
Akshay Kumar Jha
Ranchi: हरियाणा और महाराष्ट्र में वोटों की गिनती के बाद बीजेपी में राजनीतिक उठा-पटक देखने को मिला. लेकिन झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले ही बीजेपी की चुनावी रणनीति फेल होती नजर आ रही है. बीजेपी के शीर्ष अधिकारियों ने पार्टी के कई शुभचिंतकों की बात को तरजीह ना देते हुए, खुद फैसला लिया. नतीजा सांप तो बचा ही और लाठी भी टूट गयी.
जिस तरह से बीजेपी और आजसू के गठबंधन के हालात हैं, उससे साफ तौर से कहा जा सकता है कि पार्टी ना ही गठबंधन बचा सकी और ना ही बागी उम्मीदवारों को रोकने में कामयाब हो सकी. कहीं ना कहीं बीजेपी के बागी नेता ही पार्टी के लिए आगे चलकर चुनौती बनने वाले हैं. आजसू के मुखिया सुदेश महतो साफ तौर से गठबंधन नहीं बनने का ठीकरा बीजेपी पर फोड़ चुके हैं.
लगातार दो दिन मीडिया के सामने आकर उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया है कि आजसू के प्रस्ताव को बीजेपी ने दरकिनार किया, इसलिए उन्होंने भी अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी. सुदेश ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि “यह कैसा गठबंधन है जिसमें सीट शेयरिंग पर बात बनी नहीं और पार्टी लिस्ट जारी कर देती है ”.
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नहीं बची पार्टी, बीजेपी के विधायकों ने थामा दूसरी पार्टी का हाथ
लोकसभा चुनाव में बीजेपी पार्टी ने चार सीटिंग सांसदों का टिकट काटा था. उस वक्त पार्टी की रणनीति ऐसी थी कि गिरिडीह के सांसद रवींद्र पांडे और कोडरमा के सांसद रविंद्र राय ने पार्टी के अंदर विरोध तो किया, लेकिन कुछ कर नहीं पाए. आज भी वो दोनों पार्टी के अंदर हैं. खूंटी के सांसद कड़िया मुंडा ने उनके टिकट कटने पर ऐतराज नहीं जताया. रांची के सांसद रामटहल चौधरी ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और बुरी तरह हारे.
इस घटना के बाद कहा जाने लगा कि पार्टी की मजबूती की वजह से पार्टी बच पायी. एक को छोड़ कोई बागी नहीं हुआ. लेकिन विधानसभा चुनाव में ऐसा नहीं हो रहा है. दस सीटिंग विधायकों का टिकट कटा. जिनमें से दसों का रुख बागी दिख रहा है. वहीं पार्टी को छोड़कर भी नेता दूसरी पार्टी का हाथ थाम रहे हैं. छतरपुर के बीजेपी विधायक राधाकृष्ण किशोर का पार्टी से टिकट कटने के बाद उन्होंने आजसू से नामांकन कर दिया है.
बीजेपी के गाल पर ये जोरदार राजनीतिक तमाचा है. क्योंकि उस पार्टी से श्री किशोर को टिकट मिला, जिससे बीजेपी गठबंधन करने की बात कर रही थी. बीजेपी के पूर्व मंत्री बैद्यनाथ राम ने जेएमएम का हाथ थाम लिया. बरही के उमाशंकर अकेला कांग्रेस चले गए.
ताला मरांडी, फूलचंद मंडल, गणेश गंझू और अनंत प्रताप देव निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. ऐसे में साफ है कि बीजेपी की विधानसभा चुनाव के पहले चरण के नामांकन से पहले चुनावी रणनीति पूरी तरह फेल रही.
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अब-तक गठबंधन की रणनीति भी फेल
बीजेपी, आजसू औऱ लोजपा यानी जिस एनडीए के गठबंधन की बात पार्टी कर रही थी वो भी फेल रहा. लोजपा ने राज्य में अपने करीब 50 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. लाख कोशिशों के बाद भी बीजेपी सुदेश महतो को मैनेज नहीं कर पायी. आजसू जहां एनडीए की मुख्य पार्टी मानी जा रही थी, उसी ने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ को खिलाफ चक्रधरपुर में उम्मीदवार उतार दिया.
बीजेपी के खास मंत्री अमर बाउरी के सामने चंदनकियारी में आजसू की तरफ से उमाकांत रजक का उतरना तय माना जा रहा है. सुदेश महतो गठबंधन ना होने का ठीकरा सीधे तौर पर बीजेपी पर फोड़ रहे हैं. जाहिर तौर पर आजसू से बीजेपी काफी बड़ी पार्टी है. ऐसे में बीजेपी की जिम्मेदारी थी कि वो आजसू जैसी क्षेत्रीय पार्टी को मैनेज करे. आजसू को बीजेपी के लिए आफत बनता देख अब डैमेज कंट्रोल के लिए बीजेपी के चुनाव प्रभारी ओम माथुर को रांची में कैंप करना पड़ा.
बीजेपी की रणनीति इसी बात से जाहिर होती है कि पहले चरण के 13 सीटों पर पार्टी ने 12 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए. जिनमें से तीन ही बीजेपी के हार्डकोर कार्यकर्ता हैं. बाकी नौ आयातित हैं. विश्रामपुर-रामचंद्र चंद्रवंशी राजद से आए थे. गढ़वा- सत्येंद्र नाथ तिवारी झाविमो से आए थे. छतरपुर- पुष्पा देवी झाविमो से आई हैं. भवनाथपुर- भानु प्रताप शाही ने अपने दल का बीजेपी में विलय किया.
पांकी- शशि भूषण मेहता झामुमो से आए हैं. डालटेनगंज- आलोक चौरसिया झाविमो से आए हैं. लातेहार- प्रकाश राम झाविमो से आए हैं. लोहरदगा- सुखदेव भगत कांग्रेस से आए हैं. चतरा- जनार्दन पासवान राजद से आए हैं. बाकी तीन मनिका, विशनपुर और गुमला के उम्मीदवार पार्टी के हार्डकोर कार्यकर्ता हैं.
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