
Delhi/Ranchi: बकोरिया कांड में झारखंड सरकार को सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ा झटका लगा है. बकोरिया मुठभेड़ कांड की सीबीआई जांच रोकने के लिए झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पीटिशन (एसएलपी) दायर की थी. जिसे सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई के दौरान खारिज कर दिया. राज्य सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट की स्टैंडिंग काउंसिल तापेश कुमार सिंह ने एसएलपी दायर की थी. 22 अक्तूबर को झारखंड हाईकोर्ट ने बकोरिया मुठभेड़ कांड की सीबीआई जांच के आदेश दिये थे.
हाईकोर्ट ने सीआईडी अनुसंधान के कई बिंदुओं पर संदेह जताया था. इसके बाद 19 नवंबर को सीबीआई दिल्ली की स्पेशल सेल ने एफआईआर दर्ज की थी. आठ जून 2015 को बकोरिया के तथाकथित मुठभेड़ में माओवादी कमांडर डॉ अनुराग, पारा टीचर उदय यादव, एजाज अहमद, योगेश यादव समेत 12 लोग मारे गए थे. उदय यादव के पिता जवाहर यादव ने मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए हाईकोर्ट में मामला दायर किया था. मामले को लेकर झारखंड ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी याचिका दाखिल कर कहा कि झारखंड पुलिस ने 12 नक्सलियों को मार गिराया था. इसी वजह से पुलिस को सताने की कोशिश हो रही है. लेकिन कोर्ट ने सरकार की इस बात को खारिज कर दिया और सीबीआई जांच को सही मानते हुए सरकार की याचिका खारिज कर दी.
क्या है बकोरिया कांड
पलामू के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया गांव में आठ जून 2015 की रात एक नक्सली और 11 निर्दोष लोगों को कथित पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया था. इस कांड की जांच सीआईडी पहले ही कर चुकी है, जिसमें इसने झारखंड पुलिस की कार्रवाई को क्लीन चिट दे दी. इसके बाद 22 अक्टूबर 2018 को झारखंड हाई कोर्ट ने इस फर्जी मुठभेड़ की सीबीआई जांच का आदेश दिया था, जिसके बाद सीबीआई ने 19 नवंबर को मामले में प्राथमिकी दर्ज की, जिसकी संख्या RC.4(S)/2018/SC-1/CBI/NEW DELHI है.
प्राथमिकी आईपीसी की धारा 147, 148, 149, 353, 307, आर्म्स एक्ट की धारा 25(1-B)A/26/27/35 और एक्सप्लोसिव सब्सटांस एक्ट की धारा 4/5 के तहत दर्ज की गयी है. इस कांड की जांच सीबीआई की स्पेशल क्राइम ब्रांच नयी दिल्ली की तरफ से की जा रही है. टीम के रांची आने का मकसद सीआईडी से संबंधित सारे कागजात एकत्रित कर अनुसंधान को आगे बढ़ाना है.
पुलिस नहीं चाहती थी जांच
बकोरिया कांड की जांच में कई बार अनुसंधान को प्रभावित करने की घटना हुई. पूरे प्रकरण में पुलिस महानिदेशक डीके पांडेय की भूमिका भी पारदर्शी नहीं रही. राज्य सरकार के कई आला अधिकारियों को भी जांच को बाधित करने के लिए जिम्मेदार माना जा रहा था. सीआईडी को काफी दिनों तक जांच शुरू करने के लिए इंतजार करना पड़ा. पहले भी ढाई साल तक जांच में सीआईडी की टीम ज्यादा सक्रिय नहीं रही. सीआईडी के तत्कालीन एडीजी एमवी राव के पदभार ग्रहण करने के बाद जांच में तेजी आयी थी. इस प्रकरण में बाद में श्री राव का भी तबादला हो गया.




