Opinion

फर्ज निभाना भी अब एक जोखिम बन गया है

Faisal Anurag

शासकों और उनके पिछलग्गू नौकरशाहों के अनेक फैसले न केवल मनमानी भरे होते हैं, बल्कि उनमें लोकतांत्रिक मूल्यों का भी घोर अभाव होता है. हाल के सालों में इस तरह की मनमानी लगातार बढ़ती गयी है. इस स्थिती में कर्तव्य निभाने वाले सरकारी अधिकारियों को भी उनके कोपभाजन का शिकार होना पड़ रहा है. अपना फर्ज निभाने वाले ऐसे तमाम लोगों के पास अनेक पीड़ा हैं, जो कई बार मुखर भी नहीं हो पाती है. लेकिन उनके काम करने की निष्पक्षता प्रभावित होती है. यहां तक कि उन्हें मौके पर निर्णय लेने में भी परेशानी होने लगती है. आमतौर पर कल्पना यह है कि लोकतांत्रिक मूल्यों का हर स्तर पर पालन किया जाएगा और कर्तव्य निभाने वालों को सम्मान के नजरिए से देखा जाएगा. नौकरशाही में भी उच्चपदस्थ अधिकारी अपने मातहतों का केवल इस्तेमाल करना ही चाहते हैं.

साफ देखा जा रहा है कि वे अपने राजनीतिक आकाओं के सामने जिस तरह दंडवत करते हैं, उसी तरह की अपेक्षा अपने सहकर्मियों से भी करते हैं. झारखंड की नौकरशाही में इस तरह की प्रवृति 2014 के बाद ज्यादा मजबूत हो गयी है. इसका कारण यह है कि अनेक रिटायर या कार्यरत अधिकारियों को वीआरएस दिलाकर चुनाव लड़वाया गया. इसके पहले  भी नौकरशाह राजनीति में आते थे, लेकिन 2014 बिल्कुल भिन्न था. इसने बताया कि खास राजनीतिक विचारधारा के लिए अधिकारियों को प्रतिबद्ध बनाकर न्याय का गला घोंटा गया. केंद्र सरकार ने भी उन तमाम अधिकारियों का राजनीतिक संरक्षण देने का इन्हें शीर्ष पदों पर स्थापित अनेक मानदंडों का उल्लंघन किया. इन अधिकारियों को लेकर अनेक सवाल भी उठे हैं.

झारखंड में तो लगातार देखा गया कि अफसरों का तबादला एक बड़ा उद्योग बन गया है और उन अधिकारियों को भारी कीमत चुकानी पड़ी है, जो नौकरशाही के राजनीतिक सिंडिकेट का हिस्सा नहीं हैं. इस दौर में झारखंड में एक नया मामला सामने आया है, जिससे पता चलता है कि बड़े अधिकारियों के साथ उनकी पत्नियों का भी दखल बढ़ा है. अपना फर्ज निभा रहे रांची के एक डीएसपी को इसी प्रक्रिया का शिकार होना पड़ा है. उनका अपराध यह है कि उन्होंने गाड़ी पार्क करने के नियमों का कठोरता से पालन करते हुए कुछ बड़े अधिकारियों की पत्नियों के खिलाफ जाने का साहस दिखाया. पार्किंग नियम तोड़ने के कारण चालान काटा. कोई और व्यवस्था होती तो इस तरह के अफसर की सरकार और उनके नौकरशाह प्रशंसा करते. लेकिन पत्नियों की शिकायत पर उन्हें दंडित  किया गया. वैसे तबादले दंड नहीं कहकर पल्ला झाड़ा जा सकता है, लेकिन हकीकत को झूठलाया नहीं जा सकता है.

कई बार सरकारी कर्मचारियों की पीड़ा उभरकर सामने भी आयी है, लेकिन उसे नजरअंदाज करते हुए आवाज उठाने वाले को ही दंडित किया जाता रहा है. अभी कुछ ही समय पहले एक सुरक्षाकर्मी ने जब खराब खाना दिए जाने का सवाल उठाया तो सरकार ने उसे कठोर दंड दिया. वह सुरक्षाकर्मी अब भी मुकदमा लड़ रहा है. सुरक्षाकर्मी जान की कीमत देकर अपना कर्तव्य निभाते हैं. लेकिन जब बात अधिकार की होती है, तो उनकी बात को नजरअंदाज करने और इन्हें दंडित किए जाने के अनेक उदाहरण मौजूद हैं. सिविल अधिकारियों और कर्मचारियों का मामला तो इससे भी ज्यादा पेंचीदा है.

हक और फर्ज को जब अनुशासनहीनता मान लिया जाए तो यह सोचना जरूरी हो जाता है कि हालात गंभीर होते जा रहे हैं और ये लोकतांत्रिक देश के कर्मचारी और अधिकारी की भूमिका को भी सामंती और औपनिवेशिक तरीके से ही हल किया जाता है. यह प्रवृति बताती है कि औपनिवेशिकता के जाल को पूरी तरह तोड़ा नहीं जा सकता है. इस हालात को बदलने के लिए दशकों से बहस होती रही है और इस तरह के सवालों को उठाया भी जाता रहा है. नौकरशाही और राजनीति के संबंध को लेकर अनेक बार बहस हुयी है. इसे स्पष्ट बनाने और नौकरशाही को ज्यादा पारदर्शी बनाने और राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनने से रोकने के लिए अनेक सुझाव समय-समय पर सरकारों को दिए गए हैं. लेकिन कई आयोगों और कमेटियों की रिपोर्ट दफ्तरों की धूल फांक रही है. राजनीतिक दलों को नौकरशाही का इस तरह उनके प्रति समर्पित होना परेशान नहीं करता है. लेकिन एक कामयाब लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि प्रशासन की पारदर्शिता और किसी खास राजनीतिक दल के लिए प्रतिबद्धता पर अंकुश लगाया जाए.

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