
Surjit Singh
गृह मंत्री अमित शाह ने 15 जुलाई को लोकसभा में नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआइए) संशोधन विधेयक-2019 पेश किया. विधेयक लोकसभा में पास भी हो गया. चर्चा के दौरान टाडा, पोटा से लेकर एनआइए के दुरुपयोग तक के सवाल उठे.
गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि पोटा का दुरुपयोग नहीं हुआ था. उसे यूपीए की सरकार ने 2004 में राजनीतिक कारणों से खत्म किया. हालांकि उन्होंने टाडा कानून को हटाये जाने का जिक्र नहीं किया, जिसे तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने हटाया था.
एक तरह से देखा जाये तो अमित शाह तथ्यों की गलत व्याख्या करते दिखे. हां, यह सही है कि कोई भी कानून खराब नहीं होता. ना ही टाडा या पोटा खराब था और ना ही अब एनआइए खराब है. क्योंकि बात चाहे टाडा की कर लें, पोटा की कर लें या एनआइए को दिये जाने वाले अधिकारों की करें, इसके सिद्धांत में कहीं कोई गलत बात नहीं लिखी हुई है.
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कागज में इसके प्रावधानों के उद्देश्य पाक-साफ और देश से अपराधियों-आतंकियों को खत्म करना ही है. फिर, कोई भी कानून या जांच एजेंसी को दिया जाने वाला अधिकार खराब कब होता है. तब जब इसके तहत किसी एजेंसी को निरंकुश शक्तियां दे दी जाती हैं और जिम्मेदार लोग निजी या राजनीतिक आकाओं के फायदे के लिये इसका इस्तेमाल करने लगते हैं.
किसी जांच एजेंसी को दिये गये अधिकार का इस्तेमाल अगर संविधान और कानून के दायरे में होता है, तब समाज को इसका फायदा होता है. लेकिन जब उसी कानून या अधिकार का इस्तेमाल निजी फायदे के लिये किया जाता है, तब समाज को भयंकर नुकसान उठाना पड़ता है.
टाडा या पोटा का भी जम कर दुरुपयोग किया गया था. लोगों को डराने, फंसाने और उठ रहे आवाज को बंद कराने के लिये इन कानूनों के इस्तेमाल के कई उदाहरण हैं.
यही कारण है कि विपक्ष को डर है कि एनआइए को दिया जाने वाले विशेष अधिकारों का इस्तेमाल भी कहीं लोगों को चुप कराने के लिये ना होने लगे.
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वैसे देखा जाये तो हमारे देश में दुरूपयोग हर कानून का होता है, हो रहा है और भविष्य में भी होने का अंदेशा है. पर, यह दुरूपयोग तब और ज्यादा बढ़ जाता है, जब किसी एजेंसी को निरंकुश शक्तियां दे दी जाती है. तब आम लोगों की रक्षा के लिये बना कानून ही आम लोगों की आवाज व स्वतंत्रता को खत्म कर देता है.
इसलिये जरुरत इस बात की है कि कानून में ऐसी व्यवस्था की जाये, जिससे इससे इसका दुरुपयोग ही ना हो. जैसे कि बिना सबूत के गिरफ्तारी ना हो और अगर कानून का इस्तेमाल करने वाला अफसर अदालत में आरोप साबित नहीं कर पाता है, तो उसके लिये कड़ी सजा का प्रावधान हो.
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