
Faisal Anurag
जार्ज फ्लायड की शहादत का ही यह असर है कि उन मल्टीनेशनल कंपनियों को भी दबाव में आ कर झुकना पड़ा है जो रंग को गोरा बनाने के प्रोडक्ट का प्रचार-प्रसार कर बाजार पर कब्जा जमाती आयी हैं. जार्ज फ्लायड की मौत के बाद उभरे “ब्लैक लाइव्स मैटर्स” आंदोलन का असर भारत में भी दिखने लगा है. जब रंग और नस्ल को ले कर बहस खड़ी हो रही है. बॉलीवुड भी इससे अप्रभावित नहीं है. कई अभिनेता-अभिनेत्रियों ने भी रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाते हुए इस तरह के प्रोडक्ट का विरोध किया है.
जनदबाव का ही असर है कि हिंदुस्तान लिवर ने उन उत्पादों के नाम बदलने का फैसला किया है जो अब तक गोरा हाने का सपना दिखाते हुए मार्केट पर राज कर रहे थे. फेयरनेस क्रीम पर बैन लगाने को लेकर कई बॉलीवुड सितारे पहले ही फेयरनेस क्रीम का विज्ञापन करने से इंकार कर चुके हैं. इनमें कंगना रनौत सहित रणबीर कपूर, स्वरा भास्कर, रणदीप हुड्डा और तापसी पन्नू का नाम शामिल हैं. नंदिता दास, विपाशा बासु और अभय देयोल की तीखी प्रतिक्रियाओं को लोगों का समर्थन भी मिला है.
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सारी दुनिया में इस तरह के उत्पादों के खिलाफ आवाज उठ रही है. “ब्लैक लाइव्स मैटर्स” अमेरिका की सरहदों को तोड़ता हुआ पूरी दुनिया में मुक्ति का परचम बन गया है. मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला का परचम फहरा रहा है. भारत में अभी उस तरह के आंदोलन की दस्तक तो नहीं दिख रही है जैसा कि अन्य महादेशों में दिख रहा है. लेकिन भारत में भी आवाज तेजी से सुनायी देने लगी है. बॉलीवुड की प्रतिक्रिया इसी का संकेत दे रही है.
इस मामले में यूनिलिवर कपंनी का यह बयान मायने रखता है. इसने कहा है, “अपने स्किन केयर ब्रैंड्स के ग्लोबल पोर्टफोलियो को लेकर हम पूरी तरह से समर्पित हैं. ये सभी रंगों और सभी तरह के स्किन टोन्स का ख्याल रखेगी. हम ये समझते हैं कि ‘फ़ेयर’, ‘व्हाइट’ और ‘लाइट’ जैसे शब्द ख़ूबसूरती के एकतरफ़ा नज़रिये को बयान करते हैं. हमें नहीं लगता कि ये सही है. और हम इस पर ध्यान देना चाहते हैं. “यूनिलिवर जैसे मल्टीनेशनल का यह बयान न केवल नए बदलाव का संकेत दे रहा है बल्कि उन समस्याओं को भी रेखांकित कर रहा है जो दुनिया भर में नस्लभेद और रंगभेद के नाम पर मौजूद हैं.
अमेरिका में तो इस आंदोलन का असर यह भी हुआ है कि वहां के पुलिस प्रबंधन के कानूनों में बदलाव की मांग हर दिन गहरी होती जा रही है. अमेरिका के कुछ प्रांतों ने तो इस बदलाव की ओर कदम भी बढ़ा दिया है. भारत भी इस तरह के बदलाव से देर तक अछूता नहीं रहेगा.
