Opinion

नाटकीय घोषणा में छिपे हैं लॉकडाउन की विफलता के बीज

Dr. Vishnu Rajgadia

भारत में कोरोना संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है. 24 मार्च की रात से प्रारंभ लॉकडाउन की अवधि 14 अप्रैल तक है. लेकिन लॉकडाउन पूरी तरह सफल न हुआ, तो इसकी अवधि बढ़ाने की नौबत आ सकती है.

इसी सप्ताह सिंगापुर ने लॉकडाउन की घोषणा की है. इस छोटे से शहर ने इसके लिए चार दिन का समय दिया, ताकि नागरिक अपनी हर जरूरी तैयारी कर लें. मात्र 58 लाख की आबादी वाले सिंगापुर ने तीन अप्रैल को कहा- “सात अप्रैल से लॉकडाउन होगा.”

जबकि भारत जैसे 134 करोड़ लोगों के देश में मात्र चार घंटे की नोटिस पर लॉकडाउन कर दिया गया. इतनी देर में तो कोई चाट-पकौड़े खाने घर से निकला परिवार वापस नहीं लौटकर आता. यह तो पूरे देश के करोड़ों लोगों की मामला था. जो सुदूर अन्य राज्यों में विभिन्न कारणों से जाते हैं.

मोदी जी द्वारा नाटकीय तरीके से मात्र चार घंटे में लॉकडाउन करना सबसे बड़ी भूल साबित होने वाला है. इसके कारण लाखों प्रवासी मजदूर, स्टूडेंट्स, नागरिक जहां-तहां फंस गये. ऐसे लोग किसी तरह भीड़ में धंसकर घर लौटने की कोशिश करते रहे.

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लॉकडाउन का फैसला 23 मार्च को हो गया था. इसकी नाटकीय घोषणा 24 मार्च की रात आठ बजे की गयी. जबकि 23 मार्च को ही घोषणा कर देने से दो दिन का भी समय मिल गया होता, तो काफी लोग अपने घर वापस लौट आये होते. जो लोग इन दो दिनों में अनजाने में परदेस गये, वे भी नहीं गये होते. इससे संकट काफी कम होता.

लॉकडाउन का मतलब है- ‘घर’ में रहो. लेकिन अचानक लॉकडाउन से लाखों लोग ‘घर’ नहीं पहुंच सके,  तो घर में रहते कैसे?  यानी लॉक डाउन की नाटकीय घोषणा में ही इसकी विफलता के बीज छिपे थे.

नतीजा खुद देख लें. लॉक डाउन की घोषणा होते ही दूसरों शहरों में किसी काम से गये लोग, प्रवासी मजदूर, स्टूडेंट्स वगैरह अपने ‘घर’  वापस आने को दौड़े. लेकिन उसी नाटकीयता और उसी क्रूरता के साथ तमाम बसों, ट्रेनों और विमान सेवाओं को बंद कर दिया गया. इसके कारण लाखों लोग सड़कों, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड पर भीड़ में बदल गये.

ऐसे लोग पैदल या निजी वाहनों से अपने घर की ओर लौटने लगे. उन्हें राज्य की सीमाओं में पकड़कर पशुओं को रखने वाले कांजी हाउस नुमा कैम्पों में ठूंस दिया. अकेले झारखंड राज्य की सीमाओं में बने ऐसे पशुबाड़े जैसे कैंप में लगभग 15 हजार इंसान ‘कैद’  हैं. इन लाखों लोगों को अलग अलग राज्यों की सरकारों ने जिस तरह के कथित कोरांटीन कैम्पों में रखा है, वहां भी कोरोना संक्रमण का खतरा है.

ऐसे प्रवासी लोगों को पकड़कर रखने या जहां भी हों, वहां मदद पहुंचाने में राज्य सरकारों को जुटना पड़ा. इनके रहने, खाने व अन्य व्यवस्था में काफी परेशान होना पड़ा. कई राज्यों को इसमें काफी मशक्कत करनी पड़ी. अगर मोदी जी को नाटकीय घोषणा का शौक न होता, और लोगों को घर लौटने का मौका मिला होता, तो राज्य अपनी ऊर्जा और संसाधनों का बेहतर उपयोग सोशल डिस्टेंसिंग सुनिश्चित करने में लगा पाते.

