Opinion

मजदूर हितों पर हमला करने वाले कथित ‘लेबर रिफार्म’ से उद्योग जगत में भी है नाराजगी

Faisal Anurag

अजीम प्रेम जी, किरण मजूमदार शॉ और गुरुचरण दास उद्योगजगत के बड़े नाम हैं. इन तीनों ने श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा को बेहतर औद्योगिक माहौल के लिए जरूरी बताया है.

तीनों ने अलग-अलग प्रतिक्रिया देते हुए हाल ही में आठ राज्यों की ओर से किए गए लेबर रिफार्म को गलत कदम करार दिया है.

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अजीम प्रेम जी ने कहा है कि लेबर लॉ खत्म करने से इकोनॉमी में गति नहीं आएगी. बल्कि ठहराव बना रहेगा. . उन्होंने यह भी कहा कि प्रवासी मजदूरों को दबाने की जिद नहीं होनी चाहिए. बल्कि उन्हें भरपूर मदद की जरूरत है. पहले से ही उन्हें सामाजिक सुरक्षा नहीं मिली हुई है.

इन्हें इसके लिए गारंटी की जरूरी है. इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. सामाजिक सुरक्षा की गारंटी किसी भी विकास के लिए जरूरी कदम है. डन्होंने यह भी कहा कि ग्रामीण रोजगार गारंटी की तरह सरकार इन श्रमिकों के लिए भी शहरी रोजगार गारंटी कार्यक्रम लाए.

बीस लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा के बाद अजीम प्रेम जी की प्रतिक्रिया बताती है कि उद्योगजगत में सरकार की नीतियों को लेकर सबकुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है. वैसे भी सरकार के राहत पैकेज का विवरण आने के बाद यह दबी जुबान से कहा जा रहा है कि यह भूख से तड़पते बच्चे को कर्ज दे कर चुप कराने का प्रयास भर है.

श्रमिकों के सवाल को ले कर भी उद्योगजगत में परेशानी है. श्रमिकों को लॉकडाउन के दौर में जो तकलीफ उठानी पड़ उससे  एक गहरा जख्म उनके दिलों में है.

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किरण मजूमदार शॉ बिकॉन की चेयरपरसन हैं. उन्होंने ट्वीट कर सवाल उठाया है. किरण मजूमदार शॉ ने कहा है कि लेबर रिफार्म से मजदूरों की तकलीफे बढेंगी ही. उन्होंने यह भी कहा है कि राहत पैकेज में इकोनॉमी को गति देने का प्रायास नहीं किया गया है.

और श्रमिकों के लिए भी समस्याएं पैदा हो गयी हैं. गुरुचरण दास प्रोक्टर एंड गैंबल के चेयरपर्सन रह चुके हैं. उन्होंने भी कहा है श्रमिकों के सामने रोजगार का संकट है. और इन सुधारों का बुरा असर इस पर पड़ेगा. उन्होंने लेबर वेलफेयर फंड बनाने की मांग की है.

अजीम प्रेम जी ने विस्तार से अपनी बाते कही है. उन्होंने कहा, मौजूदा हालात में आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को मदद की जरूरत है. लॉकडाउन के कारण उनकी हालत दयनीय हो गई है.

इकोनॉमिक टाइम्स में विप्रो के संस्थापक प्रेम जी ने लिखा कि यह जानकर आश्चर्य हो रहा है कि कई राज्य लेबर लॉ को पहले ही खारिज कर चुके हैं. उन्होंने कहा कि पहले से ही इन वर्कर्स को बहुत कम सुरक्षा मिली हुई है. ऐसे में लेबर लॉ को और कमजोर करना अमानवीय होगा.

प्रवासी मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा नाम की कोई चीज नहीं है. उन्होंने ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (जैसे मनरेगा) की तर्ज पर शहरी रोजगार गारंटी कार्यक्रम लाने की वकालत की.

ण्क ऐसे समय में जबकि मजदूरों को ज्यादा भरोसा दिए जाने की जरूरत है. लेबर रिफार्म के नाम पर उन्हें गुलाम बनाने की प्रवृति घातक साबित होगी. लॉकडाडन के कारण जो हालात पैदा हुए हैं वे असामान्य हैं.

