
Faisal Anurag
चुनाव एक सामान्य प्रक्रिया होने के बावजूद राज्यों के और निगमों के चुनाव के पहले जो माहौल बनाया जाता है वह सामान्य नहीं है. भारत में पिछले सत्तर सालों से चुनाव हो रहे हैं और सत्ता का भी हस्तांतरण सामान्य तरीके से ही होता है.
बावजूद 2014 के बाद भारत के चुनावों में जिस तरह की भाषा इस्तेमाल हो रही है और मुद्दों को उछाला जाता है वह भारत के साझेपन के लिए गंभीर चुनौती है. दिल्ली में गोली मारो नारा का जिस तरह इस्तेमाल हुआ वह अब बंगाल तक पहुंच गया है.
बंगाल विधानसभा चुनाव अगले साल होंगे. बिहार इस साल ही चुनाव मैदान में होगा. गोली मारो नारे के बिहार भी जल्दी ही पहुंचने की चर्चा हो रही है.
बंगाल में भारतीय जनता पार्टी हर हाल में जीत हासिल करने पर आमादा है. लोकसभा 2019 के चुनाव में भी बंगाल का चुनाव सांप्रदायिक आधार पर ही लड़ा गया था. तीन सालों से बंगाल में सांप्रदायिक ध्रुवीकारण की प्रक्रिया जारी है. गुहमंत्री अमित शाह ने कोलकाता दौरे में बंगाल में सरकार बनाने की बात कर यह स्पष्ट कर दिया कि उनका इरादा क्या है.
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उनकी कोलकाता रैली के दौरान ही देश के गद्दारें को गोली मारो, का नारा जिस उन्माद के साथ लगा, वह दिल्ली में अनुराग ठाकुर और कपिल मिश्र के नारे के तेवर को भी पींछे छोड़ गय. इस बात का ध्यान भी रखा जाना चाहिए कि दिल्ली में ही रविवार को कपिल मिश्र ने कथित शांति मार्च का आयोजन किया.
जिसमें यह नारा दुहराया गया और दिल्ली में मेट्रो में कुछ युवाओं ने भी इस नारे को लगाया जिन्हें पुलिस ने हिरासत में लिया. लेकिन कुछ ही घंटों में उन्हें छोड़ दिया. एक ऐसे माहौल में जब कि दिल्ली जल रही है और लोगों का विश्वास बुरी तरह प्रभावित हुआ है, ये हालात कहीं से भी मान्य नहीं हो सकते.
दिल्ली का चुनाव बुरी तरह हारने के बाद अमित शाह ने इस तरह के नारों को अपनी चुनावी हार के कारणों में माना था. लेकिन अभी चुनावी हार का दर्द कमा भी नहीं और एक बार फिर अमित शाह शाह की रैली का भी यह मुख्य नारा बन गया है. उस राज्य में, जो अपने विवेक और संस्कृति के कारण अलग पहचान रखता है और इसके लिए सजग भी रहता है.
कोलकाता से प्रकाशित द टेलिग्राफ ने मुख्य पृष्ठ पर द भष्मासुर टच शीर्षक से बैनर छापा है. और लिखा है- व्हेयरएवर सीएए गोज, इट व्हाट डज डिमोन डीड. इतनी सख्त टिप्प्णी जो हेडिंग है, को खारिज नहीं किया जा सकता है. बंगाल ने 1977 के बाद से कई हिंसक चुनाव देखे हैं.
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लेकिन वे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण थे जिसका कोई धार्मिक आधार नहीं था. ज्योति बसु के शासन काल में जब कि बाबरी विध्वंस के दौर में देश के अनेक हिस्सों में दंगे हुए थे, बंगाल ओर बिहार ही उसके अपवाद थे. बिहार में तब लालू प्रसाद यादव की सरकार थी. जिन्होंने लालकृष्ण आडवाणी को गिरफतार किया था और दंगा नहीं होने दिया था.
