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पीएम मोदी ने किया था साहेबगंज-मनिहारी पुल का शिलान्यास, बीतने को हैं दो साल, आज तक एक पत्थर का टुकड़ा नहीं लगा

Akshay Kumar Jha

Ranchi : छह अप्रैल 2017. झारखंड के लोगों ने साहेबगंज से पीएम नरेंद्र मोदी के भाषण सुने. मोदी के हाथों साहेबगंज-मनिहारी पुल का शिलान्यास भी हुआ. झारखंड के ऐसे लोग, जिन्हें इस पुल के बन जाने से फायदा होगा, उन्होंने सोचा कि सच में उनके अच्छे दिन आनेवाले हैं. लेकिन, दो साल से इन लोगों को सिर्फ अच्छे दिन वाला फ्लेवर ही नसीब हुआ है, अच्छे दिन नहीं. क्योंकि, दो साल बीतने को हैं और इस पुल को खड़ा करने के लिए एक तिनका भी नहीं लग पाया है. इतने दिनों में अगर पुल बनकर तैयार हो जाता, तो झारखंड के लोगों को दूसरे राज्यों में जाने में सहूलियत होती. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ.

सरकार ने प्रदीप यादव को दिया सवालों का गोलमोल जवाब

बजट सत्र में गोड्डा के विधायक प्रदीप यादव ने सरकार से इस बाबत सवाल पूछा. उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या यह बात सही है कि छह अप्रैल 2017 को साहेबगंज-मनिहारी के बीच 2266 करोड़ों रुपये की लागत से गंगा नदी पर पुल का शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था. पूछा कि क्या यह बात सही है कि एक साल नौ महीना का समय बीत जाने के बाद भी पुल निर्माण का काम शुरू नहीं हुआ है. प्रदीप यादव के सवालों का सीधा जवाब नहीं दिया गया. झारखंड सरकार के पथ निर्माण विभाग की तरफ से प्रदीप यादव को जवाब दिया गया कि साहेबगंज स्थित गंगा नदी पर चार लेन पुल निर्माण का काम एनएचएआई को करना है. यह केंद्र सरकार की परियोजना है. एनएचएआई ने बताया है कि रियायतग्राही संवेदक के साथ एकरारनामा छह मार्च 2018 को किया गया है. संवेदक रियायतग्राही द्वारा वित्तीय व्यवस्था की जा रही है. वित्तीय व्यवस्था पूरी होने पर निर्माण कार्य के लिए समुचित कार्यवाही की जायेगी. परियोजना की लागत 2598 करोड़ है.

अब उठ रहा है सवाल- क्यों कराया पीएम से शिलान्यास

यह पुल संतालपरगना और बिहार के कोसी क्षेत्र के सर्वांगीण विकास से जुड़ा बहुत बड़ा मुद्दा माना जाता रहा है. दरअसल, आजादी के बाद से ही वैकल्पिक मार्ग की तलाश में वर्ष 1957 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उस समय देश के जाने-माने इंजीनियर डॉ विश्वेश्वरैया को गंगा पुल निर्माण के लिए सर्वेक्षण का कार्य सौंपा था. डॉ विश्वेश्वरैया ने साहेबगंज-मनिहारी जलमार्ग को सड़क-सह-रेल पुल के लिए सबसे उपयुक्त मानते हुए इसकी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी. लेकिन, उस वक्त के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और पश्चिम बंगाल के दबाव की वजह से 1971 में पुल का निर्माण पश्चिम बंगाल के फरक्का में कर दिया गया. बांग्लादेश के करीब होने के कारण इसे सामरिक दृष्टिकोण से असुरक्षित माना जाता रहा है. कांग्रेस के वक्त से ही इस पुल को लेकर मांग होती रही है. पुल निर्माण को लेकर साहेबगंज एवं मनिहारी में पिछले 16 सालों के दौरान कई बार धरना-प्रदर्शन, बंदी, चक्का जाम, हस्ताक्षर अभियान जैसे प्रदर्शन होते रहे हैं. इसी क्रम में सिदो-कान्हू मेमोरियल गंगा पुल निर्माण संघर्ष समिति, गंगा पुल निर्माण संघर्ष समिति सहित अन्य कई संघ-संगठन के माध्यम से आवाज उठायी जाती रही. इतना आंदोलन होने के बाद पीएम की तरफ से शिलान्यास होना क्षेत्र के लोगों के बीच अच्छे दिन आनेवाले हैं का संदेश माना जा रहा था. लेकिन, अब सवाल उठ रहा है कि जब पुल को बनाना ही नहीं था, तो शिलान्यास का लॉलीपॉप जनता को क्यों पकड़ाया गया.

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