
Kumar Kamesh
Dhanbad : झरिया और धनबाद देश के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में है. इस प्रदूषण का असर धनबाद में पक्षियों पर साफ देखने को मिल रहा है. कभी लोगों के घर-आंगन में चहकने-फुदकने वाली गोरैया अब धनबाद में शायद ही देखने को मिलते हैं. साथ ही यहां से कौए भी गायब हो गये हैं.
अब आपको धनबाद और झरिया में कहीं भी कौए की कांव-कांव सुनाई नहीं देगी. यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ी गोरैया और कौवों को गूगल में ही देख पायेगी. पर्यावरणविद लुप्त होते गोरैया और कौवों पर चिंता जाहिर करते हैं. वे कहते हैं कि यह पर्यावरण के लिए काफी खराब संकेत है. हम सबको मिलकर इन लुप्त हो रही पक्षियों के संरक्षण के लिए काम करना होगा.
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जहरीले धूल-कण के कारण पक्षियों में कम हुई प्रजनन क्षमता
इस संबंध में आइआइटी आइएसएम के वैज्ञानिक शुभोजित बनर्जी ने कहा कि लुप्त होते गौरैया और कौओं के लिए जिम्मेदार मोबाइल टावरों से निकलने वाले रेडियो तरंगें तो हैं ही. लेकिन धनबाद में माइनिंग के लिए हो रही अंधाधुंध पेड़ों की कटाई और माइनिंग के कारण धड़ल्ले से निकल रहे जहरीले धूल कण हैं.
शुभोजित का कहना है कि इन्हीं जहरीले धूल कण के कारण ग्रीनपीस ने धनबाद के झरिया को देश के सबसे प्रदूषित शहरों में नंबर एक पर रखा गया है. जबकि धनबाद को देश में दूसरे नंबर पर रखा गया है. उन्होंने कहा कि इन जहरीले धूल कण के कारण पक्षियों में प्रजनन की क्षमता कम हो रही है. उन्होंने कहा कि यही हाल रहा तो आज गोरैया और कौए लुप्त होने के कगार पर हैं, कल दूसरे पक्षियों के साथ भी ऐसा हो सकता है.
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लुप्त हो रही पक्षियों पर अध्ययन के लिए टीम गठित
जिले से लुप्त हो रही पक्षियों पर अब धनबाद नगर निगम गंभीर दिख रहा है. गोरैयों की लगातार कम होती संख्या पर निगम द्वारा सात सदस्यीय टीम का गठन किया गया है.
यह टीम नगर निगम के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर गोरैयों की कम होती संख्या और उसके कारणों पर अध्ययन करेगी. इसके बाद यह टीम अपनी रिपोर्ट नगर निगम को सौंपेगी.
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प्रदूषण कम करने की दिशा में नहीं उठाया गया कोई सार्थक कदम
झरिया और धनबाद को देश के सबसे प्रदूषित शहरों में पहला और दूसरा स्थान मिलने के बाद भी प्रदूषण की रोकथाम की दिशा में कोई सकारात्मक पहल अभी तक नहीं की गयी है. माइनिंग के लिए जितने पेड़ काटे जा रहे हैं उसके अनुपात में पेड़ लगाये नहीं जाते.
बरसात के दिनों में पौधरोपण अभियान चलाया तो जाता है लेकिन यह अभियान भी फोटो खिंचाने तक ही सीमित रह जाता है. सरकारी बाबुओं की तस्वीर अखबारों में आ जाने के बाद उन पौधों को देखने वाला कोई नहीं रहता. मनमाने तरीके से कोयला की ट्रासपोर्टिंग आज भी जारी है. मनमाने ढंग से हो रही कोयला की ट्रांसपोर्टिंग रोकने के लिए भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है.




