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रिजर्व बैंक की “रिजर्व “ मनी से कमजोर होती अर्थव्यवस्था को कितनी मजबूती मिल सकेगी

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Faisal Anurag

इकोनोमी का इम्यून यानी प्रतिरोधक क्षमता ही किसी भी झटके और हमलों के खिलाफ उठ खड़ा होने का साहस ओर ताकत देती है. जिस तरह कैंसर किसी व्यक्ति के रोग प्रतिरोधी क्षमता को कमजोर करता है ओर कैंसरग्रस्त व्यक्ति के समाने अंधेरा बढ़ाता है, वैसे ही इकोनोमी की रिजर्व क्षमता किसी भी देश के हालात का बयान कर देता है.

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तर्क चाहे जैसा भी दिया जाये इस हकीकत को लंबे समय तक नकारा नहीं जा सकता है कि देश की आर्थिक दशा गंभीर होती जा रही है. 1 लाख 76 हजार करोड़ की राशि का मामला भी कमोबेश इससे ही जुड़ा दिख रहा है. हालांकि रिजर्व बैंक के निर्णय के बाद शेयर बाजार मुस्करा रहा है. लेकिन अर्थ जगत के विशेषज्ञ का अंदेशा उन्हें परेशान कर रहा है.

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विमल जालान कमेटी की सिफारिशों का हवाला दे कर रिजर्व बैंक ने अपने खजाने का बड़ा हिस्सा सरकार को सौंप दिया है. विमल जालान भारत के रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रहे हैं. और अर्थशास्त्र की एक धारा के विशेषज्ञों में उनका सम्मान है. इकोनोमिक कैपिटल फ्रेमवर्क की समीक्षा के लिए उनके नेतृत्व में एक कमिटी का गठन पिछले साल 26 दिसंबर को किया गया था.

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रिजर्व बैंक का रिजर्व कितना होना चाहिए यह तय करने के लिए पहले भी तीन कमिटियां बन चुकी हैं. 1999 में वी सुब्रहण्यम, 2004 में थेराट और 2013 में मालेगाम के नेतृत्व में कमिटियों का गठन किया गया था. इन सब की रिपोर्ट रिजर्व बैंक के पास है. इन कमिटियों की रिपोर्ट में रिजर्व राशि को लेकर अनेक सुझाव दिये गये हैं. जालान कमिटी की रिपोर्ट को अब सार्वजनिक किये  जाने की जरूरत है.

जिससे साफ हो सके कि वास्तव में उनकी कमिटी का पूरा नजरिया किस रूप में व्यक्त हुआ है. वास्तव में इकोनोमी को ले कर गहराई से समीक्षा किए जाने के दायित्व का निर्वाह किया जाना चाहिए. ताकि वर्तमान चुनौतियों के हल के लिए रास्ता निकल सके.

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रिजर्व बैंक सरकारों को राशि देती रहती है. लेकिन पिछले पांच साल में दी गयी राशि की तुलना में यह दो गुना से भी ज्यादा है. इसलिए इसकी इतनी चर्चा हो रही है. 2008 में 15 हजार करोड़, 2009 में 25 हजार करोड़ की राशि रिजर्व बैंक ने उस दौर में दी थी जब ग्लोबल स्लोडाउन से दुनिया की इकोनोमी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी और भारत ने कामयाबी के साथ उस चुनौती का सामना किया था.

2010 में 18 हजार करोड़  और 2011 में 16 हजार करोड़ राशि सरकार को रिजर्व बैंक ने दिया था. लेकिन 2013 में इस राशि में जबरदस्त बढोतरी हुई और रिजर्व बैंक को 33 हजार करोड़ देना पड़ा. 2014 में 52 हजार करोड़ और 2015 में 65 हजार करोड़. 2016 में जब नोटबंदी की गयी थी, तो रिजर्व बैंक ने 65 हजार करोड़ सरकार को दिया. 2018 में 50 हजार करोड़ राशि सरकार के खाते में दी गयी.

इस साल यह राशि सीधे 1 लाख 76 हजार करोड हो गयी है. ये आंकड़े उस दौर के हैं जब भारत के ग्रोथ रेट को ले कर काफी बातें की जाती हैं. और भारत की इकोनोमी को 5 ट्रिलियन बनाने का स्वप्न देखा गया है.

रघुराम राजन के इस्तीफे के पीछे जो बहुत कुछ कारक थे उसमें एक तो रिजर्व राशि को सरकार को देने का मामला भी रहा है. उर्जित पटेल के जमाने में भी सरकार और रिजर्व बैंक के बीच इस सवाल पर विवाद हुआ था. और लंबी जद्दोजहद के बाद पटेल को सरकार के सामने झुकना पड़ा था. अरुण जेटली ने रिजर्व बैंक की राशि पर सरकार के दावे को सहज और मालिकाना हक बताया था. उनकी इस टिप्पणी को ले कर अनेक अर्थशास्त्रियों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी. विमल आचार्य का इस्तीफा भी इनको कारकों के से सवाल अलग नहीं था. मोदी सरकार ने तो रिजर्व बैंक से 3 लाख 50 हजार करोड़ की मांग की थी. लेकिन रिजर्व बैंक 1 लाख 76 हजार पर ही सहमत हुआ.

रिजर्व बैंक के इस निर्णय पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने तीखी प्रतिप्रक्रिया व्यक्त करते हुए इसे बेहद तल्ख शब्दों में रिजर्व बैंक लूट कहा है. भाजपा इस प्रतिक्रिया पर बिफर गयी है. राहुल गांधी ने कहा है कि रिजर्व बैंक की इस लूट के बावजूद सरकार इकोनोमी को सुधार नहीं पायेगी. उन्होंने यह भी कहा है कि  ठीक इतनी ही राशि बजट बजट प्रस्ताव में मिसिंग है. राहुल गांधी का यह आरोप बजट के दौरान भी आया था.

उन्होंने कहा है कि यह फैसला न केवल बैंक की अन्य फंडिंग को प्रभावित करेगा बल्कि इकोनोमी की दशा को भी इससे भारी नुकसान होगा. राहुल गांधी का आरोप है कि यह मोदी और सीमारामण के इकोनोमिक सेल को पटरी पर लाने के उनके क्लूलेस होने का ही संकेत है.

इकोनोमी के कुछ जानकार कह रहे हैं कि भारत के लिए आनेवाले दिन आसान साबित नहीं होंगे. सरकार इसे किस तरह खर्च करती है और इसका असर क्या होता, यह देखना होगा. और तब ही सही आकलन संभव हो सकेगा. हालांकि ये जानकार कहते हैं कि सरकार का रिजर्व फंड पर इस तरह हाथ लगाना घातक होता है. यह भी इससे पता चलता है कि किस स्तर तक सरकार का प्रबंधन गड़बड़ है.

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