
Faisal Anurag
तीन वर्चुअल रैली से चुनावी माहौल बनाने के बाद अमित शाह अचानक दिल्ली में कोविड-19 के हालात को लेकर सक्रिय हो गए हैं. पूरे चार महीने की खोमोशी के बाद दिल्ली के हालात को लेकर उनकी चिंता के भी कई राजनीतिक संदेश हैं. इसके पहले गृह मंत्रालय बंगाल में केंद्रीय टीम भेजकर राजनीतिक विवाद को जन्म दे चुका है. दिल्ली की हालत कमोबेश अहमदाबाद जैसी है, बावजूद गुजरात की सरकार के लिए केंद्र ने किसी तरह का संदेश नहीं दिया है. जहां-जहां विपक्ष की सरकार है, वहीं अमित शाह सक्रिय हैं.
पंजाब के मुख्यमंत्री ने भी केंद्र को लेकर सख्त टिप्पणी की है. इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि दिल्ली विस्फोटक मुहाने पर है, जांच किये जा रहे हर तीसरे व्यक्ति की रिपोर्ट पॉजिटिव आ रही है. महाराष्ट्र,दिल्ली,गुजरात,तमिलनाडु और बंगाल इस समय सबसे बुरे प्रभाव में है.
इन राज्यों की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं. खासकर दिल्ली और गुजरात को लेकर. तमिलनाडु उन राज्यों में है, जिसकी स्वास्थ्य संरचना अच्छी है. बावजूद इसके खबर है कि वह भी इस समय बेबसी के दौर से गुजर रहा है.
राजनीतिक राजधानी दिल्ली और औद्योगिक राजधानी मु्ंबई को लेकर मीडिया बता रहा है कि उनका संकट हर दिन गहरा रहा है. देश के कई नये इलाके भी कोरोना वायरस के प्रभाव में आ रहे हैं. ग्रामीण इलाकों में तो अभी जांच की प्रक्रिया एकतरह से शुरू भी नहीं हुई है, लेकिन खबर अच्छी नहीं आ रही है. सरकार हर दिन पॉजिटिव खबरों पर जोर दे रही है और इससे प्रभाव को कम कर दिखाने का प्रयास किया जा रहा है. लेकिन इसकी हकीकत तो आईसीएमआर के ही एक ताजा शोध से सामने आ गया है.
इस रिपोर्ट के अनुसार, आठ हफ्तों की देशबंदी यानी लॉकडाउन ने कोविड-19 के प्रसार की गति को थोड़ा धीमा जरूर किया है, लेकिन इसके बावजूद नवंबर में भारत में इस महामारी का चरम देखने को मिल सकता है. इसका मतलब साफ है कि यह शोध बीच का रास्ता अपना रहा है और वैश्विक संस्थानों में भारत संबंधी अनुमान के ताप को कम करने का प्रयास करता है.
दिल्ली और अहमदाबाद के संदर्भ में उच्चतम न्यायलय और गुजरात हाईकोर्ट की टिप्पणियों ने स्वास्थ्य संरचना की हकीकत को उजागर कर दिया है. देश के लगभग सभी हिस्सों की हालत ऐसी ही है. विशेषज्ञ तो लगातार फोकस कर रहे हैं कि लॉकडाउन पीरियड में जिस तरह के इंतजाम का समय मिला था, उसका उपयोग नहीं किया गया. दुबई जैसे शहर में वहां की सरकार ने अपने हॉस्पिटल की सुविधाओं का विस्तार किया है.
अस्थायी तौर पर तैयार हॉस्पिटल भी तमाम आधुनिक सुविधाओं से इसी दौर में तैयार किये गये. वहां भी मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा है. लेकिन बेड या डॉक्टर की कमी महसूस नहीं की जा रही है.
दुबई ने तो भारत से इसी दौरान बड़ी संख्या में नर्स बुलाकर अपनी सेवा को कारगर बनाया है. भारत के फ्रंटलाइन डॉक्टरों और अन्य कर्मियों को सरकारें वेतन भी नहीं दे पा रही हैं. पीपीई किट को लेकर सवाल उठाने वाले दर्जन भर डॉक्टरों को दंडित किया जा चुका है.
इन हालातों में अमित शाह और केजरीवाल की मुलाकात अपने आप में टिप्पणी है. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की गंभीर चिंता के बाद ही केंद्र सरकार नींद से उठी दिखी है. भाजपा शासित राज्यों की हालत भी लगातार चिंताजनक हो रही है. मध्यप्रदेश में तो कांग्रेस के तीन विधायकों ने धरना देकर स्वास्थ्य सेवा को लेकर सरकार की पोल को खोला है. हुआ यह कि उन विधायकों को मनाने वाले पुलिस अधिकारियों का तबादला कर दिया गया, लेकिन हालात ज्यों के त्यों बने हुए हैं.
दिल्ली में तो साफ दिखने लगा है कि केंद्र और दिल्ली सरकार ब्लेम गेम से अब भी बाहर नहीं निकल पा रही है. महामारी से निपटने के इस तरीके को लेकर लगातार अफसोस भी व्यक्त किया जा रहा है. बावजूद इसके सरकारों का इगो कम होने के बजाय प्रकांतर से किये जा रहे हमलों में दिख रहा है.
दिल्ली में जांच की गति तेज तीगुना बढडाने पर रजामंदी हो गयी है. लेकिन देश के अन्य इलाकों में अभी कोरोना वायरस जांच का मामला कछुआ गति से चल रहा है. इससे सही तथ्यों तक पहुंचा नहीं जा सकता है. नरेंद्र मोदी के मित्र डोनाल्ड ट्रंप तक को कहना पड़ा है कि यदि भारत में सही जांच हो तो वहां अमेरिका से ज्यादा मामले सामने आएंगे.
हालांकि ट्रंप के बयान में भी एक राजनीति है, वह है नवंबर में होने वाला अमेरिकी चुनाव. बावजूद इसके दुनिया में भारत की जांच गति को लेकर दूसरी एजेंसियां चिंता प्रकट कर चुकी हैं.
सवाल उठता है कि ब्लेम गेम से बाहर निकले बगैर क्या महामारी से निपटा जा सकता है. कोरोना संकट के प्रभाव को भारत में सही नजरिए से विश्लेषित नहीं किया जा रहा है. सूचनाओं को इतना जटिल बना दिया गया है कि सरकारों का ब्लेम गेम भी उसमें ओझल हो जा रहा है. इसके आर्थिक प्रभावों की चर्चा भी नहीं हो रही है.
केंद्र सरकार ने डॉ. पाल की अध्यक्षता में कमेटी बनाया है. यह कमेटी कोरोना जांच की दर पर अपनी रिपोर्ट देगी. हालांकि यह बहुत देर से उठाया गया कदम है. लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है, जो जांच तो कराना चाहते हैं लेकिन जिनके पास खर्च करने के लिए संसाधन नहीं है. तो क्या निजी अस्पतालों में भी की सुविधा उपलब्ध करायी जा सकेगी. देखना है पाल कमेटी की सिफारिश क्या रिपोर्ट देती है. लेकिन अमित शाह और केजरीवाल की मीटिंग के बाद भी माहौल में विश्वास नहीं दिख रहा है.




