
Soumitra Roy
CMIE (सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) ने कहा है कि अप्रैल से जून की तिमाही में विभिन्न सेक्टर्स में पूंजी निवेश सिर्फ 0.56 लाख करोड़ रुपए ही हुआ है.
इसी साल जनवरी-मार्च की तिमाही में 3.37 लाख करोड़ और पिछली दिसंबर की तिमाही में 5.15 लाख करोड़ का पूंजी निवेश हुआ था.
इस सच के सामने आते ही सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि फिर मोदी सरकार के 21 लाख करोड़ वाले लोन मेले का क्या हुआ?
मेन स्ट्रीम मीडिया (टीवी व अखबार) किस आधार पर देश की आर्थिक हालात के बारे में बड़ी-बड़ी खबरें लोगों को दिखा-पढ़ा रहे हैं?
क्या पहले की तरह कंपनियों ने लोन नहीं लिया या फिर लोन लेकर पुराना कर्ज़ चुकाया और नया पूंजी निवेश नहीं किया? मोदी सरकार इसका जवाब देकर शर्मिंदा नहीं होगी.
असल में व्यापार जगत में घोर अनिश्चितता है. यह अनिश्चितता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 21 दिन में कोरोना से महाभारत लड़ने के बयान और गोदी मीडिया के जरिये जरूरत से ज्यादा सकारात्मकता फैलाने के कारण आयी है.
आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार लगातार गलतियां कर रही हैं. लोग भी पेट्रोल-डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों का राज़ जान गये हैं.
सरकार अठन्नी-चवन्नी गिन रही है, जबकि इकोनॉमी को वास्तविक पैकेज की सख्त जरूरत है. तेल के दाम बढ़ने से महंगाई चौतरफ़ा बढ़ी है.
आगे कोरोना किस करवट लेगा, किसी को नहीं मालूम. व्यापारी हाथ खींचकर चल रहा है.
बस, खरीफ की बुवाई और गांव स्तर पर मनरेगा के ज़ोर पकड़ने से कुछ आसरा बंधा हुआ है.
अगर कोरोना का असर अक्टूबर-नवंबर तक रहता है और बीच में एक और लॉकडाउन की नौबत नहीं आये, तो समझें दिसंबर से कुछ बेहतर हालात देखने को मिलेंगे.
डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.




