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कोरोना की दूसरी लहर में बिहार में 48 बच्चों के सिर से उठा मां-बाप का साया, बढ़ा मानव तस्करी का खतरा

Ranchi : कोरोना की दूसरी लहर भयावह त्रासदी लेकर आयी है. कई बच्चों के माथे से उनके माता-पिता का साया उठ गया है. इसके अलावे मानव तस्करों का पंजा फैलने का भी खतरा पैदा होने लगा है. बच्चों के मुद्दों पर काम कर रही संस्था सेव द चिल्ड्रन ने देश में कोविड-19 के चलते अपने अभिभावकों को खोने वाले बच्चों की बढ़ती संख्या को लेकर चिंता जतायी है. उसके मुताबिक अनाथ बच्चों को गोद लेने का विज्ञापन सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है. इससे ऐसे बच्चे तस्करों और दुर्व्यवहार की चपेट में आ सकते हैं. अनाथ बच्चे पहले से कहीं अधिक संवेदनशील होते हैं, यदि उन्हें गोद लेने या उचित देखभाल और संरक्षण के तहत रखने की उचित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जाता है, तो वे तस्करों या अपराधियों के जाल में फंस जाते हैं.

 

क्या कहता है राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग

एनसीपीसीआर (राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग) के मुताबिक यह जानना कठिन है कि कोरोना काल में कितने बच्चों के माथे से उनके पैरेंट्स (एक या दोनों) का साया उठा है. हालांकि उसने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दिया है. ऐसे बच्चों की देखभाल और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए छह सूत्रीय योजनाओं को साझा किया है. हलफनामे के अनुसार अब तक माता-पिता को खोने वाले 9,346 बच्चों का आंकड़ा नव निर्मित बाल स्वराज पोर्टल पर अपलोड किया गया है. इनमें 1,742 ऐसे बच्चे हैं जिन्होंने अपने माता और पिता दोनों को खो दिया. 7,464 बच्चे अब एकल-माता-पिता के साथ अपने घर में हैं. यह आंकड़ा मार्च 2020 से 29 मई 2021 के बीच का है.

 

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बिहार में क्या है स्थिति

सेव द चिल्ड्रन की मानें तो बिहार समाज कल्याण विभाग के मुताबिक राज्य में 48 बच्चों ने अपने माता और पिता, दोनों को खो दिया है. 1,486 बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने अपने मां या पिता को खोया है. यह ऐसी तस्वीर है जो स्थिति की गंभीरता को दिखा रहा है. सेव द चिल्ड्रन से जुड़े महादेव हांसदा के मुताबिक बिहार सरकार ने कोविड-19 संकट से प्रभावित बच्चों की बेहतरी की दिशा में सराहनीय पहल की है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि जो बच्चे अपने माता-पिता को खो चुके हैं, उन्हें बाल सहायता योजना के तहत 18 वर्ष की आयु तक प्रति माह 1,500 रुपये प्रदान किए जाएंगे. बच्चों को बाल देखभाल केंद्र में रखा जाएगा जबकि अनाथ लड़कियों को कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में भर्ती कराया जाएगा. ऐसे बच्चों को ‘परवरिश‘ योजना से भी जोड़ा जाएगा. ऐसे हर मुसीबत में फसें बच्चों की पहचान करना अब अत्यंत काम महत्वपूर्ण है. ताकि उन्हें सुरक्षित भविष्य के लिए योजना के दायरे में लाया जा सके. नागरिक समाज को आगे आना होगा. ऐसे बच्चों की पहचान की प्रक्रिया में तेजी लायी जाये. राज्य भर में बाल संरक्षण अधिकारियों के साथ मिलकर काम करने की भी जरूरत है.

 

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