
Soumitra Roy
यह बेहद डरावना परिदृश्य है.
अमेरिकी फर्म फ्रेंक्लिन टेम्प्लटन ने 24 अप्रैल को भारत में अपने 6 म्यूच्यूअल फंड खातों को सील कर दिया.
इसका मतलब क्या हुआ ?
समझने के लिए म्यूच्यूअल फंड को समझें. कई निवेशकों की छोटी-बड़ी पूंजी से एक बड़ा फंड बनता है और उससे बांड, स्टॉक्स और सिक्योरिटीज खरीदे जाते हैं.
अमेरिकी कंपनी का फंड भारत में 3.4 बिलियन डॉलर का है. यानी 259 बिलियन रुपये. अब निवेशक इस फण्ड से अपना पैसा नहीं निकाल सकते. फ्रेंक्लिन के इस कदम से भारतीय म्यूच्यूअल फंड बाज़ार में भूचाल आ गया है. बेहद मुमकिन है कि सोमवार को बाजार खुलने पर भारी गिरावट हो.
इसे भी पढ़ें – निजीकरण को बढ़ावे के साथ देश को आत्मनिर्भर बनाने की पीएम की सोच कहां तक सफल हो सकती है?
यह क्यों हुआ ?
यस बैंक में भी फ्रेंक्लिन का पैसा लगा था. पूरे 1 बिलियन डॉलर. यस बैंक कुछ दिन पहले ही डूब चुका है.
जी, हां तो यह लॉकडाउन असल में देश की समूची बैंकिंग व्यवस्था को डूबने से 3 महीने तक बचाने का खेल है. बीते 18 महीनों में भारत के म्यूच्यूअल फंड बाजार को एक के बाद एक कई झटके लगे हैं. इन्वेस्टमेंट मैनेजरों का कहना है कि यह तबाही तो होनी ही थी. अब लॉकडाउन ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है.
यकीन मानिए कि लॉकडाउन खुलने के बाद जून तक भारतीय बैंकों की तबाही की ऐसी खबरें आ सकती हैं, जो कभी सोची भी नहीं गयीं. मोदी सरकार, टास्क फोर्स, GoM किसी को सूझ नहीं रहा है कि कहां से शुरू करें, क्या करें? पैसा कहां से आएगा?
जब तक कोरोना है, तभी तक राहत है. लेकिन सरकार को खामोशी तोड़नी पड़ेगी. कुछ लोग यह सवाल कर रहे हैं कि किन बैंकों पर संकट गहराने की आशंका है.
सीधा जवाब है – लॉकडाउन के बाद संकट में वही बैंक होंगे, जिन्होंने छोटी और मझोली इकाईयों को ज़्यादा लोन दिये हैं. मेरी बात का आधार अमेरिकी बैंकों की ताजा हालत पर टिका है.
नीचे तस्वीर को देखें. उन्हीं बैंकों की हालत ठीक है, जिन्होंने MSME को कम लोन बांटे हैं. क्रेडिट कार्ड्स, गिरवी आदि रखकर लिये गये लोन का भी बैंकों पर भारी दबाव होगा. 
इसके साथ भयानक बेरोजगारी, लोन रिकवरी में सबसे बड़ी दिक्कत पैदा करेगी. चीन के वुहान में सबसे पहले कोरोना फैला. अब चीन उबर चुका है. लॉकडाउन खुल गया है.
लेकिन चीन में फिलहाल 77 लाख लोग बेरोज़गार हो गये हैं. जिनमें 44 लाख शहरी और करीब 30 लाख प्रवासी मज़दूर हैं. अमेरिका में इस माह के आखिर तक बेरोजगारी 20% तक बढ़ेगी. भारत हर साल 90 लाख ग्रेजुएट पैदा करता है. एक नौकरी खत्म होने का मतलब नये लोगों को भी बेरोजगार करना है.
बेरोजगार तबका खर्च नहीं करेगा. इकोनॉमी सुस्त रहेगी. मांग कम होगी. उत्पादन नहीं तो सरकार की आय भी नहीं. ये इकोनॉमी का स्नोबॉल प्रभाव कहलाता है.
इसे भी पढ़ें – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लॉकडाउन की सफलता को लेकर जो बता रहे हैं, देश के वैज्ञानिक इससे सहमत नहीं हैं
भारत में MSME का देश की जीडीपी में योगदान 30% है. अगर यह सेक्टर तबाह होता है, तो सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के बैंकों को बड़ी दिक्कत होगी. बैंकों का MSME में 4.81 लाख करोड़ का लोन (मार्च तक) फंसा है. ऊपर से NPA और डूबी परिसंपत्तियों का दबाव भी है.
RBI और वित्त मंत्री दोनों को हालात का अंदाज़ा है. इसीलिए 3 मई के बाद लॉकडाउन खोलने पर विचार चल रहा है. अगर नहीं खुला तो समझें खेल खत्म.
डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं
इसे भी पढ़ें – #Lockdown2: सरकार ने स्पष्ट किया- अभी नहीं खुलेंगी सलून, पार्लर, रेस्तरां और शराब की दुकानें




