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क्या किसी वांटेड की फोटो या पोस्टर लगाने पर भी रोक है?

Kumar Saurav

Ranchi : झारखंड सरकार ने गृह सचिव राजीव अरुण एक्का ने रांची के वरीय आरक्षी अधीक्षक सुरेन्द्र कुमार झा से रांची में 10 जून को हुई हिंसा में शामिल उपद्रवियों के पोस्टर लगाये जाने के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा है. इसमें उन्होंने कहा है कि रांची में हुई घटनाओं में नाजायज मजमों में कथित रूप से शामिल व्यक्तियों और हिंसा में कथित रूप से शामिल व्यक्तियों के फोटो सहित पोस्टर 14 जून को रांची पुलिस द्वारा लगाये गये हैं. इसमें कई व्यक्तियों के नाम एवं अन्य विवरण भी दिये गये हैं. उन्होंने कहा है कि यह विधिसम्मत नहीं है. उन्होंने इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले का हवाला दिया है. उन्होंने कहा है कि उस आदेश में न्यायालय द्वारा सड़क किनारे लगे बैनरों को तत्काल हटाने के निर्देश दिये गये थे.

हाइकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि बिना कानूनी अधिकार के व्यक्तियों के व्यक्तिगत जानकारी वाले बैनर सड़क किनारे न लगायें. यह मामला और कुछ नहीं बल्कि लोगों की निजता में एक अनुचित हस्तक्षेप है. इसलिए, यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है.

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गृह सचिव ने जिस मामले का हवाला दिया है वह सावर्जनिक संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए जारी पोस्टर के संबंध में था, न कि किसी वांटेड को पकड़ने के लिए. यहां इस बात को समझने की आवश्यकता है कि ये इन दोनों मामलों में फर्क है. यदि ऐसा नहीं होता तो पुलिस या जिला प्रशासन जो समय−समय पर तमाम समाचार पत्रों में कानून तोड़ने वालों के खिलाफ जो विज्ञापन नाम−पते के साथ छपवाती है वह भी गलत है.

यूपी में मार्च 2020 में जिन लोगों के पोस्टर लगे थे, वह उन्हें सबक सिखाने के लिए लगे थे, ताकि वे दोबारा ऐसी हरकत न करें. क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो यूपी में पोस्टर लगने बंद हो गये होते. यूपी कानपुर और प्रयागराज में 10 जून को जुमे की नमाज के बाद उपद्रव करनेवालों के पोस्टर लगाये गये हैं.

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झारखंड में पुलिस के द्वारा उपद्रवियों के पोस्टर लगाये जाने के मामले में झारखंड सरकार ने गलत नजीर लेकर एसएसपी से स्पष्टीकरण मांगा है और पोस्टर लगाने पर रोक लगा दी है.

यदि किसी उपद्रवी या वांटेड का फोटो या पोस्टर लगाना विधिसम्मत नहीं है तो अब तो जो वांडेट की तस्वीरें प्रकाशित होती रही हैं वे भी गलत हैं.

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