हर तरफ साफ दिखाई देता. इस ज़रूरी प्रयास को विशेष गति दी जानी चाहिए ताकि हमारे देश को भी आने वाले वर्षों में ओलिंपिक की मेजबानी मिले और इसके बृह्तर लाभ के रूप में हमारी नयी पीढ़ी खेल-कूद की दुनिया में सुनहरे अक्षर से देश का और अपना नाम दर्ज करवा पाये.

2. वर्तमान में हमारी खेल नीति बहुत सही नहीं है. यहां मैनें देखा है कि लोग खेलों को मुख्यतः नौकरी पाने के नज़रिए से लेते हैं. एक बार नौकरी मिल गयी, खेलने का जोश भी धीरे-धीरे ख़तम. हां कुछ अपवाद भी जरूर हैं. अगर सरकार हर एक खिलाड़ी को एक प्रॉजेक्ट की तरह ले, तो स्थिति बदल सकती हैं, हर कीमत पर उनके खेलने के जोश को कायम रखा जाना चाहिए. उनके जीविका को दो भाग में बांटा जा सकता है, एक वह जब वह खिलाड़ी खेलने के लायक उम्र में हो और दूसरे जब वह खेलों से रिटायर हो जाये. रिटायरमेंट के वक़्त उनको दी जाने वाली मुख्य जीविका का आधार उनके खेल का प्रदर्शन ही होना चाहिए, जैसे अगर किसी ने ओलिंपिक में गोल्ड जीता हो तो उसका वेतन भारत में किसी भी अन्य बड़े अधिकारी के समतुल्य या थोड़ा अधिक ही होना चाहिए. इसी तरह अन्य विजेताओं के स्लैब्स भी तय किये जा सकते हैं. इस तरह के नवाचारी प्रयोग से ही स्थितियां तुरंत बदल सकती है. खेलने लायक उम्र में खिलाड़ी को सिर्फ़ और सिर्फ़ खेल पर ही केंद्रित रखने की नीति हमारे देश के लिए ज़्यादा प्रभावकारी साबित हो सकती है.

3. यहां जिला स्तर पर खिलाड़ियों को खेल के लिए प्रोत्साहन की करने स्थिति भी बहुत खराब है, ना कोई जवाबदेही, ना कोई संरचना और ना ही कोई प्रशिक्षण और जीतने के टार्गेट्स. राज्य स्तर पर भी जो संरचनाएं हैं उनका सही इस्तेमाल भी वर्तमान में नहीं हो पा रहा है. मेरे ख्याल से हर राज्य में किसी एक या ग्रुप ऑफ कॉर्पोरेट्स को चार-आठ साल के लिए उस राज्य के खेल विभाग की ज़िम्मेदारी दी जानी चाहिए और उन्हें उसका भुगतान भी किया जाना चाहिए. अगर कोई कॉर्पोरेट समूह खेल की दुनिया में अच्छा प्रदर्शन करा सके तो उनके कुछ टैक्स (2-5% तक) माफ़ करके सीधे बूल्ज़ाइ को भी हिट किया जा सकता है. कॉर्पोरेट्स ज़िम्मेवारी से अमीर और ग़रीब हर तबके से समान रूप से खिलाड़ी तैयार करें और किसी के साथ कोई अन्याय ना हो इसके लिए एक स्वतंत्र ग्रीवान्स सेल का गठन भी किया जा सकता है.

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4. खिलाडियों को सही पोषण मिले इसपर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है, प्रोटीन-कैल्शियम-कैलोरी अदि सही तरीके से देने की व्यवस्था की जानी चाहिए. गरीब अफ़्रीकी देशों से भी खिलाड़ी अच्छे प्रोटीन और अन्य पोषण के बूते अच्छा प्रदर्शन करने में कामयाब हैं.

5. नोयडा सहित देश के कई शहरों में डेकाथलोन के नाम से खेल कूद के सामानों की एक बड़ी दुकान है. इन दुकानों के सामने एक छोटी ही सही पर एक कंक्रीट का मैदान बनाया गया है, घेराबंदी है हमारे  बच्चे यहां पर आकर खेल सकते हैं. यहाँ के सभी सेल्स स्टाफ्स खेलों की दुनिया से है, वे बच्चों को खेल से जुड़ी कई बातों पर सही राय दे सकते हैं, सही उपकरण की जानकारी दे सकते हैं. अगर सरकार चाहे तो इस तरह के छोटे मैदान (बिना कंक्रीट की सतह के) तार की घेराबंदी-बेंच आदि के साथ देश के हर क्षेत्र और प्रदेश में बनाये जा सकते हैं, जहाँ बच्चे खेल सकें. खास समय पर प्रशिक्षक यहां जाकर बच्चों को टिप भी दे सकते हैं. हमारे अपने घरेलू सितारे भी यदि अपने व्यस्त समय से हमारे प्रधानमंत्री थोड़ा समय निकाल पायें, पूरा प्रशिक्षण ना दें पर कैंप लगाकर बच्चों को प्रेरित करें, तो हमारे देश में भी खेल कूद की अच्छी पौध तैयार हो सकती है.

6. इसी प्रकार लगभग रोजाना देश के किसी ना किसी हिस्से से, किसी ना किसी जलाशय, नदी, समंदर, जल प्रपात आदि में बच्चों समेत वयस्कों के डूबकर हो रही मौतों से जुड़ी दुखद खबरें हमें लगातार प्राप्त होती रहतीं हैं, जो हमें अंदर तक उद्वेलित कर देती हैं. खबरों को पढ़कर मन काफी दुखित हो जाता है, थोड़ा संताप रहता है, फिर जीवन अपने पटरी पर लौट आता है, लोग इन खबरों को भूल जाते हैं, मगर जिनके परिवार में इस प्रकार की घटनाएं होती है, उनके दुख का अनुमान लगा पाना बेहद मुश्किल काम है.

 सरकारी नीति पूरे परिदृश्य को बदल कर रख सकती है

यहीं पर एक नवाचारी सरकारी नीति पूरे परिदृश्य को बदल कर रख सकती है. अगर भारत की सरकार देश के हरेक ब्लॉक के मुख्यालय में सर्वसुविधायुक्त  अटल स्मृति तरणतालका निर्माण करा दे, जहां बच्चे तैराकी को खेल के साथ एक जीवन कला के रूप में सीख सकें तो इससे एक साथ कई हित साधे जा सकते हैं. एक अच्छा तैराक विपरीत परिस्थिति में पानी में खुद के साथ औरों की जान बचाने में भी कामयाब हो सकता है. इसके साथ तैराकी हमारे सर्वांगीण फिटनेस के लिए भी अच्छा है, तैरने से मन भी खुश रहता है, बुरी प्रवृतियों से बच्चों का मन भी दूर रह सकता है, और क्या पता यहीं से कोई माइकल फेल्प्स से भी बड़ा तैराक निकल जाये जो देश का बहुत मान ऊंचा कर सके.

                                                                                                                          यह लेखक के निजी विचार हैं

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