
Ranchi : रांची विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ रमेश कुमार पांडे ने कहा कि आज पूरे विश्व में यदि पर्यावरण की रक्षा अगर कोई करता है तो वह है आदिवासी समाज. आदिवासी समाज ही एक ऐसा समाज है जिसने सभ्य समाज को जीने का सलीका सिखाया.
कुलपति विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में शुक्रवार को विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर आयोजित संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि अपने विचार व्यक्त कर रहे थे.
उन्होंने कहा कि पर्यावरण में, वातावरण में जो भी गड़बड़ियां पैदा हो रही हैं वह पर्यावरण के दूषित होने से हो रही हैं. सभ्य समाज के द्वारा अपनायी गये तौर तरीके के चलते ही आज पर्यावरण संकट गहराया है.
उन्होंने जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की सराहना करते हुए कहा कि टीआरएल विभाग जनजातीय भाषा और संस्कृति का हमेशा से संरक्षक रहा है. इस विभाग से कई आंदोलनों को बल मिला है. कई आंदोलनों की अगुवाई की है. उन्होंने कहा कि वर्तमान में सभी 9 भाषाओं में अब अलग-अलग डिग्रियां दी जायेंगी ताकि भविष्य में छात्रों को किसी भी तरह की कोई कठिनाई का सामना ना करना पड़े.
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दुनिया बची है आदिवासियों के कारण : कुल सचिव
कार्यक्रम में कुलसचिव डॉ अमर कुमार चौधरी ने कहा कि आज पूरी दुनिया बची है, हमारी प्रकृति बची है, हमारी संस्कृति बची है, तो इसे बचाये रखने में दुनिया के आदिवासियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है. हमें उनके इस योगदान को भूलना नहीं चाहिए. विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर हमें आदिवासियों की संस्कृति, उनकी भाषा, उनके अस्तित्व की रक्षा, उनमें अशिक्षा कैसे दूर हो, इन तमाम बातों पर गहन मंथन, चिंतन करने की आवश्यकता है.
कार्यक्रम में आए अतिथियों का स्वागत करते हुए जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉक्टर त्रिवेणी नाथ साहू ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस ऐतिहासिक दिवस है. यह दिवस आदिवासियों के विकास और उत्थान के लिए शुरू किया गया, साथ ही आदिवासियों के पिछड़ेपन को दूर कर उन्हें आगे बढ़ाने का संकल्प लेने का यह दिन है. हमें उन्हें समाज के मुख्यधारा में जोड़ने का प्रयत्न करना चाहिए.
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में शिक्षा का अपना तौर तरीका है. उनकी अपनी सामाजिक संस्थाएं हैं, जिनके माध्यम से उन्हें शिक्षित किया जाता है. उसे मुख्यधारा के समाज ने दरकिनार कर दिया है. जो हम आदिवासियों को हेय दृष्टि से देखते हैं उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि आज हमारी प्रकृति, संस्कृति बची हुई है, तो इसमें आदिवासियों का बहुत बड़ा योगदान है.
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‘आदिवासी किसी धर्म से बंधे नहीं हैं’
विषय प्रवेश कराते हुए जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के प्राध्यापक डॉ उमेश नन्द तिवारी ने कहा कि आदिवासी दिवस सही मायने में आदिवासियों के उत्थान और उनके अस्तित्व की रक्षा हेतु मनाया जाता है. आदिवासी में विकास नहीं हो पाया है इसलिए उनके चहुमुखी विकास को केंद्र में रखकर उनका उत्थान और संरक्षण की दिशा में पहल करने की आवश्यकता है.उ
उन्होंने कहा कि आदिवासी कोई एक धर्म में बंधे हुए नहीं हैं. यह सभी धर्म एवं जाति में पाये जाते हैं. पूरी दुनिया के आदिवासियों को एक सूत्र में बांधने के ख्याल से यह दिवस मनाया जाता है.
इस मौके पर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ अशोक कुमार बड़ाईक ने स्वागत गान प्रस्तुत किया तथा विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ अंजू कुमारी साहू, दिनेश कुमार दिनमणि, कर्म सिंह मुंडा आदि ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये.
मंच संचालन डॉ सरस्वती गागराई ने किया. इस अवसर पर मुख्य रूप से डॉक्टर हरि उरांव, डॉक्टर राकेश किरण, डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो, डॉक्टर निरंजन कुमार, सुबास साहु, शकुंतला बेसरा, अमित आशीष तिग्गा, योगेश कुमार महतो, किशोर सुरिन, संतोष कुमार भगत, विजय कुमार साहु के अलावा बड़ी संख्या में विभाग के सहायक प्राध्यापक, शोधार्थी एवं छात्र छात्राएं मौजूद थे.
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आदिवासी-मूलवासी जनाधिकार मंच ने बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया
आदिवासी-मूलवासी जनाधिकार मंच द्वारा विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर अमर शहीद बिरसा मुंडा के प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया. माल्यार्पण के उपरांत संबोधित करते हुए मंच के अध्यक्ष राजू महतो ने कहा कि झारखंड में निवास करने वाले लोग आदिवासी कला, संस्कृति और भाषा से ओतप्रोत हैं. सभी लोगों के जीवन में आदिवासी संस्कृति रचा बसा है तथा आदिवासी मूलवासी के रूप में एक दूसरे के पूरक हैं.
महतो ने कहा कि संपूर्ण मानव समाज को बचाने में आदिवासी समाज की अहम भूमिका है, क्योंकि इनकी प्रकृति प्रेम से पर्यावरण की सुरक्षा भी होती है.
माल्यार्पण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जिला अध्यक्ष डेविड अब्राहम ने कहा कि आदिवासी परंपरा और जीवनशैली संपूर्ण मानव समाज के लिए अनुकरणीय है.
कार्यक्रम में मुख्य रूप से गोपाल महतो, डेविड अब्राहम, ब्रह्मदेव वर्मा, सुदामा मुंडा, ज्योति लकड़ा, अमन अंकित, ज्योति पूनम, विल्सन खलखो, राजा नायक समेत कई लोग शामिल थे.




