
- चुनावी सभाओं में नही दिख रहा उत्साह, पार्टी कैडर भी टटोल नहीं पा रहे मतदाताओं के मूड
Pravin kumar
Ranchi: पहले दौर का प्रचार थम चुका है. चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं की परिपक्व चुप्पी ने सभी राजनीतिक दलों को हैरानी में डाल दिया है. राजनीतिक विश्लेषको को भी.
अबूझ पहेली यह है कि झारखंड के मतदाओं को कौन सा मुद्दा प्रभावित कर रहा इसका अकलन न ही सता पक्ष कर पा रहा है और न ही विपक्ष. वहीं शहरी इलाकों में चुनाव लड़ रहे राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति जिन मुद्दों के आसपास बुनी, मतदाताओं की उदासीनता के कारण उन सवालों के राजनीतिक परिणामों को ले कर ऊहापोह की हालत है.
खास कर अकलियतों की उदासीनता से भी कई संजीदा सवाल पैदा हो गये हैं. जिन पर राजनीतिक दलों को विचार करने की जरूरत है. आखिर एक दिन का राजा भी अपनी बादशाहत के इस्तेमाल करने के प्रति बेरूखा क्यों है.
दरअसल वोटरो के एक बड़े हिस्से को लगता है कि राजनीति जिस तरह अवसरवादी होती जा रही है उसमें जनता क्यों विश्वास रखे. कथनी और करनी के रानीतिक दलों के फर्क ने भी ऐसे हालात बना रखे हैं.
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सरकारों के कारपोरेट के प्रति रुझान को समझने लगा है वोटर
राजनीतिक में धनकुबेरों के बढ़ते प्रभाव और कारपोरेट समूहों के हितकारी नीतियों के प्रति सरकार के झुकाव ने भी झारखडी लोकतंत्र को चौराहे पर ला खड़ा किया है.
एक जमाना था जबकि राजनीतिक दलों से सादगी की अपेक्षा की जाती थी. आज तो जिस तरह से दिखावा प्रदर्शित किया जा रहा है, वह जनतंत्र में गरीब आदमी का उपहास ही है. करोड़पतियों के बढ़ते राजनीतिक दबाव ने आम अवाम के मुद्वे को धराशायी कर दिया है.
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राज्य में राजनीति पर हावी हो रही नौकरशाही
झारखंड की एक और त्रासदी है कि यहां राजनीति पर नौकरशाही हावी रही है और नौकरशाही ने राजनीतिक संवाद और अन्य प्रक्रियाओं की राह में बाधा पहुंचायी है.
खास कर गामीण इलकों के आदिवासी-मूलवासी आर्थिक सांस्कृतिक पहलू को उसने समझने से इंकार कर दिया है. झारखंड पर ऐसे विचार व व्यवहार आर्थिक राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से थोपने का प्रयास जारी है.
जिसमें यहां के स्वावलंबबन की दीर्घकालिक विरासत को आघात पहुंच रहा है. राज्य में चल रही राजनीतिक प्रक्रिया को जवाबदेह बनाने और उसे निषेधात्मक प्रवृतियों को रोकने की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है.
ताकि जनता को यह महसूस न हो कि रोटी तो वह खा जाता है जो न रोटी बेलता है और न ही रोटी पकाता है.
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झारखंड की संभावनाएं केवल प्रकृतिक संपदा ही नहीं, जीवनबोध और इतिहास चेतना भी हैं
झारखंड की संभावनाएं केवल प्रकृतिक संपदा ही नहीं, वे जीवनबोध और इतिहास चेतना भी हैं. जिन्हें सदियों से जीवित रखा गया है.
इस जीवंत संभावना के आधार पर देखा जाये तो झारखड़ में लोगों के बीच समुन्नति और कुछ नया पैदा करने का उत्साह किसी शासक, राजनीतिक समूहों से संभव नहीं दिख रहा है. झारखंड को लूट से बाहर निकालना होगा, जनता को संसाधनों पर हक देने वाली नीतियों को भी अंजाम देना होगा. झारखंड की जनता संसाधनों पर हक पाने के लिए दीर्घकालिक संघर्ष विभिन्न रूपों में करती रही है.
इसमें राजनीतिक पार्टियां भी पीछे रह जाती हैं. चुनावी उदासीनता को इस ताह के सवालों रू-ब-रू हुए बिना नहीं समझा जा सकता. लेकिन इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि ग्रामीण अंचलों में जान जोखिम में डाल कर बुनियादी सुविधा से वंचित रह कर भी वोट देकर इस जनतंत्र की लाज रखी जा रही है.
उसकी अपेक्षाएं बहुत अलग हैं और साथ ही इन अपेक्षाओं का विस्तार एक नयी राजनीतिक नीति और आर्थिक प्रक्रिया से जुड़ा है.
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