Opinion

काश, हमारे सेना सचिव या पुलिस प्रमुख भी कह पाते, हम राष्ट्रपति को नहीं संविधान व कानून को मानेंगे

Surjit Singh

आपने सुना होगा. अमेरिका में पुलिस ने एक अश्वेत को सड़क पर मार डाला. जिसके बाद पब्लिक सड़क पर है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बंकर में छुपना पड़ा. ट्रंप ने यहां तक कहा कि प्रदर्शनों पर काबू पाने के लिए वह सेना को उतारने जा रहे हैं. यह सब आपने अखबारों में पढ़ा होगा.

पर, क्या आपने पढ़ा कि वहां की सेना सचिव ने क्या कहा. वहां की पुलिस ने क्या कहा. पहले पुलिस प्रमुख का बयान जानिये. पुलिस प्रमुख ने कहाः अगर राष्ट्रपति ट्रंप कुछ अच्छा नहीं बोल सकते तो अपनी जुबान बंद रखें. इसके बाद कल सेना सचिव का बयान आया. उन्होंने कहाः सेना ट्रंप के आदेश को मानने के बजाय संविधान को मानें.

अमेरिका एक लोकतांत्रिक देश है. बिल्कुल भारत की तरह. वहां भी सेना या पुलिस की नौकरी ज्वाइन करते वक्त संविधान की शपथ दिलायी जाती है. भारत में भी ऐसा ही होता है. पर, क्या आपने कभी सुना है कि भारत की सेना के किसी अधिकारी या डीजीपी ने अपने जवानों को सत्ता के आदेश मानने के बदले संविधान व कानून की बात मानने का निर्देश या सलाह दिया हो. नहीं. क्यों?

तो क्या यह मान लिया जाये कि भारत के राजनेता संविधान और कानून से अलग निर्देश देते ही नहीं. या सच में हमारी सेना के अधिकारी व पुलिस प्रमुख सिर्फ संविधान या कानून को ही मानते हैं. अगर आप ऐसा सोंचते हैं या मानते हैं, तो बहुत बड़ी गफलत में हैं. अगर हमारे सत्ताधीश इस तरह के निर्देश दे दें, तो हमारी सिस्टम सच में जनता को भून कर रख देगी.

हमारे देश में राजनेता अपनी सनक को लागू कराने के लिए हर दिन कानून से खेलते हैं. अफसरों को निर्देश देते हैं. और हमारे अफसर, जो 30-35 सालों के लिए सर्विस में आते हैं, उसे लागू कराते हैं. आप नोटबंदी के दौरान आरबीआइ की भूमिका, दिल्ली दंगा के दौरान पुलिस द्वारा पांच मुसलिम युवकों को पीटकर उनसे राष्ट्रगान गाने के लिए कहना, लॉकडाउन के दौरान सड़क पर मजदूरों के साथ हुए व्यवहार से लेकर तमाम तरह की घटनाओं को याद कर सकते हैं. अफसरों ने क्या किया. अफसरों ने जनता के लिए काम नहीं किया. अफसरों ने सिर्फ सरकारी आदेश मानें. जबकि उन आदेशों से जनता को नर्क जैसे हालात से गुजरना पड़ा.

एनडीए सरकार में सीबीआइ मुख्यालय की घटना को भी याद कर सकते हैं. कैसे सत्ताधीशों की पसंद के आगे अफसरों में लड़ाई हुई. लड़ाई भी ऐसी कि जिससे देश को शर्मशार होना पड़ा.

झारखंड में ही देख लें. रघुवर सरकार में डीजीपी रहे डीके पांडेय क्या करते थे. वह खुलेआम सत्ताधारी दल भाजपा का प्रचार करते रहते थे. शहर से लेकर गांव तक. यहां तक कि मंदिरों में जाकर भी.

आखिर यह सब क्यों होता है. इसलिए कि रिटायरमेंट के बाद सरकार कोई अच्छा सा पद दे दें. सत्ता से सटे रहो, हर जायज-नाजायज बात को मान लो, लागू करवा दो, तो पद पर बने रहेंगे. गौर करेंगे तो ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे. जिसमें सत्ता से चिपके रहने वाले अफसर रिटायरमेंट के बाद सरकार में महत्वपूर्ण ओहदों पर रहें.

सवाल उठता है कि हमारा सिस्टम इतना कमजोर क्यों है. क्यों हमारी सेना और पुलिस देश की जनता के बदले सरकार में बैठे लोगों के प्रति वफादार है. क्योंकि हमारा देश सिर्फ संविधान को पूजता है. देश के नेता, अफसर, पत्रकार और जनता संविधान को पवित्र मानता है. पर संविधान का सम्मान नहीं करता.

हम संविधान के प्रति कोई आस्था नहीं रखते. अपने फायदे के लिये संविधान व नियम कानून को तोड़कर उसे जायज करार देते हैं. तभी तो सड़क पर मर रहे मजदूरों पर पुलिसिया जुर्म को भी हमने बर्दाश्त कर लिया.

अगर सच में हम संविधान को बचाना चाहते हैं, तो हमें इसका सम्मान करना होगा. हमें सरकार और अफसर के उन सभी फैसलों का विरोध करना होगा, जो संविधान व कानून के दायरे में नहीं होते. तभी हम अपने अधिकारों की रक्षा कर पायेंगे और देश में कानून का राज कायम भी कर पायेंगे.

 

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