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सत्ता के केंद्रीकरण के इस दौर में इस आंदोलन का असर यह है कि उसने लोगों की लोकतांत्रिक चेतना को झकझोर के रख दिया है. और मल्टीनेशनल कंपनियों को भी प्रोडक्टस के नाम पर इस तरह के भेदभाव को खत्म करने के लिए बाध्य कर दिया है. हालांकि केवल प्रोडक्ट के नाम को बदल देने मात्र से ही समानता हासिल नहीं होगी. क्योंकि भारत जैसे अनेक देशों में तो गहरे रूप से रंग को ले कर भेदभाव मजबूत है.
भेदभाव के इस रूप को अभिनेत्री विपाशा बासु के मार्मिक अनुभवों से समझा जा सकता है. वे बताती हैं कि उनके सांवले रंग को लेकर किस तरह का भेदभाव बरता गया. न केवल परिवार और रिश्तेदारों में बल्कि बॉलावुड में सफलता के बावजूद. वे कहती हैं कि जब वे छोटी थीं, तो अक्सर सुनती थी कि वे काली हैं.
उनके अनुसार उन्हें यह बात कभी समझ में नहीं आयी कि उनके बारे में उनके रिश्तेदार भी इस तरह की चर्चा क्यों करते हैं. 15 साल की उम्र में जब उन्होंने सुपर स्टर मॉडल प्रतियोगिता में पहला स्थान पाया तब भी मीडिया ने उनके रंग की ही चर्चा को प्रमुखता दिया. यहां तक फिल्मों की सुपरस्टार अभिनेत्री बनने के बाद भी उन्हें इस तरह की बातों को सुनना पड़ा. जब वे न्यूयार्क और पेरिस गयीं तब उन्हें पता चला कि पश्चिम की दुनिया में भी उनके रंग के कारण ही उनको महत्व मिला.
यह तो एक अभिनेत्री की पीड़ा है. लेकिन भारत की अनेक भाषाओं के मुहावरों को दखा जाए तो उसमें भी रंगभेद को ले कर जिस तरह की बातें की जाती हैं वे बेहद अपमानजनक हैं. सामाजिक सत्ता भी रंग को लेकर ही भारतीय गांवों में किसी के महत्व को स्वीकार करता है. इसका अर्थ यह है कि समस्या केवल प्रोडक्ट के बदल देने मात्र से हल नहीं होने जा रही है. उन गहरीं जड़ों पर भी प्रहार की जरूरत है जो इस तरह के भेदभाव के खिलाफ लोगों की प्रवृति का निर्माण करती हैं.
भारत में तो यह बिना किसी बड़े सामाजिक सुधार आंदोलन के संभव नहीं है. भारतीय समाज को भी इस आत्म मूल्यांकन की जरूरत है कि वह समस्या को यथार्थ के आईने में देखे न कि उसके अस्तित्व को ही नकार दे. अमेरिका ने इस समस्या के अस्तित्व को पहले देखा और समझा फिर कालखंड में रंगभेद के खिलाफ उठी आवाजों का असर पड़ा. और इसने व्यापक समर्थन हासिल किया. अब्राहम लिंकन के जमाने से गुलामी प्रथा का उन्मूलन हुआ, रंगभेद को खत्म करने की मानसिकता बनी. 60 के दशक में जब रंगभेद को कानून के तहत खत्म कर दिया गया तो उसके बावजूद व्यवहार में इसे बदलने की आवाज उठती रही.
भारत को भी यह समझने का वक्त आ गया है कि उसके लोग भी रंगभेदियों की नजर में ब्लैक और ब्राउन मान कर हिकारत के लंबे समय से शिकार हैं. देश के भीतर भी इस तरह की प्रवृति मौजूद है. अब जब कि मल्टीनेशन कंपनियां भी जगी हैं, भारत सहित दुनिया के हर हिस्से से नस्लभेद और रंगभेद की तमाम विकृतियों की मौजूदगी को खत्म करने का वक्त आ गया है. भारत जिस जातिवाद के दंश का शिकार है उसकी जड़ों में भी नस्लवादी प्रवृति मौजूद है. जिसके खिलाफ भारत के दलित एक जमाने से आवाज उठा रहे हैं.
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