
NewDelhi: देश के सबसे विवादित और संवेदनशील मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुना रही है.
राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील अयोध्या विवाद पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई, जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की 5 सदस्यीय बेंच ने फैसला सुनाया.
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- शिया और सुन्नी मामले में एक मत फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट शिया वक्फ बोर्ड का दावा खारिज किया. और 1946 के फैसले को बरकारार रखा है. अयोध्या पर भी फैसला एक मत का है. यानी पांचों जजों की राय एक ही है.
- फैसला सुनाते हुए सीजेआइ ने कहा कि मस्जिद 1528 में बनी थी, जिससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. 22-23 दिसंबर 1949 में वहां दो मूर्तियां रखी गयीं.
- निर्मोही अखाड़े के दावे को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया. निर्मोही अखाड़े को सेवायत का अधिकार नहीं होगा. कोर्ट ने कहा कि अखाड़े का दावा लिमिटेशन से बाहर है.
- रामलला पक्षकार को कोर्ट ने मुख्य पक्षकार माना है.
- बाबरी मस्जिद खाली जगह पर नहीं बनायी गयी थी.
- मस्जिद के नीचे विशाल रचना थी.
- खुदाई में मिली कलाकृतियां भी इस्लामिक नहीं थी.
- हिन्दू अयोध्या को राम का जन्मस्थान मानते हैं.
- अयोध्या में राम जन्म के दावे का किसी ने विरोध नहीं किया है.
- विवादित जगह पर हिन्दू पूजा करते रहे थे.
- गवाहों के क्रॉस एग्जामिनेशन से हिंदू दावा गलत साबित नहीं होता.
- रामलला ने ऐतिहासिक ग्रंथों के विवरण रखें.
- ASI के खुदाई को अनदेखा नहीं कर सकते हैं.
- चबूतरा, सीता रसोई, भंडारा के भी दावे की पुष्टि होती है.
- हिंदू परिक्रमा भी किया करते थे.
- टाइटल सिर्फ आस्था से साबित नहीं होता है.
- सुन्नी ने जगह को मस्जिद घोषित करने की मांग की है.
- हिंदू मुख्य गुंबद को ही राम का सही जन्मस्थान मानते हैं.
- ढांचे के नीचे पुरानी रचना से हिंदू दावा नहीं माना जा सकता है.
- 1856-57 तक नमाज पढ़ने के सबूत नहीं.
- अंदरूनी हिस्सों में मुस्लिमों के नमाज बंद होने के सबूत नहीं मिले है.
- नमाज पढ़ने की जगह मस्जिद होती है.
- शिया बोर्ड ने जमीन अपनी होने का दावा किया था, जिसे कोर्ट ने खारिज किया.
- शिया बोर्ड जमीन हिंदूओं को देना चाहता था, जिसे भी कोर्ट ने खारिज किया है.
- अंग्रेजों ने दोनों हिस्से अलग रखने के लिए रेलिंग बनायी थी.
- 1856 से पहले अंदरूनी हिस्से में हिंदू भी पूजा करते थे.
- रोकने पर बाहर चबूतरे पर पूजा करने लगे.
- हिंदू फिर भी मुख्य गुंबद के नीचे गर्भ गृह मानते थे.
- पुरातात्विक सबूत और यात्रियों के वृतांत हिंदूओं के हक में है.
- 1934 के बाद मुसलमानों का कब्जा नहीं रहा.
- सुप्रीम कोर्ट ने दो ही पक्ष के दावे को माना है. सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलाल विराजमान.
- हर मजहब को संविधान ने बराबर का अधिकार दिया है.
- हाईकोर्ट के तीन हिस्से का फैसला तार्किक नहीं था.
- बाहर हिंदूओं की पूजा सदियों तक चलती रही.
- सुन्नी वक्फ बोर्ड को वैकल्पिक जमीन देना जरूरी है.
- केंद्र सरकार तीन महीने में स्कीम बनाये.
- विवादित जमीन रामलला की.
- मुस्लिम पक्षकार को दूसरी जगह पांच एकड़ जमीन दी जाये.
- केंद्र और राज्य सरकार अयोध्या में ही कहीं पांच एकड़ जमीन मस्जिद बनाने के लिए दी जायेगी.
गौरतलब है कि फैसले से पहले मुख्य न्यायाधीश ने शुक्रवार को यूपी के मुख्य सचिव और डीजीपी के साथ एक बैठक कर राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति का जायजा लिया था. फैसले को लेकर यूपी समेत पूरे देश में सुरक्षा सख्त की गयी है.
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में अयोध्या विवाद पर दूसरी सबसे लंबी सुनवाई हुई है. लगातार 40 दिनों तक संवैधानिक बेंच बैठी और मैराथन सुनवाई की गयी. सालों पुराने इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्तूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था. इतिहास में सबसे लंबी सुनवाई केशवानंद भारती से सबंधित वाद में सुप्रीम कोर्ट में चली थी. तब 68 दिन सुनवाई चली थी.
2.77 एकड़ जमीन पर विवाद
अयोध्या में विवादित जमीन कुल 2.77 एकड़ की है. वहीं इसके पास ही 67 एकड़ जमीन सरकार के पास की है. जबकि विवादित जमीन के पास ही सुन्नी वक्फ बोर्ड की भी जमीन है. राम जन्मभूमि की जमीन कुल 42 एकड़ है. इसके आसपास कई मंदिर भी हैं. लेकिन पूरा विवाद छोटे भूमिखंड को लेकर ही था, जहां बाबरी मस्जिद का गंबुद और राम लला विराजमान हैं. इस भूमिखंड में बाबरी मस्जिद ढांचा, राम लला विराजमान, राम चबूतरा, सिंहद्वार और सीता रसोई है.
क्या था इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला
अयोध्या विवाद सदियों पुराना है. माना जाता है कि इसकी नींव लगभग 400 साल पहले ही पड़ गई थी. मामले को लेकर 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांट दिया गया था. इसमें से एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा निर्मोही अखाड़े को मिला.
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले पर रोक लगा दी थी. हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 अपील दाखिल हुई थीं.




