
Ranchi: ये कोरोना काल कितना भयावह है, इसकी बानगी है रांची के सेक्टर टू में सिन्हा परिवार के साथ बीता चार दिन. पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
धुर्वा सेक्टर टू-सीडी 760 में बैठा तस्वीर में दिखने वाला बुजुर्ग अपनी 80 साल की पत्नी के शव के बगल में बैठा है. इनकी 85 साल की बूढ़ी आंखें, दो दिनों से बस यूं ही खिड़की के बाहर टकटकी लगाए हुए है. बेटा अमेरिका में रहता है और करीब 10 साल से घर नहीं आया है. बेटी पास के शहर बोकारो में रहती है, लेकिन पड़ोसियों को यह नहीं पता है कि वो अपनी मां की मौत के बाद भी क्यों नहीं आयी. घर में कुछ रिश्तेदार दिखे. उनमें से एक ने अपने आप को बुजुर्ग की भतीजी बताया.
बुजुर्ग की हालत ऐसी थी कि इनके घर के पास कोई भी रुकता या ठहरता है तो उन्हें लगता है कि उनकी मरी हुई पत्नी का कोविड टेस्ट का रिपोर्ट आ गया. अब वो और उनके रिश्तेदार मिलकर उसका अंतिम संस्कार कर सकेंगे. लेकिन गुरुवार को एक बजे तक कोई भी कोविड टेस्ट की रिपोर्ट लेकर इनके पास नहीं आया था.
इनकी बेचैनी इस बात से समझी जा सकती कि जब न्यूज विंग की टीम वहां पहुंची तो उन्होंने इशारे से हमें अपने फ्लैट, जो फर्स्ट फ्लोर पर है, वहां बुलाया. लेकिन ऐतिहात के तौर पर हम वहां नहीं गये. इनकी हालत शायद आज ऐसी नहीं रहती, अगर रांची के सेंटेवीटा अस्पताल ने इन्हें सोमवार को भर्ती कर लिया होता.
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सेंटेवीटा अस्पताल ने नहीं किया भर्ती
सोमवर की सुबह 80 साल की निलिमा सिन्हा की तबियत बिगड़ने के बाद इन्हें एम्बुलेंस से इनके पति एमपी सिन्हा सेंटेवीटा अस्पताल ले गये. उन्हें सांस लेने में काफी परेशानी हो रही थी. अस्पताल ने 80 वर्षीय निलिमा सिन्हा का कोविड एंटी बॉडी टेस्ट किया. जिसमें वो पॉजिटिव आयीं. इसका मतलब यह कि इनमें कोरोना संक्रमण के दौरान एक मरीज में पाया जाने वाला लक्ष्ण था. लेकिन अस्पताल ने इन्हें भर्ती नहीं किया.
सेंटेवीटा के डॉक्टरों ने कहा कि पहले इनका कोविड-19 का टेस्ट कराएं तभी यहां भर्ती किया जा सकता है. जबकि मेडिकल गाइडलाइन की बात करें तो अगर किसी मरीज में कोविड के लक्ष्ण पाए जाते हैं, तो उन्हें तत्काल भर्ती करना है. उन्हें वापस नहीं भेजा जा सकता है. लेकिन सेंटेवीटा अस्पातल ने ऐसा नहीं किया. लिहाजा निराश एमपी सिन्हा ने अपनी पत्नी को उसी बीमार हालत में घर वापस लाना मुनासिब समझा.
प्रशासन और विभाग के मदद की आस में निकल गयी जान
एमपी सिन्हा के पड़ोसी आशुतोष ने इस बात की चर्चा अपने दोस्त प्रकाश राठोडिया से की. प्रकाश ने सोमवार को ही बुजुर्गों के लिए रांची प्रशासन की तरफ से चलाए जा रहे दादा-दादी हेल्पलाइन पर फोन किया. एक नहीं करीब 10 बार किया. इतनी बार कॉल करने के बाद सिर्फ कम्प्लेन रजिस्टर्ड हुआ.
प्रशासन की तरफ से ना ही कोई एम्बुलेंस आया और ना ही कोई इनकी हालत देखने वाला. मंगलवार की सुबह इनके रिस्तेदारों ने मिलकर प्राइवेट से कोविड-19 टेस्ट कराया. उसी दौरान प्रशासन या विभाग से कोई मदद मिल जाए, ये बात सोच कर प्रकाश लगातार दादा-दादी हेल्पलाइन और स्वास्थ्य विभाग के हेल्पलाइन पर कॉल करता रहा. दादा-दादी हेल्पलाइन और स्वास्थ्य विभाग की तरफ से एक एम्बुलेंस भेजने का आश्वासन मिलता रहा.
प्रकाश इतनी बार हेल्पलाइन पर फोन कर चुका था कि उसे हेल्पलाइन कॉल रिसीव करने वाले कहने लगे कि हमारे पास यही एक केस नहीं है. जबकि मदद एक बार भी नहीं की. आखिरकार मदद की आस में बुधवार को निलिमा सिन्हा ने सुबह करीब चार बजे दम तोड़ दिया. दिन निकलने के बाद फिर से मदद के लिए हेल्पलाइनों पर प्रकाश ने फोन किया. कोई नहीं आया.
रांची से डीसी और एसडीएम से भी संपर्क किया गया. लेकिन वो इस पूरी घटना से अंजान थे. घर में दो दिनों से बर्फ पर निलिमा सिन्हा का शव पड़ा हुआ है. एमपी सिन्हा की आंखे खिड़की की सलाखों के बीच से कोविड रिपोर्ट लाने वाले को लगातार निहार रहे हैं.
सेंटेवीटा के मैनेजर ने नहीं उठाया फोन
इस पूरे मामले पर सेंटेवीटा के मैनेजर हरीश से फोन पर बात करने की कोशिश की गयी. चार बार फोन करने पर भी उन्होंने रिसीव नहीं किया. आखिरकार उनके व्हाट्एसएप नंबर पर तीन सवाल किये. जिनके जवाब नहीं मिले हैं:-
सवाल-1- क्या आपके यहां कोविड एंटी बॉडी टेस्ट होता है?
सवाल-2- क्या निलिमा सिन्हा ने सेंटेवीटा में टेस्ट कराया था? क्या उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आयी थी.
सवाल-3- अगर रिपोर्ट पोजिटिव आयी थी, तो फिर उन्हें एडमिट क्यों नहीं किया गया?
समाचार के प्रकाशन तक सेंटेवीटा अस्पताल प्रबंधन का जवाब प्राप्त नहीं हुआ है. उनका जवाब प्राप्त होते हीं, खबर में अपडेट कर दिया जायेगा.
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