लेकिन इस विपदा का इस्तेमाल जिस तरह रिफार्म के लिए किया जा जा रहा है, उससे स्पष्ट है कि सरकार का इरादा कुछ और ही है. सुधारों को बिना किसी बहस के जारी करना और किसी की राय नहीं लेना बेहद गंभीर है. आपदा प्रबंधन कानून केंद्र को ताकत तो देता है, लेकिन बुनियादी बदलावों की एकतरफा घोषणा की बात नहीं करता है.

8 राज्यों ने लेबर रिफार्म की घोषणा अब तक कर दी है. चार अन्य राज्य भी इसकी तैयार कर रहे हैं. उत्तप्रदेश सरकार ने चार को छोड़ कर शेष सारे श्रमिक अधिकार कानूनों को तीन साल तक के लिए स्थगित कर दिया है. अन्य राज्यों ने भी न केवल काम के घंटे आठ से बढाकर बारह कर दिए हैं, बल्कि कार्यस्थल पर दी जाने वाली हाइजेनिक सुविधाओं की जरूरत को भी खत्म कर दिया है.

साथ ही वेतन के मामले में भी प्रबंधन को सारे अधिकार दे दिए हैं. ट्रेडयूनियन गतिवधियों को भी सीमित कर दिया है. नरेंद्र मोदी 2014 में जब प्रधानमंत्री बने थे तब से श्रमिक सुधारों की बात की जाती रही है. और उसमें बदलाव भी लाया गया. लेकिन इस बार जो सुधार किए गए हैं उसमें श्रमिकों के अधिकारों को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है.

नरेंद्र मोदी के शासनकाल की एक विशेषता यह भी है कि इसमें संवाद की गुजाइश खत्म कर दी गयी है. और  विशेषज्ञों के लिए भी जगह नहीं है. आलोचनाओं को व्यक्तिगत विरोध जैसा माना जाता है. इसका परिणाम यह है कि उन सवालों पर खामोश ही रहती है.

जो उद्योजगत के कई लोगों को रास नहीं आता है. राहुल बजाज और आनंद महिंद्रा ने कभी जरूर साहस दिखा कर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए. लेकिन अधिकांश लोग खामोश ही रहते हैं. कुछ खास घरानों के हितों को ज्यादा महत्व दिए जाने के आरोपों के बीच किसी अजीम प्रेम जी या किरण मजूमदार शॉ या गुरुचरण दास का बोलना ठीक उसी तरह चेतावनी भरा है जैसा कि राहुल बजाज का.  

राहुल बजाज ने तो अमित शाह की उपस्थिति में ही सरकार को खरीखोटी सुना दी थी. जिसकी दबी जुबान से  सराहना कोई और नहीं उद्योग जगत के ही एक हिस्से ने किया था.

लॉकउाडन के बाद इस बात की उम्मीद की जा रही थी कि केंद्र सरकार स्टुमलस की घोषणा करेगी. यानी उद्योग के लिए कर्ज के बजाय राहत देगी. लेकिन भारत का राहत पैकेज कर्ज ही है. अब तो यह भी कहा जा रहा है कि कि 20 लाख करोड़ में केवल 1 लाख 76 हजार करोड़ ही केंद्र सरकार को बजट से अलग देना पडेगा.

अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस जैसे देशो ने तो कोविड 19 के दौर में बेरोजगार हुए लोगों के त्वरित राहत का दायित्व उद्वोगों पर नहीं छोडा. उन्होंने यह दायित्व स्वयं उठा लिया है. लॉकडाउन की घोषणा के चार दिनों बाद प्रधानमंत्री ने कहा था कि किसी भी श्रमिक या कर्मचारी का वेतन काटने के बजाय उन्हें दिया जाना चाहिए.

लेकिन वेतन दिए जाने की हकीकत तो कुछ और ही है. 18 मई को केंद्र सरकार ने इस दायित्व से नियोक्ताओं को मुक्त कर दिया है. और सरकार ने भी श्रमिकों या कम वेतन वाले कर्मियों को मुसीबत से बचाने के अपने दायित्व पर खोमोशी साध रखी है.

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6 Comments

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