इस तरह लॉकडाउन के बावजूद सोशल डिस्टेंसिंग का अनुपालन नहीं हुआ. मात्र चार घंटे की नोटिस पर लॉकडाउन के कारण लोगों को तैयारी का मौका नहीं मिला.

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ऐसे लोग 24 मार्च की रात और 25 मार्च तथा इसके बाद भी राशन दुकानों, सब्जी मंडियों में भारी भीड़ का हिस्सा बनते रहे. इसके कारण सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं हुआ.

भारत सरकार ने लॉकडाउन के लिए पहले कोई तैयारी नहीं की. इसे लागू करने का जिम्मा राज्य सरकारों पर था. लेकिन मोदी जी ने नाटकीय घोषणा से पहले राज्यों को विश्वास में लेने की जरूरत तक नहीं समझी. बात तक नहीं की.

खुद भारत सरकार के आपदा प्रबंध सिस्टम को संभलने का मौका नहीं मिला. लॉकडाउन शुरू होने के लगभग एक सप्ताह बाद संबंधित मंत्रियों और अधिकारियों की टीम का गठन हुआ.

रही-सही कसर थाली बजाने, घंटी बजाने, दीप जलाने, पटाखे फोड़ने जैसे उत्सवी कार्यक्रमों ने पूरी कर दी. इनके कारण बड़ी संख्या में लोग एक जगह जुटे और सोशल डिस्टेंसिंग की हवा निकाल दी.

भारत में कोरोना संक्रमण के संदिग्ध लोगों की टेस्टिंग बेहद कम है. इलाज की भी सुविधा बहुत कम है. डॉक्टरों के पास आवश्यक सुरक्षा उपकरणों की भी भारी कमी है.

ऐसे में संभव है कि जल्द ही कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामले बड़ी चिंता का विषय बन जाएं. इस स्थिति में लॉकडाउन की अवधि बढ़ानी पड़ सकती है.

कल्पना करें, उन लाखों लोगों का क्या होगा, जो अभी कैम्पों में रखे गये हैं. ये ऐसे लोग हैं, जो अचानक लॉकडाउन होने पर किसी तरह अपने गांव की ओर लौटने लगे थे. काफी लोग तो पैदल ही. कोई ट्रकों में छुपकर चल पड़ा, तो कोई अपना रिक्शा लेकर ही आने लगा.

ऐसे लोगों को विभिन्न राज्यों की सीमाओं पर रोक लिया गया. उन्हें किसी स्कूल या सामुदायिक भवन में बने तथाकथित कोरांटीन सेंटर में रख दिया गया. इनकी स्थिति की कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं.

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ऐसे कैम्पों में सोशल डिस्टेंसिंग का अनुपालन कितना हो रहा होगा, कहना मुश्किल है. अगर यह न हुआ तो कोरोना का संक्रमण बढ़ने का खतरा होगा. ऐसे में लॉकडाउन की अवधि बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है. इसे बढ़ाया न गया, तब भी इसके लाभ को लेकर संदेह बना हुआ ही रहेगा.

लेकिन भारतीय मध्यवर्ग का बड़ा तबका इन खतरों से अनजान है. वह ताली पीटने और मोमबत्ती जलाने में उत्सवी रोमांच महसूस कर रहा है. उसे इसकी रत्तीभर परवाह नहीं कि लाखों प्रवासी मजदूरों, स्टूडेंट्स की दुर्गति पर विचार करे. इसके लिए केंद्र सरकार की अदूरदर्शिता पर सवाल करने के बजाय मजदूरों को ही हिकारत से देखने वालों की कमी नहीं.

इस क्रम में प्रवासी मजदूरों, स्टूडेंट्स को भारी कीमत चुकानी पड़ी है. लेकिन लॉकडाउन विफल हुआ  या इसकी अवधि बढ़ानी पड़ी, तो सबसे ज्यादा नुकसान खुद मध्यवर्ग को होगा. मजदूरों का क्या, उनकी तो आदत पड़ गई है अच्छे दिनों को झेलने की.

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