2002 के गुजरात के बाद आइएएस के इस्तीफा देने वाले हर्ष मंदर ने लिखा है: मैं सामाजिक हिंसा का अध्ययन पिछले कई सालों से कर रहा हैं. और यह बात पक्के तौर से कह सकता हैं कि दंगे होते नहीं, करवाये जाते हैं. मैंने बतौर आइएएस कई दंगे देखे हैं. अगर दंगा कुछ घंटों से ज्यादा चले तो मान लें कि वह प्रशासन की सहमति से चल रहा है.
दंगे करवाने के लिए तीन चीजें बहुत जरूरी है. नफरत पैदा करना, बिल्कुल वैसे जैसे किसी फैक्टरी में कोई वस्तु बनती हो. दूसरा, दंगों में हथियार, जिसका भी प्रयोजन होता है.
अगर बड़े दंगे करवाने हैं तो छुरी और सिलिंडर बांटे जाते हैं. और सिर्फ एक तनाव का वातावरण खड़ा करना हो तो ईंट-पत्थर. तीसरा है, पुलिस और प्रशासन का सहयोग जिनके बिना कुछ भी मुमकिन नहीं.
कुछ अन्य रिटयर अधिकारियों में भी इसी आशय की बात कही है. इसमें दिल्ली के पूर्व पुलिय आयुक्त अजयराज शर्मा भी शामिल हैं.
बंगाल ने गोली मारो के खिलाफ विरोध भी दिखाया है. अमित शाह जब कोलकाता पहुचे तो एयरपोर्ट से ले कर पूरे रास्त में उन्हें काले झंडे दिखाये गये. उनके खिलाफ नारे लगाये गये. लेकिन अमित शाह ने अपने संबोधन में इस नारे के बारे में कुछ नहीं कहा.
बंगाल की चर्चित अभिनेत्री सुभद्रा ने भाजपा से इसी आधार पर त्याग पत्र दे दिया है. बंगाल चुनावों के पहले भाजपा जहां अपने आधार को बढ़ाने में लगी है और बांग्ला फिल्म के चर्चित लोगों पर उसकी निगाह है. वैसी स्थिति में यह इस्तीफा झटके से कम नहीं है.
नेताजी सुभषचंद्र बोस के रिश्तेदार शरत बोस, जो भाजपा की आशा भी हैं, ने सीएए ओर सांप्रदायिक अभियान की आलोचना की है. उनकी आलोचना का खास मतलब यह है कि वे पहली अहम शख्सियत हैं, जो भाजपा में शामिल हुए थे.
अमित शाह से विपक्ष ने इस्तीफे की मांग की है. बजट सत्र का दूसरा पार्ट के पहले इस्तीफे की मांग उठी है. मंत्री अनुराग ठाकुर दिल्ली चुनावों में हेट स्पीच दे चुके हैं. बचाव के बजाय उनकी आक्रामकता बरकारार है. एक अन्य वरीय मंत्री रविशेकर प्रसाद हैं. उन्होंने अदालतो से कहा है कि वे सरकार के खिलाफ फैसले नहीं दें.
तो क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि मोदी सरकार का यह न्यू नार्मल है? रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने सरकार की इन प्राथमिकताओं को देश की आर्थिक संकट का मुख्य कारण बताया है. सरकार ने भारत के इतिहास में पहली बार तिमाही जीडीपी आंकड़ों को बदल दिया है.
वास्तविक विकास दर 4.7 के बावजूद बदले गये आंकडे इसे 5.6 दिखा रहे हैं. राजन ने इस ओर भी इशारा किया है. तिमाही आंकड़ों में सुधार का यह पहला मामला है. वार्षिक आंकड़ों को जरूर कुछ महीनों बाद सुधारा जाता है. पहले से भी विश्व की रेटिंग एजेंसियां भारत के विकास के आंकड़ों को संदेह से देखती रही हैं.
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